राज्य
12-Jun-2026
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मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी मृत किरायेदार के साथ रहने वाला कोई पारिवारिक सदस्य नहीं है, तो उसका वैध उत्तराधिकारी (वारिस) किरायेदारी का अधिकार प्राप्त कर सकता है। अदालत ने दादर स्थित पारसी कॉलोनी के एक फ्लैट को लेकर चले लंबे कानूनी विवाद में 81 वर्षीय महिला के पक्ष में फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति मिलिंद साठये ने पारसी पंचायेत फंड्स एंड प्रॉपर्टीज, बॉम्बे द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए मुंबई की लघु वाद न्यायालय और उसकी अपीलीय पीठ के आदेशों को बरकरार रखा। इन आदेशों में कैटी मिस्त्री को दादर (पूर्व) स्थित पटेल बिल्डिंग के फ्लैट की वैध किरायेदार घोषित किया गया था। - 1993 में किरायेदार की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद मामले के अनुसार, फ्लैट के मूल किरायेदार बाजी पटेल का अप्रैल 1993 में निधन हो गया था। इसके बाद कैटी मिस्त्री ने खुद को किरायेदार के रूप में मान्यता देने की मांग की। उन्होंने दावा किया कि वह पटेल की मां की बहन की बेटी हैं और पटेल के जीवनकाल में उनके साथ तथा अन्य परिवारजनों के साथ रहती थीं। दूसरी ओर, पारसी पंचायेत ट्रस्ट ने इस दावे को खारिज करते हुए मिस्त्री को अतिक्रमणकारी (ट्रेसपासर) बताया और आरोप लगाया कि वह फ्लैट पर अवैध कब्जा करना चाहती हैं। - निचली अदालतों ने दिया था महिला के पक्ष में फैसला दिसंबर 1997 में ट्रायल कोर्ट ने कैटी मिस्त्री के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके बाद सितंबर 1999 में अपीलीय अदालत ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा। हालांकि, अपीलीय अदालत ने यह निष्कर्ष रद्द कर दिया कि मिस्त्री पटेल के साथ परिवार के सदस्य के रूप में उसी फ्लैट में रहती थीं। इसके बाद ट्रस्ट ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अपीलीय अदालत ने स्पष्ट रूप से माना था कि मिस्त्री यह साबित नहीं कर सकीं कि वे पटेल के साथ परिवार के सदस्य के रूप में रह रही थीं। लेकिन दोनों निचली अदालतों ने यह माना था कि मिस्त्री भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बाजी पटेल की वैध उत्तराधिकारी हैं, क्योंकि वे उनकी चचेरी बहन (कजिन) थीं। मिस्त्री के वकील तुषार दहिबावकर ने दलील दी कि उन्हें बॉम्बे रेंट कंट्रोल एक्ट, 1947 की संबंधित धारा के तहत किरायेदार के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। - सह-निवास जरूरी नहीं, यदि कोई अन्य वारिस नहीं है हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित कानूनी प्रावधान दो स्थितियों को मान्यता देता है- किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ रहने वाला परिवार का सदस्य। यदि ऐसा कोई सदस्य नहीं हो, तो मृत किरायेदार का कोई भी वैध उत्तराधिकारी। अदालत ने स्पष्ट किया कि दूसरी स्थिति में साथ रहने की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। न्यायमूर्ति साठये ने कहा कि इस मामले में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जो किरायेदार की मृत्यु के समय उसके साथ रह रहा हो। इसलिए कानून का दूसरा प्रावधान लागू होगा और मिस्त्री को उत्तराधिकारी होने के आधार पर किरायेदारी का अधिकार मिलेगा। - अन्य साक्ष्यों ने भी मजबूत किया दावा अदालत ने यह भी कहा कि मिस्त्री द्वारा प्रस्तुत वंशावली (जीनियोलॉजी) को कभी चुनौती नहीं दी गई। इसके अलावा मार्च 1992 तक के निवेश प्रमाणपत्रों में बाजी पटेल और कैटी मिस्त्री संयुक्त धारक के रूप में दर्ज थे। ट्रस्ट की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि पटेल की मृत्यु के बाद प्रकाशित शोक-संदेश में मिस्त्री का नाम नहीं था, इसलिए उन्हें रिश्तेदार नहीं माना जा सकता। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का नाम शोक-संदेश में शामिल न होना उसके रिश्ते को समाप्त नहीं कर देता। संजय/संतोष झा- १२ जून/२०२६/ईएमएस