(वर्तमान में संतों एवं कथा वाचकों के नारी विषयक बयानों का परिप्रेक्ष्य) भारत की सनातन परंपरा में “शक्ति” का स्थान सर्वोच्च माना गया है। यह शक्ति केवल देवी की पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि नारी के रूप में विद्यमान जीवनदायिनी ऊर्जा का प्रतीक है। वैदिक युग से ही नारी को ज्ञान, करुणा, त्याग, साहस और सृजन की मूर्त रूप में सम्मानित किया गया है। ऋग्वेद की ऋचाओं में ‘नारी तू नारायणि’ जैसी भावना स्पष्ट झलकती है। हमारे यहां देवी सरस्वती को ज्ञान की, लक्ष्मी को समृद्धि की और दुर्गा को साहस की देवी माना गया। इसका तात्पर्य यही है कि नारी केवल गृहस्थ जीवन की धुरी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज और राष्ट्र की प्रगति का मूल स्तंभ है। लेकिन हाल ही में कुछ संतों द्वारा महिलाओं को लेकर की गई विवादित टिप्पणियों ने देशभर में तीखी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी है। संत प्रेमानंद जी महाराज का “100 में से केवल 4 महिलाएँ पवित्र” और चर्चित कथावाचक अनिरुद्धाचार्य का 25 वर्ष की आयु पार कर चुकी अविवाहित महिलाएं चरित्रहीन होती हैं, वक्तव्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए, जिन पर महिलाओं के अपमान का आरोप लगा। समर्थकों का कहना है कि इन बयानों को संदर्भ से काटकर पेश किया गया, जबकि विरोधियों का मानना है कि यह महिलाओं की गरिमा पर सीधा प्रहार है। मथुरा सहित कई स्थानों पर संतों को चेतावनी दी गई कि ऐसे विचार ब्रजभूमि में स्वीकार नहीं होंगे। वहीं, कुछ धार्मिक व सामाजिक वर्गों में यह धारणा भी फैल रही है कि यह विवाद संतों की छवि धूमिल करने और समाज में वैमनस्य फैलाने के लिए रचा गया एक षड्यंत्र हो सकता है। यह प्रकरण न केवल धार्मिक प्रवचनों की भाषा और दृष्टिकोण पर सवाल उठाता है, बल्कि मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स की तीव्र प्रसार क्षमता को भी उजागर करता है। सनातन संस्कृति में संतों की भूमिका हमेशा से नारी सम्मान के संरक्षण और प्रचार में रही है। चाहे मध्यकाल में संत मीरा बाई का स्त्री मुक्ति संदेश हो, संत तुकाराम का समानता का भाव या स्वामी विवेकानंद का यह कथन कि “कोई भी राष्ट्र तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक उसकी महिलाएं शिक्षित और सशक्त न हों।” इन सबका उद्देश्य नारी को मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से ऊंचा उठाना रहा। आज के समय में संतों की वाणी से निकलने वाले संदेशों में कुछ संत आधुनिक संदर्भ में नारी के अधिकार और गरिमा की रक्षा की बात करते हैं, तो कुछ अपने वक्तव्यों से नारी को परंपरागत बंधनों में बांधने का समर्थन करते हैं। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने एक सार्वजनिक मंच से कहा कि महिला देश की प्रगति का सबसे महत्वपूर्ण कारक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पुरुषों को यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि वे महिलाओं को सशक्त बना सकते हैं, क्योंकि महिलाएं स्वयं में सक्षम और स्वावलंबी हैं। यह विचार आधुनिक समाज में नारी की भूमिका को सही रूप में प्रस्तुत करता है और दर्शाता है कि वास्तविक सशक्तिकरण स्वतंत्रता और समान अवसर देने से आता है, न कि केवल पुरुषों के संरक्षण की भावना से। इसी तरह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी नारी सम्मान को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि जिस समाज में महिलाएं पूजा और सम्मान की पात्र होती हैं, वह समाज स्वयं शक्तिशाली और सक्षम होता है। उनके विचार से नारी का सम्मान केवल एक सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि समाज की प्रगति का आधार है। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों पर उनका जोर यह दर्शाता है कि शिक्षा और सुरक्षा, नारी सशक्तिकरण के लिए अनिवार्य घटक हैं। इन विरोधाभासी विचारों के बीच यह समझना आवश्यक है कि सनातन धर्म की शक्ति नारी के सम्मान में ही निहित है। इतिहास गवाह है कि जब-जब नारी को उचित सम्मान और स्वतंत्रता मिली, समाज ने सांस्कृतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। और जब-जब उसे दबाया गया, समाज में पतन और अव्यवस्था फैल गई। आज के समय में नारी को लेकर संतों और कथा वाचकों की जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है। मीडिया, सोशल मीडिया और वैश्विक संवाद के इस युग में उनके विचार लाखों-करोड़ों लोगों तक तुरंत पहुंचते हैं। ऐसे में उनके प्रत्येक शब्द का प्रभाव गहरा और दूरगामी होता है। सकारात्मक और प्रगतिशील विचार समाज में संतुलन और सम्मान की भावना को मजबूत करते हैं, जबकि नकारात्मक और संकीर्ण विचार सामाजिक विभाजन और अविश्वास को बढ़ावा देते हैं। वर्तमान परिस्थिति में, नारी के बारे में जो भी विचार रखे जाएं, उन्हें समय की आवश्यकता, संविधान के मूल्यों और सनातन संस्कृति की वास्तविक भावना से जोड़कर प्रस्तुत करना चाहिए। शक्ति का अर्थ केवल पूजा करने वाली प्रतिमा नहीं, बल्कि वह जीवित, गतिशील और निर्णय लेने में सक्षम व्यक्तित्व है। यदि संत और समाज इस दृष्टिकोण को अपनाते हैं, तो न केवल नारी की गरिमा अक्षुण्ण रहेगी, बल्कि सनातन की शक्ति भी किसी भी षड्यंत्र से अप्रभावित बनी रहेगी। ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 29 अगस्त 25