नई दिल्ली (ईएमएस)। जागृत अवस्था में हमारे मस्तिष्क की लगभग 30 से 50 प्रतिशत गतिविधि उन विचारों में व्यस्त रहती है, जिनका उस समय किए जा रहे काम से सीधा संबंध नहीं होता। विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य स्तर की कल्पनाएं रचनात्मकता बढ़ाने और मानसिक ताजगी देने में मदद कर सकती हैं, लेकिन कुछ लोगों के लिए यही आदत गंभीर समस्या का रूप ले लेती है। इस स्थिति को मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग कहा जाता है। अनुमान है कि दुनिया की लगभग 2 से 4 प्रतिशत आबादी इस समस्या से प्रभावित हो सकती है। मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग से पीड़ित लोग घंटों तक अपनी कल्पनाओं में डूबे रहते हैं। कई मामलों में व्यक्ति दिन के 10 से 12 घंटे तक काल्पनिक दुनिया में खोया रह सकता है। इसका असर उसकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों और दैनिक जिम्मेदारियों पर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह की कल्पनाओं में डूबे रहना कई बार उतना ही आकर्षक महसूस होता है जितना किसी पसंदीदा चीज की लत। अमेरिका में रहने वाली एक महिला, जिनका नाम गोपनीय रखा गया है, बताती हैं कि इस आदत ने उनके करियर को बुरी तरह प्रभावित किया। उनका कहना है कि वे अपनी कल्पनाओं में इतनी व्यस्त रहती थीं कि वास्तविक जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा ही खत्म हो गई। परिणामस्वरूप वे लंबे समय तक अपने पेशे में शुरुआती स्तर पर ही बनी रहीं और पदोन्नति के लिए कभी गंभीर प्रयास नहीं कर सकीं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब वास्तविक जीवन व्यक्ति को नीरस, तनावपूर्ण या असंतोषजनक लगता है, तब वह कल्पनाओं की दुनिया में अधिक समय बिताने लगता है। शोध यह भी संकेत देते हैं कि यह समस्या अक्सर उन लोगों में देखी जाती है जो आत्मविश्वास की कमी महसूस करते हैं या स्वयं को दूसरों की तुलना में कम सक्षम मानते हैं। कई अध्ययनों में मैलएडैप्टिव डे-ड्रीमिंग का संबंध बचपन के आघात, भावनात्मक चोटों और पुराने मानसिक तनाव से भी जोड़ा गया है। कुछ लोगों के लिए यह वास्तविक जीवन की कठिनाइयों और दर्दनाक यादों से बचने का एक तरीका बन जाता है। इसके अलावा, इसका संबंध एडीएचडी, ओसीडी, अवसाद और अत्यधिक तनाव जैसी मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से भी पाया गया है। यदि किसी व्यक्ति को महसूस हो कि वह जरूरत से ज्यादा समय कल्पनाओं में बिता रहा है और इसका असर उसके कामकाज पर पड़ रहा है, तो उसे अपने व्यवहार पर नजर रखनी चाहिए। ऐसे कारणों या परिस्थितियों की पहचान करना उपयोगी हो सकता है, जो बार-बार उसे ख्यालों की दुनिया में ले जाते हैं। उदाहरण के लिए, लंबे समय तक अकेले रहना या ऐसे गीत सुनना जो पुरानी भावनाओं को उभारते हों। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जब भी व्यक्ति खुद को अत्यधिक डे-ड्रीमिंग करते हुए पाए, तो वह उस समय और परिस्थिति को डायरी में दर्ज करे। इससे उसे अपने पैटर्न समझने और वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिल सकती है। सुदामा/ईएमएस 10 जून 2026