लेख
14-Jun-2026
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यद्यपि अभी संसद के अगले चुनाव में करीब तीन साल का समय शेष है, किंतु भारतीय राजनीति के जो मौजुदा हालात है, उन्हें देखकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की वह भविष्यवाणी साकार होती जा रही है, जिसमें उन्होंने अगले एक साल में ही देश में मध्यावधि चुनाव होने की आशंका व्यक्त की थी, किंतु इसके साथ ही भारतीय राजनीति के संदर्भ में यह अहम् सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या देश के दो दर्जन प्रतिपक्षी दल एक साथ आकर मोदी के नेतृत्ववाली भारतीय जनता पार्टी को शिकस्त देकर सत्ता पर कब्जा कर पाएगें? यद्यपि यह सवाल फिलहाल भविष्य के गर्भ में स्थित है, किंतु इस सवाल पर सभी विपक्षी दलों में गंभीर चिंतन-मनन अवश्य शुरू हो गया है, विपक्षी दलों के सामने मुख्य प्रश्न अपने-अपने क्षेत्रीय राजनीतिक हित है, जिनके माध्यम से वे क्षेत्रीय सत्ता पर काबिज होना चाहते है, इसलिए अब वे ‘क्षेत्रवाद’ को अहमियत दे या ‘राष्ट्रवाद’ को? यही अहम् सवाल है, जिसका माकूल जवाब आज हर क्षेत्रीय दल खोज रहा है.... और जहां तक सत्तारूढ़ संयुक्त दल संगठन का सवाल है, वह तो 2029 में पुनः सत्तारूढ़ होने का सपना संजोए हुए है। अब यदि मौजूदा राजनीतिक हालातों के आधार पर इस सवाल की निष्पक्ष समीक्षा की जाए तो फिलहाल भविष्य कुछ धुमिल नजर आ रहा है, क्योंकि न तो सत्तारूढ़ गठबंधन ने कोई चमत्कारिक आदर्श प्रस्तुत किया है और नही प्रतिपक्ष कोई अहम् उपलब्धि हासिल कर पाया है, फिलहाल दोनों ही पक्ष अपने अपने प्रयासों में जुटे हुए है, साथ ही शायद इस राजनीतिक स्थिति के निष्पक्ष समीक्षक भी ‘समय’ का इंतजार कर रहे है, किंतु यह सही है कि अपने-अपने प्रयासों में पक्ष-विपक्ष सभी जुटे हुए है, अब प्रतिपक्ष जहां मजबूत हथियार की खोज में है वही ‘सत्ता’ भी अपनी रक्षा के अचूक उपाय खोज रही है। जहां तक सत्तारूढ़ दलों का सवाल है, वे सरकार से आगे कुछ ऐसे चमत्कार करना चाहते है, जो अगले ‘युद्ध’ में नैराश्य को विश्वास में बदल सके और जहां तक प्रतिपक्ष का सवाल है, उसके सभी दलों ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी में राजनीतिक परिपक्वता महसूस की है तथा उनको विश्वास है कि आगामी दो-ढ़ाई साल में वे और परिपक्व होकर भारतीय राजनीति में अहम् भूमिका का निर्वहन करेंगे। फिलहाल स्थिति साफ जरूर नही है, किंतु निराश कोई नही है, सभी अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति आश्वस्त व आशावान है। ईएमएस / 14 जून 26