1 दिसम्बर जन्म दिवस) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल रणभूमि के योद्धाओं का ही नहीं, बल्कि उन चिंतकों, शिक्षाशास्त्रियों, साहित्यकारों और पत्रकारों का भी इतिहास है जिन्होंने अपने लेखन, विचार और सामाजिक कार्यों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को एक नई दिशा दी। ऐसे ही महान व्यक्तित्वों में दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेकर, जिन्हें देश प्रेम से काका कालेकर के नाम से जाना जाता है, का नाम अत्यधिक सम्मान से लिया जाता है। उनका जन्म 1 दिसम्बर 1885 को महाराष्ट्र के सतारा में हुआ। पारिवारिक संस्कारों, सरल जीवन और राष्ट्रप्रेम ने उनके व्यक्तित्व को बचपन से ही प्रभावित किया। आगे चलकर वे महात्मा गांधी के निकटतम अनुयायियों में शामिल हुए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक व नैतिक शक्ति प्रदान करने वाले अग्रणी कार्यकर्ता बने। काका कालेकर का जीवन एक शिक्षक, साहित्यकार, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक सुधारक के रूप में अद्भुत विविधताओं से भरा था। वे मूलतः मराठी भाषी थे, परंतु हिंदी और गुजराती भाषा पर उनकी पकड़ इतनी प्रभावी थी कि दोनों भाषाओं के साहित्य को उन्होंने नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया। यह उनकी भाषाई संवेदनशीलता और साहित्यिक प्रतिभा का ही परिणाम था कि वे हिंदी के प्रमुख लेखकों में शामिल हुए। उनकी साहित्यिक रचनाएँ सरलता, नैतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत थीं। उनके जीवन में गांधीवादी विचारधारा की गहरी छाप थी। महात्मा गांधी से उनका प्रथम परिचय केवल लेखन के माध्यम से हुआ, लेकिन बाद में वे उनके निकट सहयोगी बन गए। सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन के सिद्धांतों को उन्होंने केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के हर कदम में उतारकर दिखाया। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहते हुए उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया, जेल गए और समाज को जागरूक करने के लिए अपने लेखन का लगातार उपयोग किया। गांधीजी के निधन के बाद 1948 में उन्हें गाँधी संग्रहालय का पहला संचालक नियुक्त किया गया। यह केवल एक प्रशासनिक पद नहीं था बल्कि गांधीजी की स्मृति, विचार और धरोहर को संरक्षित करने की जिम्मेदारी थी, जिसे काका कालेकर ने बड़ी निष्ठा से निभाया। साहित्य के क्षेत्र में काका कालेकर का योगदान अत्यंत विशाल है। उनकी रचनाओं में मानवीय अनुभूतियों की गहराई, सरल भाषा, देशभक्ति और आध्यात्मिक चिंतन का अप्रतिम मेल देखने को मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में जीवनलीला, जीवन-विहार, जीवन-साहित्य भाग 1 व 2, सप्त सरिता और हिमालय की यात्रा जैसे ग्रंथ शामिल हैं। ये रचनाएँ न केवल साहित्य का सौंदर्य बढ़ाती हैं बल्कि पाठक को अपने अंतर्मन में झांकने की प्रेरणा भी देती हैं। उनकी लेखनी में गुजरात और हिंदी साहित्य की अनूठी आत्मीयता दिखाई देती है। उन्होंने गांधीवादी विचारों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए अपनी भाषा को माध्यम बनाया। उनके निबंधों और पुस्तकों में एक ओर गहरी दार्शनिकता है तो दूसरी ओर अत्यंत सहज मानवीय भावनाएँ।