लेख
10-Jun-2026
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आज युद्ध की आग में दुनिया जल रही है ऐसे में शान्ति से काम लेना चाहिए जो भगवान राम ही दे सकते हैं भगवान राम का अर्थ है सब कुछ है दया के सागर हैं । जो इस सब को घेरे हुए है, जो इस सबके भीतर छिपा है, उसकी तरफ जो आकर्षित हो गया।भगवान श्री राम हैं दया के सागर हैं जो पत्थर की अहिल्या को भी जीवन दिया. जो अब बूंद में आकर्षित नहीं है, बूंद में छिपे महासागर में आकर्षित है। जो व्यक्ति में आकर्षित नहीं है व्यक्ति के भीतर छिपे अव्यक्ति में आकर्षित है। अब जो सब तरफ उसे परमात्मा से ही खींचा जा रहा है और बुलाया जा रहा है,उसी महासागर के मिलन की तरफ।शब्द अपने आप में अर्थ हीन हैं ।सब कुछ उपयोग पर निर्भर करता है। शब्दों में खुद कोई अर्थ नहीं है। अर्थ तो हम डालते हैं और हम देते हैं। और अर्थ बदल जाता है। कृष्ण कहते हैं -मुझमें आसक्त मन वाला हो। मन इसमें नहीं तो उसमें,किसी न किसी में तो आसक्त होता ही है। जुड़ना,संलग्न-संबद्ध-नत्थी होना ही उसका काम है।इससे उसे सुख मिलता है। यही सुख बड़े दुख का कारण बन जाता है। स्थायी सुख तभी संभव है जब मन ईश्वर में आसक्त हो जाय। ईश्वर हर हृदय में विद्यमान है। ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेsर्जुन तिष्ठति। मनुष्य किसी चेहरे में, अहंकार में,जीव में आसक्त हो जाता है।मुझमें आसक्त मन वाला का मतलब है उसका केंद्र बदल गया। जैसे मैं करता हूं की जगह ईश्वर करता है यह ध्यान किया तो केंद्र बदल गया, अहंकार की जगह ईश्वर की स्थापना हो गयी।चेहरे में आसक्त होने के बजाय हृदयस्थ ईश्वर में आसक्ति हो गयी।केंद्र बदल गया। व्यक्ति वही है,चेहरा वही है,बूंद वही है मगर अब आसक्ति का केंद्र बूंद में रहा महासागर हो गया।है भी यही।हम वास्तव में व्यक्ति से नहीं अपितु उसके हृदय में रहे परमात्मा से ही प्रेम करते हैं।सच तो यही है।इसे स्वीकार कर सुखी क्यों नहीं हो जाते? क्यों नाम रुप में उलझे रहते हैं?या क्यों किसीको छुडाना चाहते हैं?केवल इतनी समझ देना काफी है कि वस्तुत:तुम हृदय में रहे परमात्मा में ही आसक्त हो। वही खींचता है।उसीकी शक्ति वास्तविक है। आसक्ति का अर्थ है, जिसमें हम आकर्षित हो रहे है; जिसमें हम खींचे जा रहे हैं; जिसमें हम बुलाये जा रहे हैं; जिसमें हम पुकारे जा रहे हैं;जिसके बिना हम जी न सकेंगे। तो चाहे कहें आसक्ति,चाहे कहें प्रेम,चाहे कहें अनन्य राग,चाहे कहें भक्ति; इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। इतना ही प्रयोजन है कि जो परमात्मा की तरफ खिंचा जा रहा है;जिसके आकर्षण का बिंदु परमात्मा हो गया। आसक्ति लगाव,अनुराग,संबंध,बंधन,प्रेम हरेक से नहीं होता।अगर कोई ऐसा हो जो सभीके हृदय में रहे भगवान श्री राम में आसक्त हो तो यह दुर्लभ घटना है।वह सभी से प्रेम करेगा,सभी की सेवा करेगा।ऐसे पुरुष कम ही होते हैं।ऐसे लोग ही अधिक हैं जो इससे या उससे मोह से,प्रेम से, आसक्ति से बंधे हैं।यह असामान्य रुप लेकर अनेक व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक समस्याएं उत्पन्न करता है। उसे कहा जाता है-मोह छोड दो,संबंध तोड दो।कई बार आदमी स्वयं भी इस मोह से छूटना चाहता है मगर छूट नहीं पाता।तो छूटने की जरूरत नहीं है,केवल केंद्र बदलने की जरूरत है।बूंद से ध्यान हटाकर बूंद में रहे महासागर से प्रेम करना है,जीव की जगह भगवान श्री राम जैसे आसक्त मन वाला होना है। वही तो खींच रहा है।यह पता न होने से मुश्किल लगता है। लेकिन छोड़ने के लिए तो कहा नहीं जा रहा इसलिए मन में थोडा धैर्य बना रहता है।तात्पर्य है आपका जिसमें मोह है उसे मत छोडिये,केवल उसके हृदय में रहे भगवान श्री राम को, कृष्ण को मोह का, आसक्ति का(अटेचमेंट का)पात्र बना लीजिए जो आपको अपने में आसक्त किये हुए है। वही कर सकता है,और कौन कर सकता है? भगवान राम में आसक्त मनवाला जब हम कहेंगे,तो आसक्त शब्द का वही अर्थ न रह जायेगा,जो धन में आसक्ति वाला,यश में आसक्ति वाला। महासागर हर बूंद में है।सभी बूंदों में आसक्ति न हो,किसी एक में हो तो महासागर से आसक्ति का रुप बदल जायेगा।बूंद में आसक्त मन को खुद अपनी क्षुद्रता मालूम पडेगी।ऐसा भी कोई हो सकता है जो सैंकडों, हजारों लहरों को देखता है मगर किसी में आसक्त न होकर सीधे सागर में ही आसक्त होता है।सागर ही सभी लहरें बना हुआ है इसलिए सागर से प्रेम,सागर से मोह में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।उसका कोई रुप अर्थात् लहर नष्ट भी हो जाय तो कोई फर्क नहीं पड़ता।जलरुपी लहर वापस जलरुपी सागर में समा गयी, उससे एक होगयी।सागर ने अपने उस रुप विशेष को वापस अपने में समेट लिया।मूल में कोई हानि नहीं हुई। अब अगर सागर के बजाय लहर विशेष में मोह है तो उसके मिटने पर दुख होगा।सागर ही था,है और रहेगा, उसमें कोई उत्पत्ति,विनाश नहीं है यह जाना तो कोई दुख नहीं है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 10 जून /2026