भारत में पैदा हुई पल्लवी पटेल ने कहा है, वह भारत में जन्मी हैं। भारतीय नागरिक हैं, सभी दस्तावेज उनके पास मौजूद हैं। मत देना उनका संवैधानिक अधिकार है। वह एसआईआर का फॉर्म नहीं भरेंगी। देखते हैं उन्हें मत देने से कौन रोकता है। भारत का लोकतंत्र दुनिया के सबसे विशाल और जटिल लोकतांत्रिक ढांचों में एक है। यहां हर नागरिक को वोट देने का संवैधानिक अधिकार मिला है। ऐसे में हाल के दिनों में एसआईआर फॉर्म को लेकर जो विवाद देखने को मिल रहा है वह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला नहीं, वरन लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण से भी जुडा हुआ है। जब कोई नागरिक यह कहता है, मैं भारत में पैदा हुई हूं, मेरे पास सभी दस्तावेज हैं, मत देना मेरा संवैधानिक अधिकार है। तो यह बयान केवल व्यक्तिगत नाराज़गी का नहीं, बल्कि उस व्यापक चिंता का है, एसआईआर के बहाने मतदाताओं को उनके संवैधानिक अधिकार से बेदखल किया जा रहा है। जो वर्तमान में सघन मतदाता परीक्षण के नाम पर देशभर में दिखाई दे रहा है। मतदाता सूची का अपडेट होना जरूरी है। इसमें दो मत नहीं है, लेकिन जब भारत में जन्मे भारतीय नागरिकों से ही दस्तावेज या अन्य किसी प्रक्रिया के नाम पर मतदाताओं के वोट काटे जाएं, आम नागरिकों के मन में भय पैदा किया जाए, मतदाताओं को यह डर और भय हो जाए, उनका नाम कहीं वोटर लिस्ट से ना कट जाए। तो ऐसी स्थिति में यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं, वरन दमनकारी प्रतीत हो रही है। एसआईआर को लेकर यही समस्या सामने आ रही है। लगातार शिकायतें आ रही हैं। बीएलओ पर असाधारण दबाव डाला जा रहा है। फॉर्म भरवाने में अनावश्यक जल्दबाजी की जा रही है। मतदाताओं को समझाए बिना उनसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? भारत का कानून स्पष्ट रूप से कहता है, जो नागरिक 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, जिसके पास वैध पहचान प्रमाण है, उसे मतदाता के रूप में पंजीकृत करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यह अधिकार किसी अतिरिक्त फॉर्म, किसी नई प्रक्रिया या किसी सरकारी निर्णय के आधार पर नहीं छीना जा सकता है। नागरिकता प्रमाणित करने के लिए हमारे पास पहले से ही आधार कार्ड, वोटर आईडी, पासपोर्ट, राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र जैसे अनेक दस्तावेज मौजूद हैं। जो हमारे जन्म और भारतीय नागरिक होने का सबूत हैं। इसके बाद भी चुनाव आयोग द्वारा एक नई प्रक्रिया लागू की जाती है तो उसका उद्देश्य पारदर्शी होना चाहिए। नागरिकों को यह भरोसा दिलाया जाना चाहिए, मतदाता सूची के सघन परीक्षण में इसका उपयोग किसी के राजनीतिक लाभ या सामाजिक भेदभाव के लिए नहीं किया जाएगा। यह विश्वास दिलाने में चुनाव आयोग पूरी तरह से असफल साबित हुआ है। सबसे बड़ी चिंता यह है, एसआईआर के नाम पर कमजोर वर्गों— दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और दूर-दराज के ग्रामीण मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से काटे जाने की आशंका शुरू से ही देखने को मिल रही है। बिहार की एसआईआर के समय यही आशंका व्यक्त की गई थी, जो सही साबित हुई। सुप्रीम कोर्ट में अभी भी मामला सुनवाई में लंबित है। इसी बीच बिहार विधानसभा के चुनाव हो गए। लाखों मतदाताओं के नाम काट दिए गए। जिनके नाम जोड़े गए उनकी सूची नहीं दी गई। चुनाव आयोग जिस तरह की गोपनीयता और अपारदर्शिता के साथ काम कर रहा है, उसके कारण अब मतदाताओं को चुनाव आयोग के ऊपर विश्वास भी नहीं रह गया है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर नागरिक को मतदान के समान अधिकार मिलें। उसके मत का सम्मान हो, उसे किसी भी प्रकार की शंका, दबाव या भय में मतदान ना करना पड़े। वह अपने अधिकार किसी योग्य प्रतिनिधि को ही मत के माध्यम से दे सके। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मत देना सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक होने का सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है। एसआईआर पर उठ रहे सवालों को अनसुना नहीं किया जा सकता। सरकार, चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए। कोई भी ऐसी प्रक्रिया ना अपनाई जाए, जिससे नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाये। दस्तावेजों की आड़ में उन्हें कोर्ट-कचहरी में परेशान किया जाए। उनकी नागरिकता और उनके मौलिक अधिकारों को एसआईआर के माध्यम से खत्म करने की किसी भी चेष्टा को भारत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। नागरिक स्वतंत्रता से बड़ा कोई अधिकार नहीं हो सकता है। यह गरीब से गरीब आदमी को बिना किसी भेदभाव के भारत के संविधान ने दिया है। महिला, पुरुषों को समान अधिकार हैं। ऐसी स्थिति में जिन लोगों ने भारत में जन्म लिया है, दस्तावेजों के नाम पर यदि उनके वोट देने के अधिकार को खत्म किया जाता है। इसका विरोध एवं बगावती तेवर अब पल्लवी पटेल जैसे लोग सामने आकर करने लगे हैं। यह चिंता का विषय है। ईएमएस / 30 नवम्बर 25