लेख
09-Jun-2026
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‘मिसिंग मिडिल’ की चुनौती और आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति, विशाल युवा आबादी, डिजिटल क्रांति और बढ़ते उपभोक्ता बाजार की चर्चा लगातार हो रही है। इस विकास यात्रा के केंद्र में यदि कोई सामाजिक-आर्थिक वर्ग सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है तो वह है भारत का मध्यम वर्ग। यही वर्ग देश में उपभोग बढ़ाता है, बचत करता है, निवेश करता है, कर देता है, शिक्षा और कौशल में निवेश करता है तथा आर्थिक गतिविधियों को निरंतर गति प्रदान करता है। किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में मध्यम वर्ग को विकास का इंजन माना जाता है क्योंकि उसकी आय और आकांक्षाएं उत्पादन तथा बाजार दोनों को संचालित करती हैं। भारत में भी मध्यम वर्ग को भविष्य के आर्थिक विकास, सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मजबूती का आधार माना जाता है। इसके बावजूद एक विडंबना यह है कि भारतीय मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा स्वयं आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं है। वह गरीबी से ऊपर तो उठ चुका है, लेकिन स्थायी समृद्धि और सुरक्षा तक नहीं पहुंच पाया है। यही स्थिति अर्थशास्त्र में मिसिंग मिडिल अर्थात लुप्त या कमजोर मध्य वर्ग की परिघटना के रूप में पहचानी जाती है। ‘मिसिंग मिडिल’ का आशय उस स्थिति से है जिसमें समाज में गरीबों और अमीरों के बीच स्थित मध्यम वर्ग पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं होता या उसकी आर्थिक स्थिति इतनी स्थिर नहीं होती कि वह किसी संकट का सामना कर सके। भारत में लाखों परिवार ऐसे हैं जो आय के आधार पर मध्यम वर्ग में गिने जाते हैं, लेकिन उनके पास पर्याप्त बचत, सामाजिक सुरक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच या दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता नहीं होती। परिणामस्वरूप वे किसी बीमारी, नौकरी जाने, व्यवसाय में नुकसान या आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियों में तेजी से आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। कोविड-19 महामारी ने इस वास्तविकता को बहुत स्पष्ट रूप से सामने ला दिया था। महामारी के दौरान लाखों ऐसे परिवार, जो स्वयं को मध्यम वर्ग का हिस्सा मानते थे, अचानक आय के स्रोत समाप्त होने, चिकित्सा खर्च बढ़ने और रोजगार अस्थिर होने के कारण आर्थिक कठिनाइयों में आ गए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत का मध्यम वर्ग संख्या में बड़ा होने के बावजूद सुरक्षा के मामले में कमजोर है। भारतीय मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी शक्ति उसकी उपभोग क्षमता है। देश में घर, वाहन, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं, शिक्षा, स्वास्थ्य, बीमा, पर्यटन और डिजिटल सेवाओं की मांग का बड़ा हिस्सा इसी वर्ग से आता है। जब मध्यम वर्ग की आय बढ़ती है तो वह अधिक वस्तुओं और सेवाओं की खरीद करता है, जिससे उद्योगों का विस्तार होता है, निवेश बढ़ता है और नए रोजगार सृजित होते हैं। यही कारण है कि विकसित देशों की आर्थिक सफलता के पीछे मजबूत मध्यम वर्ग को एक प्रमुख कारक माना जाता है। भारत भी यदि विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है तो उसे अपने मध्यम वर्ग को अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाना होगा। लेकिन वर्तमान में यह वर्ग कई प्रकार की चुनौतियों से घिरा हुआ है। सबसे पहली चुनौती रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता से जुड़ी है। भारत में रोजगार का एक बड़ा हिस्सा अभी भी असंगठित क्षेत्र में है। यहां कार्यरत लोगों को नियमित वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलते। शिक्षित युवाओं की बड़ी संख्या भी ऐसी नौकरियों में काम कर रही है जो उनकी योग्यता के अनुरूप नहीं हैं। रोजगार के अवसर