“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे” अब ऐसा तो हो नहीं सकता न! कि, कलियुग में भी श्रीकृष्ण पुनि-पुनि जन्मते ही रहें। कलियुग में तो इस प्रकार का विमर्श व प्रबोधन ही समय-समय पर किया जा सकता है। दिल्ली में हो चल रही त्रि-दिवसीय व्याख्यान माला को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. श्रीमान मोहनराव भागवत् संबोधित कर रहे हैं। ‘संघ के से वर्ष पर, 26-28 अगस्त, 2025 तक चल रही इस व्याख्यानमाला के प्रथम दिवस में सरसंघचालक ने कहा - “गुरुनानक देव की वाणी में मिलता है खुरासान ख़समाना किया, हिंदुस्तान डराया। उन्होंने बाबर के अत्याचारों का वर्णन किया है और कहा है न हिंदू महिलाओं का शील बचा, न मुस्लिम महिलाओं की अस्मत बची। फिर इसी तारतम्य में कहा - अपना स्वाभाविक धर्म क्या है? समन्वय – संघर्ष नहीं। और फिर इसी विषय में वे बोले - चालीस हज़ार वर्ष पूर्व से भारत के लोगों का डीएनए एक है। हमारी संस्कृति एक है, मिलजुल कर रहने की। अंत में इस विषय को इस वाक्य से मन्त्रसिद्ध किया - इस देश में हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध आदि-आदि आपस में संघर्ष नहीं करेंगे; इसी देश में जिएँगे, इसी देश में मरेंगे। सरसंघचालक जी की इस बात को मैं इस अर्थ में लेता हूँ कि, आज हमें सहमतियों और असहमतियों के बिंदु खोजने होंगे। असहमतियों के बिंदु खोजना और उन बिंदुओं पर विचार विमर्श कर सहमति का निर्माण करना ही युगधर्म व राष्ट्रधर्म है। हमारी ‘नहीं’ को संपूर्ण अर्थों में ‘नहीं’ ही समझा जाए, यह आग्रह अब सस्वर हिंदू समाज, मुस्लिम समुदाय के समक्ष रखना चाहता है। हिंदू समाज के आग्रहों के विषय में ‘नहीं’ को ‘हाँ’ बताने हेतु अनावश्यक कुतर्क नहीं आने चाहिए। गौरक्षा जैसी मासूम, कोमल सी बातों को मासूमियत से मानने, भोलेपन से स्वीकारने से और कुतर्क न करने से ही नव इतिहास निर्मित होगा। यदि हमारा भारतीय समाज इन कथित नरेटिव्ज के प्रति जागृत नहीं होता और सरकार सावधान नहीं होती तो ये कथित बुद्धिजीवी व अर्बन एक्टिविस्ट तो भारत में सप्रयास गृहयुद्ध ही करवा देते। संघ के इस जैसे प्रबोधन कार्यक्रमों का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम के आग्रह-दुराग्रह, सहमति-असहमति, मति-विमति, विश्वास-अविश्वास, दूरी-समीपता, संवाद-चूप्पी, घटनाएं-दुर्घटनाएं आदि आदि पर चर्चा करने और एक दिशा में संग-संग बढ़ने हेतु ही होता है। यहां इस बात का दोहराव आवश्यक है कि हम हिंदूओं की असहमति के बिंदु इस्लाम, नमाज, पैगम्बर, मस्जिद, कब्र, दरगाह, मदरसे आदि आदि कतई नहीं है। यदि राष्ट्र निर्माण के विषय, डीएनए के अनुरूप होकर, मदरसो में केंद्रीय विषय बनते हैं, तो, मदरसे से भी हमें असहमति नहीं है! इस देश के एक सौ बीस करोड़ लोगों को व्यक्तिगत असहमति है काफिर पुकारे जाने से। असहमति है - लव जिहाद से, गौ हत्या से, लैंड जिहाद से, देश विभाजन की सोच से, हिंदू कन्याओं के अपहरण करने और उन्हें बरगलाने से। हमें असहमति है देश के