असम विधानसभा में बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी बहुप्रतीक्षित विधेयक का पारित होना राज्य की सामाजिक, कानूनी और महिला सुरक्षा संबंधित बहसों में एक नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्य में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना, विवाह संस्था को कानूनी रूप से अधिक मजबूत बनाना और समाज में व्याप्त उन कुप्रथाओं को समाप्त करना है, जो महिलाओं की गरिमा और समानता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती रही हैं। यह कानून केवल किसी एक धर्म या समुदाय विशेष को लक्ष्य करके नहीं लाया गया है, बल्कि इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू किया जाएगा। हालांकि, संविधान में विशेष रूप से संरक्षित अनुसूचित जनजातियों तथा छठी अनुसूची वाले स्वायत्त परिषद क्षेत्रों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि उनकी पारंपरिक सामाजिक संरचनाओं और सांस्कृतिक पहचानों को सुरक्षित रखा जा सके। असम सरकार का कहना है कि यह कदम केवल बहुविवाह की सामाजिक समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की सुरक्षा, अधिकारों और सम्मान को सुनिश्चित करने का एक व्यापक प्रयास है। सरकार ने दावा किया है कि यह विधेयक समाज में व्याप्त उन स्थितियों को बदलने में मदद करेगा, जिनमें महिलाएं अक्सर आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से कमजोर स्थिति में आ जाती हैं। विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था के नाम पर कई बार महिलाओं को उपेक्षा, आर्थिक शोषण और मनोवैज्ञानिक यातना का सामना करना पड़ता है। बहुविवाह की स्थिति में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, विशेषकर तब जब पत्नी और बच्चों के लिए कानूनी सुरक्षा तंत्र स्पष्ट रूप से उपलब्ध न हो। इस विधेयक में बहुविवाह को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है और इसके तहत दोषी पाए जाने पर दस साल तक की सजा का प्रावधान किया गया है। इस कड़े दंड का उद्देश्य समाज में संदेश देना है कि अब राज्य में एक से अधिक विवाह को सहन नहीं किया जाएगा और जो भी इस कानूनी प्रावधान का उल्लंघन करेगा, उसे कठोर दंड भुगतना होगा। सरकार का यह मानना है कि यदि महिलाओं को सामाजिक और वैवाहिक रिश्तों में समान दर्जा देना है, तो इस तरह के सख्त प्रावधान आवश्यक हैं। विधानसभा में जब यह विधेयक पेश किया गया, तब विपक्ष की ओर से कुछ सवाल भी उठाए गए। सीपीआई (एम) और एआईयूडीएफ जैसे दलों ने विधेयक में कुछ संशोधन प्रस्तावित किए थे, जिन्हें अंततः सरकार ने वापस लेने की अपील की। सरकार का तर्क था कि विधेयक का मुख्य उद्देश्य किसी भी समुदाय को लक्षित करना नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के कल्याण से जुड़ा हुआ एक व्यापक सामाजिक सुधार है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी भी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उन विकृतियों के खिलाफ है, जिनका परिणाम वर्षों से महिलाओं को सहना पड़ रहा है। असम सरकार ने इसके साथ ही यह भी कहा कि यह विधेयक समान नागरिक संहिता यूनिफॉर्म सिविल कोड की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम हो सकता है। असम उन राज्यों में शामिल है, जहां यूसीसी लागू करने को लेकर गंभीरता से विचार चल रहा है। बहुविवाह प्रतिबंध विधेयक को सरकार ने इसी संदर्भ में एक प्रारंभिक सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया। राज्य सरकार का मानना है कि जब तक विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े कानून सभी नागरिकों के लिए समान नहीं होंगे, तब तक समानता और न्याय का वास्तविक अर्थ प्राप्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि यूसीसी पर अंतिम निर्णय केंद्र सरकार के स्तर पर होगा, फिर भी असम का यह कदम अन्य राज्यों के लिए एक नजीर की तरह देखा जा रहा है। इस विधेयक में ‘लव जिहाद’ के