तो बढ़ रहे हैं, लेकिन उनमें से कई अस्थायी, संविदा आधारित या कम वेतन वाले हैं। गिग अर्थव्यवस्था और प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार ने नए अवसर तो पैदा किए हैं, लेकिन उनमें भी दीर्घकालिक सुरक्षा का अभाव है। ऐसे में मध्यम वर्ग के लिए भविष्य की आर्थिक योजना बनाना कठिन हो जाता है। दूसरी बड़ी चुनौती स्वास्थ्य और शिक्षा के बढ़ते खर्च की है। भारत में गुणवत्तापूर्ण सरकारी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की सीमित उपलब्धता के कारण मध्यम वर्ग को निजी संस्थानों पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा, कोचिंग, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला व्यय परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा खा जाता है। किसी गंभीर बीमारी या दुर्घटना की स्थिति में वर्षों की बचत समाप्त हो सकती है। अनेक अध्ययन बताते हैं कि भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला व्यक्तिगत खर्च आज भी काफी अधिक है। यह स्थिति मध्यम वर्ग को आर्थिक रूप से असुरक्षित बनाती है और उसे लगातार वित्तीय दबाव में रखती है। तीसरी चुनौती महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत है। महानगरों और बड़े शहरों में आवास, परिवहन, ऊर्जा, भोजन और अन्य आवश्यक सेवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है। हालांकि आय में भी वृद्धि होती है, लेकिन कई बार वह महंगाई की गति के अनुरूप नहीं होती। परिणामस्वरूप वास्तविक आय और क्रय शक्ति प्रभावित होती है। मध्यम वर्ग को अपने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए अधिक ऋण लेना पड़ता है। गृह ऋण, वाहन ऋण, शिक्षा ऋण और उपभोक्ता ऋणों का बढ़ता बोझ भी वित्तीय असुरक्षा को बढ़ाता है। ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। भारत में गरीबों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं उपलब्ध हैं, जैसे मुफ्त राशन, स्वास्थ्य बीमा, आवास सहायता और अन्य सामाजिक लाभ। दूसरी ओर उच्च आय वर्ग के पास निजी संसाधन और निवेश होते हैं, जिनसे वे जोखिमों का सामना कर सकते हैं। लेकिन मध्यम वर्ग अक्सर इन दोनों के बीच फंस जाता है। वह सरकारी सहायता योजनाओं के लिए पात्र नहीं होता, जबकि निजी सुरक्षा और सेवाओं की पूरी लागत वहन करना भी उसके लिए कठिन होता है। यही कारण है कि किसी भी अप्रत्याशित संकट की स्थिति में वह तेजी से आर्थिक अस्थिरता की ओर बढ़ सकता है। भारत में छोटे और मध्यम उद्यमों की सीमित वृद्धि भी ‘मिसिंग मिडिल’ की समस्या को बढ़ाती है। छोटे व्यवसाय अक्सर वित्त, तकनीक और बाजार तक पर्याप्त पहुंच के अभाव में बड़े नहीं बन पाते। परिणामस्वरूप वे बड़ी संख्या में उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार उत्पन्न नहीं कर पाते। यदि छोटे और मध्यम उद्यम मजबूत हों तो वे रोजगार सृजन और आय वृद्धि के माध्यम से मध्यम वर्ग का विस्तार कर सकते हैं। लेकिन वर्तमान में अनेक उद्यम नियामकीय जटिलताओं, पूंजी की कमी और प्रतिस्पर्धात्मक दबावों से जूझ रहे हैं। मध्यम वर्ग की एक और चुनौती है संपत्ति निर्माण की सीमित क्षमता। विकसित देशों में मध्यम वर्ग के पास आवास, पेंशन फंड, निवेश पोर्टफोलियो और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियां होती हैं, जो उन्हें दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करती हैं। भारत में बड़ी संख्या में मध्यमवर्गीय परिवारों की बचत सीमित होती है और उनका अधिकांश संसाधन दैनिक खर्चों तथा बच्चों के भविष्य पर केंद्रित रहता है। इससे वे पर्याप्त संपत्ति निर्माण नहीं कर पाते। वित्तीय बाजारों में भागीदारी बढ़ने के बावजूद अभी भी बड़ी संख्या में लोग दीर्घकालिक निवेश के प्रति जागरूक नहीं हैं। भारत के मध्यम वर्ग को एक मजबूत और लचीली आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए बहुआयामी नीति हस्तक्षेप आवश्यक हैं। सबसे पहले गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन को राष्ट्रीय विकास रणनीति का केंद्र बनाया जाना चाहिए। विनिर्माण क्षेत्र, हरित ऊर्जा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक सेवा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा किए जाने चाहिए। रोजगार केवल संख्या में नहीं, बल्कि गुणवत्ता और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी बेहतर होने चाहिए। श्रम बाजार में कौशल विकास और पुनः कौशल विकास कार्यक्रमों को भी मजबूत किया जाना चाहिए ताकि बदलती तकनीकी आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यबल तैयार हो सके। दूसरा महत्वपूर्ण कदम स्वास्थ्य और शिक्षा में सार्वजनिक निवेश बढ़ाना है। यदि नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण सरकारी विद्यालय, विश्वविद्यालय और अस्पताल उपलब्ध होंगे तो मध्यम वर्ग पर निजी खर्च का बोझ कम होगा। इससे उनकी बचत और निवेश क्षमता बढ़ेगी तथा आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य केवल सामाजिक सेवाएं नहीं हैं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक विकास के आधार भी हैं। तीसरा, सामाजिक सुरक्षा के दायरे को व्यापक बनाया जाना चाहिए। असंगठित क्षेत्र, गिग अर्थव्यवस्था और स्वरोजगार से जुड़े लोगों के लिए पेंशन, बीमा और आय सुरक्षा योजनाओं का विस्तार आवश्यक है। सामाजिक सुरक्षा को केवल गरीबों तक सीमित रखने के बजाय व्यापक मध्यम वर्ग तक पहुंचाने की आवश्यकता है। इससे आर्थिक झटकों के समय परिवारों को सुरक्षा मिलेगी और वे पुनः गरीबी में गिरने से बच सकेंगे। चौथा, किफायती आवास और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना चाहिए। मध्यम वर्ग के लिए घर का स्वामित्व आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार है। सरकार और वित्तीय संस्थानों को ऐसी नीतियां विकसित करनी चाहिए जो मध्यम आय वर्ग को सस्ती दरों पर आवास ऋण और अन्य वित्तीय सुविधाएं उपलब्ध करा सकें। साथ ही निवेश और बचत को प्रोत्साहित करने वाली योजनाओं को और अधिक आकर्षक बनाया जाना चाहिए। पांचवां, छोटे और मध्यम उद्यमों को मजबूत करने की दिशा में विशेष प्रयास होने चाहिए। वित्तीय सहायता, तकनीकी उन्नयन, डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच और निर्यात अवसरों को बढ़ाकर इन उद्यमों को विकास का नया आधार बनाया जा सकता है। जब ये उद्यम बढ़ेंगे तो गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित होंगे और मध्यम वर्ग का विस्तार होगा। छठा, कर प्रणाली को अधिक संतुलित और न्यायसंगत बनाना आवश्यक है। मध्यम वर्ग पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों के प्रभाव का समुचित मूल्यांकन करते हुए ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जो उनकी क्रय शक्ति को मजबूत करें। कर संग्रह और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करना समय की मांग है। अंततः यह कहा जा सकता है कि भारत का मध्यम वर्ग केवल एक आर्थिक श्रेणी नहीं, बल्कि देश की विकास यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधार है। यह वर्ग उपभोग, निवेश, नवाचार और सामाजिक स्थिरता का वाहक है। किंतु ‘मिसिंग मिडिल’ की परिघटना के कारण इसका बड़ा हिस्सा आर्थिक रूप से असुरक्षित बना हुआ है। यदि भारत को दीर्घकालिक और समावेशी विकास सुनिश्चित करना है तो उसे अपने मध्यम वर्ग को केवल संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा, अवसर और संपन्नता के आधार पर भी मजबूत बनाना होगा। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता को केंद्र में रखकर बनाई गई नीतियां ही इस वर्ग को एक सशक्त और लचीली आर्थिक शक्ति में बदल सकती हैं। जब भारत का मध्यम वर्ग वास्तव में सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध होगा, तभी देश की विकास गाथा अधिक टिकाऊ, समावेशी और व्यापक बन सकेगी। (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।) ईएमएस/09/06/2026