भीतर पाकिस्तान बनाने से। जनसंख्या असंतुलन बढ़ाने से भी हमें घोर असहमति है। इस देश के वीरों की, हुतात्माओं की उपेक्षा और विदेशी आक्रांताओं के महिमामंडन से असहमति है। इस देश पर हम पुनः शासन करेंगे इस सोच से असहमति है। कसाब जैसों से सहानुभूति प्रत्येक भारतीय को बुरी लगनी चाहिए, चाहे हिंदू हो मुसलमान। रसखान से लेकर अब्दुल कलाम जी तक की पुष्पमाला भी कोई छोटी मोटी नहीं है। अशफाकुल्ला खां जैसी हुतात्माएं इस माला के प्रमुख पुष्प हैं। इस पुष्पमाला की चर्चा और प्रशंसा करने में भी कुछ को आपत्ति होती है! यह आपत्ति भी असहमति का एक बिंदु है। रसखान से लेकर अब्दुल कलाम तक की पुष्पमाला को अपना आदर्श नहीं मानते हैं, तो इससे असहमति है। अकबर-औरंगजेब जैसे विशुद्ध बाहरी शासकों से हमें असहमति है। तैमूर खां जैसे नाम रखना भला किसे अच्छा लगता होगा? इस देश से प्यार, दुलार लिया जाए; इस देश से अकूत संपत्ति कमाई जाए और फिर कहा जाए - “भारत देश रहने योग्य नहीं है - भारत में रहने में हमें भय लगता है”; इस प्रकार की बातों से असहमति है। इस प्रकार के जुमले हिंदू मानस को भावनात्मक रूप से तोड़ देते हैं। इस प्रकार की घटनाओं से यह सहज प्रतिक्रिया निकलती है कि, रहने योग्य नहीं है तो, ‘यह देश छोड़ दो’! फिर कथित प्रगतिशील मीडिया इस पर बहस कराता है और कट्टर हिंदुत्व की बातें कहता है। एक भावनात्मक चोट का उत्तर इस प्रकार भावनात्मक आवेग से ही आयेगा, इसे स्वीकार कीजिए! यह मानवीय गुण है। हिंदुत्व कट्टर हो नहीं सकता; इस तथ्य को शताब्दियों ने अकाट्य रूप से स्थापित किया हुआ है। भारत व भारतीयता के विरुद्ध इस प्रकार के प्रलाप करने वालो या विधवा विलाप करने वालो के विरुद्ध जब मस्जिदों से फतवे जारी नहीं होते हैं, तब असहमति उत्पन्न होती है। देश का मुस्लिम नेतृत्व व उच्च वर्ग जब इन जैसे अलगाववादियों के विरुद्ध प्रतिक्रिया नहीं देता है; तब असहमति होती है, तब बुरा लगता है हमें। इस देश के विरुद्ध आने वाले व्यक्तव्यों के प्रति मुस्लिम समाज की, मस्जिदों की, मुल्ला-मौलवी-उलेमाओं की चुप्पी से असहमति है। हिंदू-मुस्लिम असहमतियों के इन बिंदुओं पर जो लोग अनर्गल सेकुलरिज्म का प्रलाप करके सहमति नहीं बनने देते हैं, उन लोगों से असहमति है। हिंदुओं की छोटी छोटी सी मासूम, कोमल सी भावनाओं का अनादर करने वालों से असहमति है। सेना पर पत्थर बरसाने से स्वयं मुस्लिम समाज का एक बड़ा धड़ा असहमत है। राष्ट्रीयता के विचार के साथ चल रहे कुछ मुस्लिमों का और पत्थरबाजी का विरोध कर रहे कुछ देश प्रेमी मुसलमानों का विरोध स्वयं मुस्लिम समाज के ही कुछ कट्टरपंथियों द्वारा करने से असहमति है। कुछ शांतिप्रिय और राष्ट्रीयता की सोच वाले मुस्लिम बंधुओं के विरुद्ध हिंसा और मारकाट की धमकियों से असहमति है। शेष समूचे जीवन, दर्शन, विचार, मज़हबी आस्था, पूजा पद्धति, से सहमति है। हम इन सहमतियों के साथ अनंतकाल तक संग-संग चल सकते हैं, इस बात पर सहमति बननी चाहिये। तो आइए सहमति बनाएं! ईएमएस/29/08/2025