ज़रा हटके
14-Jun-2026
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लंदन (ईएमएस)। आधुनिक बिजली के पंखे का आविष्कार वर्ष 1882 में अमेरिकी युवा इंजीनियर शूइलर स्काट्स व्हीलर ने किया। उस समय उनकी उम्र मात्र 22 वर्ष थी। उन्होंने सिलाई मशीन की मोटर में दो ब्लेड लगाकर दुनिया का पहला इलेक्ट्रिक टेबल फैन तैयार किया। यह पंखा आकार में छोटा था और उसमें सुरक्षा जाली भी नहीं होती थी। इसके बाद सिंगर सिलाई मशीन कंपनी से जुड़े फिलिप डील ने इस तकनीक को आगे बढ़ाया। उन्होंने मोटर और ब्लेड को इस प्रकार डिजाइन किया कि पंखे को छत से लटकाया जा सके। इसी प्रयोग से आधुनिक सीलिंग फैन का जन्म हुआ। वर्ष 1887 में उन्होंने इसका पेटेंट भी हासिल किया। शुरुआती इलेक्ट्रिक पंखे पीतल के ब्लेड और कच्चे लोहे की मोटर से बनाए जाते थे। उनमें गति नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं थी और बिजली का कनेक्शन सीधे बल्ब के सॉकेट से लिया जाता था। उस समय एक पंखे की कीमत लगभग 15 डॉलर थी, जबकि एक सामान्य अमेरिकी मजदूर की साप्ताहिक आय केवल 5 से 7 डॉलर के बीच होती थी। बिजली भी उस दौर में बेहद सीमित और महंगी सुविधा थी, इसलिए पंखों का उपयोग केवल संपन्न वर्ग तक सीमित रहा। भारत में बिजली के पंखों का आगमन ब्रिटिश शासन के साथ हुआ। जैसे-जैसे कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों में बिजली पहुंची, अंग्रेज अधिकारियों और धनी भारतीयों ने विदेशों से पंखे मंगवाने शुरू किए। शुरुआती दौर में ये पंखे केवल राजमहलों, बड़े होटलों, अदालतों और सरकारी दफ्तरों में दिखाई देते थे। फर्स्ट क्लास रेल डिब्बों और बड़े अस्पतालों में भी धीरे-धीरे पंखों का उपयोग शुरू हुआ। बिजली के पंखों के प्रसार ने पंखाबरदारों के सदियों पुराने पेशे को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया। 1920 और 1930 के दशक में सरकारी संस्थानों में इलेक्ट्रिक पंखे लगने लगे और मानव श्रम पर आधारित व्यवस्था खत्म होने लगी। स्वतंत्रता के बाद बिजली के विस्तार और औद्योगिकीकरण ने पंखों को आम लोगों तक पहुंचाया। 1970 के दशक तक पंखा भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों का अभिन्न हिस्सा बन चुका था, जबकि 1980 के दशक में ग्रामीण विद्युतीकरण के साथ यह गांवों तक भी पहुंच गया। आज पंखा केवल एक घरेलू उपकरण नहीं, बल्कि तकनीकी विकास और जीवनशैली में आए बदलाव का प्रतीक बन चुका है। आज गर्मी के मौसम में पंखा, कूलर और एयर कंडीशनर आम जरूरत बन चुके हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब लोगों के पास गर्मी से राहत पाने के लिए कोई यांत्रिक साधन नहीं था। उस दौर में लोग हाथ से चलने वाले पंखों या छत से लटकाए गए बड़े कपड़े के पंखों पर निर्भर रहते थे। अमीर घरानों और राजमहलों में इन पंखों को रस्सियों के सहारे नौकरों द्वारा चलाया जाता था। ऐसे कर्मचारियों को ‘पंखाबरदार’ कहा जाता था, जिनका काम दिनभर पंखा खींचकर हवा पहुंचाना होता था। हाथ के पंखों का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। प्राचीन मिस्र की कब्रों में लगभग 3500 वर्ष पुराने पंखों के चित्र मिले हैं। चीन में भी तीन हजार वर्ष पहले बांस और रेशम से बने पंखों के उपयोग के प्रमाण मिलते हैं। भारत में ताड़, खजूर और केले के पत्तों से बने पंखों का इस्तेमाल किया जाता था, जिन्हें ‘पंका’ कहा जाता था। मुगल और ब्रिटिश काल में बड़े कपड़े के पंखे छत से लटकाए जाते थे और उन्हें रस्सी के माध्यम से चलाया जाता था। अंग्रेजी शासन के दौरान यह व्यवस्था सरकारी कार्यालयों, अदालतों और रेलगाड़ियों तक पहुंच गई थी। सुदामा/ईएमएस 14 जून 2026