राज्य
11-Jun-2026
...


- सभी सार्वजनिक भवनों और डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए विस्तृत गाइडलाइन जारी - बिना एक्सेसिबिलिटी सर्टिफिकेट के नहीं मिलेगा ट्रेड लाइसेंस - दिव्यांग छात्रों के दाखिले पर सख्त निर्देश बेंगलुरु (ईएमएस)। कर्नाटक हाई कोर्ट ने दिव्यांगजनों (पीडब्ल्यूडी) के लिए समाज के हर क्षेत्र में समान पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक व्यापक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। अदालत ने सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों, स्कूलों, कमर्शियल बिल्डिंगों, परिवहन प्रणालियों, धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों और आवासीय सोसायटियों में इन नियमों का सख्ती से पालन करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने यह निर्देश बेंगलुरु के एक निजी स्कूल की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जो साल 2013 में एक हादसे के बाद दिव्यांग हुई शिक्षिका से जुड़ा था। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर राज्य स्तरीय सुगम्यता प्राधिकरण (एक्सेसिबिलिटी अथॉरिटी) गठित करने का निर्देश दिया है। इसके तहत अब किसी भी सार्वजनिक या व्यावसायिक भवन को तब तक ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (उपयोग प्रमाणपत्र) या ट्रेड लाइसेंस जारी (या रिन्यू) नहीं किया जाएगा, जब तक वह दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम और हार्मोनाइज्ड गाइडलाइंस-2021 के सभी मानकों को पूरा नहीं करता। इसके लिए फाइनल एक्सेसिबिलिटी ऑडिट अनिवार्य होगा। भवनों के मुख्य प्रवेश द्वार तक बिना सीढ़ियों का मार्ग, मानक ढलान वाले रैंप, रेलिंग और फिसलनरोधी सतह जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करनी होंगी। नए नियमों के मुताबिक, सभी सार्वजनिक भवनों में कुल पार्किंग क्षमता का कम से कम 2 प्रतिशत (या न्यूनतम एक स्थान) और मॉल, एयरपोर्ट या स्टेडियम जैसे बड़े परिसरों में कम से कम चार पार्किंग स्पेस दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित रखने होंगे। साथ ही, परिसरों में जेंडर-न्यूट्रल दिव्यांग-अनुकूल शौचालय और विशेष चिकित्सा आवश्यकताओं के लिए साफ-सुथरे निजी स्थान बनाने होंगे। अदालत ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी सुलभ बनाने का आदेश दिया है। सभी सरकारी वेबसाइटों और मोबाइल ऐप्स को डब्ल्यूसीएजी 2.1 लेवल एए मानकों के अनुरूप स्क्रीन रीडर, बिना माउस के कीबोर्ड नेविगेशन, क्लोज्ड कैप्शन और भारतीय सांकेतिक भाषा जैसी सुविधाओं से लैस करना होगा। शिक्षा के क्षेत्र में कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि कोई भी स्कूल किसी छात्र को उसकी दिव्यांगता या ट्रांसजेंडर होने के आधार पर दाखिला देने से इनकार नहीं कर सकता। सभी शैक्षणिक संस्थानों को विभिन्न दिव्यांगताओं के अनुकूल सुविधाएं विकसित करने के लिए समावेशन मूल्यांकन करना होगा। - ईएमएस 11 जून 2026