राज्य
07-Jun-2026


- सड़क चौड़ी करने के लिए जमीन चाहिए तो कानूनी रूप से मुआवजा दें - छीना नहीं जा सकता संपत्ति का संवैधानिक अधिकार बेंगलुरु (ईएमएस)। कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पूर्व बीबीएमपी, जिसे अब ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी कहा जाता है, सड़क चौड़ीकरण के लिए किसी भी निजी जमीन मालिक को मुफ्त में अपनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति जस्टिस सूरज गोविंदराज ने बेंगलुरु निवासी एम. शशिकुमार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तल्ख टिप्पणी की। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यदि सरकार या किसी भी विकास प्राधिकरण को सार्वजनिक हित के लिए किसी व्यक्ति की निजी जमीन की आवश्यकता है, तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही अधिग्रहण करना होगा। इसके बदले में जमीन मालिक को उचित मुआवजा या नियमों के अनुसार टीडीआर (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) देना अनिवार्य है, क्योंकि बिना किसी मुआवजे के जमीन छोड़ने के लिए बाध्य करना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। यह पूरा मामला कनकपुरा रोड स्थित थलाघट्टापुरा गांव से जुड़ा है, जहाँ याचिकाकर्ता शशिकुमार ने अपनी 2 एकड़ 4.5 गुंटा जमीन पर एक अपार्टमेंट निर्माण के लिए एक निजी डेवलपर के साथ समझौता किया था। साल 2024 में उन्होंने इस प्रोजेक्ट की संशोधित भवन योजना (बिल्डिंग प्लान) को मंजूरी देने की मांग की और इसके एवज में करीब 1.3 करोड़ रुपये का सरकारी शुल्क भी जमा कराया। हैरान करने वाली बात यह रही कि 26 अप्रैल 2024 को इस संशोधित योजना को मंजूरी मिलने के बावजूद अधिकारियों ने उसे जारी नहीं किया। इसके बाद 30 सितंबर 2024 को एक नोटिस जारी कर शर्त रख दी गई कि यदि शशिकुमार सड़क चौड़ीकरण के लिए अपनी 371.8 वर्गमीटर (करीब 4200 वर्गफुट) जमीन मुफ्त में सरकार के नाम नहीं करते, तब तक मंजूर योजना जारी नहीं की जाएगी। प्राधिकरण के इसी मनमाने रवैये के खिलाफ शशिकुमार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि देश की विभिन्न अदालतें पहले ही यह साफ कर चुकी हैं कि किसी भी नागरिक को बिना कानूनी अधिकार और मुआवजे के उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। दूसरी तरफ, बीबीएमपी ने अपना बचाव करते हुए तर्क दिया कि सड़क की चौड़ाई 31 मीटर से बढ़ाकर 45 मीटर होने से खुद याचिकाकर्ता को भी बेहतर कनेक्टिविटी का लाभ मिलेगा। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया और कहा कि किसी सार्वजनिक परियोजना से मिलने वाला संभावित लाभ, किसी नागरिक की निजी संपत्ति पर उसके संवैधानिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकता। अदालत ने माना कि जब भवन योजना पहले ही स्वीकृत हो चुकी थी, तो बाद में ऐसी नई और अवैध शर्त लगाना पूरी तरह मनमाना कदम है। न्यायालय ने ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिया कि वह बिना किसी जमीन त्याग की शर्त के 30 दिनों के भीतर संशोधित स्वीकृत योजना और निर्माण ड्रॉइंग जारी करे, हालांकि प्रशासन यदि चाहे तो कानून के तहत उचित मुआवजा देकर इस जमीन का अधिग्रहण कर सकता है। रामयश/ईएमएस 07 जून 2026