राज्य
16-Jun-2026


- 75 प्रतिशत नाले अतिक्रमण की भेंट, कलियासोत से बछेड़ी तक सिकुड़ रही जलधाराएं भोपाल (ईएमएस)। मध्यप्रदेश को देश में नदियों का मायका कहा जाता है, लेकिन प्रदेश की छोटी नदियां और पारंपरिक जलधाराएं आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। हालात यह हैं कि भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर समेत अधिकांश शहरों में करीब 75 प्रतिशत नाले अतिक्रमण और भू-माफियाओं की गतिविधियों की भेंट चढ़ चुके हैं। जो नाले बचे हैं, उनके दोनों किनारों पर अवैध निर्माणों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। अब यही खतरा छोटी और मझोली नदियों पर भी मंडराने लगा है। नदी संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में प्रदेश की अनेक छोटी नदियां नक्शों तक सीमित होकर रह जाएंगी। इसका सीधा असर बड़ी नदियों और भूजल स्तर पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार भोपाल की कलियासोत नदी छोटी नदियों की बिगड़ती स्थिति का सबसे बड़ा उदाहरण है। नदी के किनारों तक पहुंच चुके निर्माण, अतिक्रमण और संरक्षण की कमी ने इसके प्राकृतिक स्वरूप को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। नदी एवं पर्यावरण मामलों के जानकार डॉ. सुभाष सी. पांडे और नितिन सक्सेना का कहना है कि अधिकांश छोटी नदियां अब तक अधिसूचित नहीं हैं, जिससे उनके संरक्षण के लिए कानूनी ढांचा कमजोर बना हुआ है। प्रदेशभर में सिकुड़ रही हैं छोटी नदियां आज प्रदेश में अक्रिमण का आलम यह है कि छोटी नदियां तेजी से सिकुड़ रही है। छतरपुर जिले केबड़ामलहरा क्षेत्र की बछेड़ी नदी पनवारी, सिमरिया, बंधाह और सरकना गांवों से होकर धसान नदी में मिलती है। स्थानीय लोगों के अनुसार 15 वर्ष पहले तक गर्मियों में भी इसमें पानी रहता था, लेकिन अब नदी का प्रवाह लगातार घट रहा है। छत्तीसगढ़ से निकलने वाली यह करई नदी मंडला जिले से होकर बुडनेर नदी में मिलती है। नदी किनारे बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण जलधारा कमजोर होती जा रही है। हरदा जिले के लहारपुर, चारखेड़ा और आसपास के गांवों से गुजरने वाली टिमरन नदी के दोनों किनारे अतिक्रमण से प्रभावित हैं। कई स्थानों पर नदी का प्राकृतिक मार्ग संकरा हो गया है। बैतूल जिले के भीमपुर क्षेत्र से निकलने वाली गौलीझिरा नदी में पहले वर्षभर पानी उपलब्ध रहता था। स्थानीय लोगों के अनुसार पेड़ों की कटाई और जलग्रहण क्षेत्र में बदलाव के कारण अब गर्मियों में नदी सूखने लगी है। बड़ी नदियों पर भी पड़ेगा असर विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी नदियां और नाले ही बड़ी नदियों की जीवनरेखा होते हैं। इन्हीं के माध्यम से वर्षा जल, भूजल और प्राकृतिक प्रवाह बड़ी नदियों तक पहुंचता है। यदि छोटी नदियां खत्म होती हैं तो नर्मदा, ताप्ती, चंबल, बेतवा और केन जैसी बड़ी नदियों के जलस्तर पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रदेश की सभी छोटी और मझोली नदियों को अधिसूचित किया जाए। नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन हो। नदी क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए। उद्गम स्थल और प्राकृतिक बहाव क्षेत्र चिन्हित किए जाएं। नदी सीमा में अतिक्रमण, खेती और निर्माण पर स्थायी रोक लगे। नदी किनारे बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हो। पंचायतों और नगरीय निकायों को संरक्षण की जिम्मेदारी दी जाए। क्षतिग्रस्त नदियों के पुनर्जीवन के लिए 10 वर्षीय कार्ययोजना बने। जिला और राज्य स्तर पर निगरानी समितियां गठित हों। प्रत्येक जिले में नदी संरक्षण प्रकोष्ठ स्थापित किया जाए। मध्यप्रदेश में नालों के बाद अब छोटी नदियां भी अतिक्रमण, अवैध निर्माण और पर्यावरणीय उपेक्षा की शिकार हो रही हैं। यदि संरक्षण के लिए ठोस और कानूनी कदम नहीं उठाए गए तो प्रदेश अपनी जलधाराओं की पहचान खो सकता है और इसका असर भविष्य में जल संकट के रूप में सामने आ सकता है। विनोद / 16 जून 26