यह द्वंद्व ही काका कालेकर को विशेष बनाता है। उनकी शैली सादगीपूर्ण, सहज और शांत प्रवाह वाली थी, जो पाठक के मन में गहरी छाप छोड़ती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्र निर्माण में भी काका कालेकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए भारत सरकार द्वारा बनाए गए आयोग के वे अध्यक्ष रहे। यह आयोग उनके नाम से ही जाना गया,काका कालेकर आयोग। इस आयोग ने न केवल समाज में व्याप्त विषमताओं का अध्ययन किया बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उनकी दृष्टि में शिक्षा सामाजिक उत्थान का सबसे बड़ा उपकरण था। इसलिए उन्होंने जीवनभर शिक्षा को जनसुलभ, नैतिक और उपयोगी बनाने का प्रयास किया। साहित्य, समाज सेवा और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को देश ने कई उच्च सम्मानों से नवाज़ा। वर्ष 1964 में भारत सरकार ने उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण प्रदान किया। यह सम्मान केवल उनके कार्यों की उपलब्धि का नहीं, बल्कि उनके विचारों और जीवन के आदर्शों का भी सम्मान था। साहित्यिक क्षेत्र में भी उनकी उच्च उपलब्धि को मान्यता मिली। वर्ष 1965 में उन्हें जीवन व्यवस्था शीर्षक से लिखी अपनी कृति के लिए साहित्य पुरस्कार प्राप्त हुआ। काका कालेकर की जीवन यात्रा केवल तिथियों, घटनाओं और उपलब्धियों की सूची भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे मनुष्य की कहानी है जिसने राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य को सबसे ऊपर रखा। उनका पूरा जीवन गांधीवाद का चलता-फिरता उदाहरण था। वे सरल जीवन, उच्च विचार और मानवता की भावना से परिपूर्ण थे। उनकी वाणी में विनम्रता थी, विचारों में स्पष्टता और जीवन में अनुशासन। वे चंद पंक्तियों में ही लोगों को दिशा दे देते थे। उनकी रचनाएँ, भाषण और विचार आज भी सामाजिक सद्भाव, नैतिकता और राष्ट्रनिष्ठा का मार्ग दिखाने वाली प्रकाश-स्तंभ हैं। 21 अगस्त 1981 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका कार्य आज भी जीवंत है। उनका साहित्य नए भारत के युवाओं को प्रेरित करता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से नहीं बनता, बल्कि उसके निर्माण में भाषा, संस्कृति, शिक्षा और नैतिकता की भी उतनी ही बड़ी भूमिका होती है। काका कालेकर ने न केवल साहित्य को समृद्ध किया बल्कि समाज को भी नई सोच दी। आधुनिक भारत के इतिहास में वे उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से हैं जिन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में उच्च आदर्श प्रस्तुत किए। आज जब हम उनके जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि एक व्यक्ति सादगी और सेवा में कितना महान बन सकता है। काका कालेकर ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया बल्कि स्वतंत्र भारत का नैतिक मार्गदर्शन भी किया। उनकी हिंदी सेवा, शिक्षा के प्रति निष्ठा, सामाजिक न्याय के लिए समर्पण और साहित्यिक रचनाओं की शक्ति भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहर का अनमोल हिस्सा हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि विचारों की शक्ति किसी भी युग में समाज को बदल सकती है। काका कालेकर वास्तव में उन स्वतंत्रता सेनानियों की श्रेणी में आते हैं जिन्होंने अपनी स्याही और विचारों से भारत के भविष्य को आकार दिया। उनका जन्म केवल इतिहास की एक तारीख नहीं, बल्कि राष्ट्र को एक ऐसे व्यक्तित्व का मिलना था जिसने सेवा, साहित्य और सत्य के मार्ग पर चलकर यह दिखाया कि राष्ट्र निर्माण केवल नारे लगाने से नहीं, बल्कि सतत परिश्रम और नैतिक बोध से होता है। आज भी काका कालेकर का नाम हिंदी की सेवा, साहित्य की गरिमा और मानवता के आदर्शों के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। उनका जीवन संदेश हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल सीमाओं पर नहीं बल्कि विचारों और मूल्यों की रक्षा से होती है। काका कालेकर ने इसे अपने जीवन से सिद्ध किया, इसलिए वे सदैव प्रेरणा के स्रोत रहेंगे। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) .../ 30 नवम्बर/2025