संदर्भ में भी कुछ कानूनी प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिन्हें लेकर व्यापक बहस हुई। सरकार ने स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य किसी भी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं बल्कि विवाह के नाम पर धोखाधड़ी, जबरन धर्म परिवर्तन या छिपाकर रखी गई पहचान के आधार पर होने वाले शोषण को रोकना है। राज्य में ऐसी घटनाओं को रोकने और महिलाओं को ठगी, दबाव या सामाजिक छल से बचाने के लिए यह प्रावधान आवश्यक माना गया है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता को संविधान द्वारा प्रदत्त सीमाओं में सुरक्षित रखा जाए। असम में बहुविवाह का मुद्दा केवल कानूनी रूप से ही नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी लंबे समय से चर्चा में रहा है। कई ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं को बहुविवाह की स्थिति में गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पति के संसाधन कई परिवारों में विभाजित हो जाने से पत्नी और बच्चों के लिए जीवन कठिन हो जाता है। कई महिलाएं अपने अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के बारे में जागरूक नहीं होतीं, जिससे उनका शोषण और गहरा होता जाता है। इस विधेयक के समर्थक इसे समय की मांग मानते हैं। उनका कहना है कि देश बदल रहा है, महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, ऐसे में विवाह संस्था को भी समानता और न्याय के आधार पर मजबूत करने कीआवश्यकता है। एक पत्नी को छोड़ दूसरी शादी करना जहां महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाता है, वही यह समाज में असमान रिश्तों को जन्म देता है। इस कानून से एक मजबूत संदेश जाएगा कि विवाह एक साझेदारी है, न कि किसी भी समय त्यागकर दूसरी ओर मुड़ जाने की सुविधा का साधन। हालांकि इस विधेयक का कुछ समूह विरोध भी कर रहा है। उनका तर्क है कि पहले से ही भारतीय दंड संहिता और विवाह अधिनियम में कई प्रावधान मौजूद हैं, इसलिए नए कानून की आवश्यकता नहीं है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि कानून जितना कठोर होगा, उतनी ही जरूरत उसके सही क्रियान्वयन की भी होगी। वास्तविक परिणाम तभी मिलेंगे, जब महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगी और न्यायिक व्यवस्था भी त्वरित एवं संवेदनशील तरीके से कार्य करेगी। इसके बावजूद, असम सरकार का मानना है कि यह ऐतिहासिक कानून महिलाओं को सुरक्षा और सम्मान प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस विधेयक के पारित होने के बाद राज्य में वैवाहिक पंजीकरण की प्रक्रिया को और सख्त किया जाएगा। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हर विवाह का पंजीकरण अनिवार्य हो, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की कानूनी जटिलता कम हो सके। पंजीकरण न कराने पर भी दंड का प्रावधान किया गया है, जिससे विवाह व्यवस्था पारदर्शी और न्यायसंगत बने। असम जैसे सामाजिक रूप से विविध राज्य में किसी भी बड़े सुधार के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ सामाजिक स्वीकार्यता भी महत्वपूर्ण होती है। इस कानून के लागू होने के बाद सरकार को व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने होंगे, ताकि समाज के हर वर्ग तक इसका संदेश पहुँचे कि यह विधेयक किसी समुदाय के खिलाफ नहीं बल्कि सभी महिलाओं की सुरक्षा और समानता के लिए लाया गया है। सामाजिक मानसिकता में बदलाव किसी भी कानून से बड़ा परिवर्तन ला सकता है, और सरकार इस दिशा में पहल करने की तैयारी कर रही है। अंततः यह कहा जा सकता है कि असम का बहुविवाह प्रतिबंध विधेयक राज्य के सामाजिक ढांचे में गहरे परिवर्तन को जन्म देगा। यह कानून केवल विवाह संस्था को नियंत्रित करने या दंडात्मक व्यवस्था लागू करने का कदम नहीं बल्कि महिलाओं की गरिमा, अधिकारों और सम्मान को सुनिश्चित करने का प्रयास है। यह एक संदेश है कि समाज अब उन असमानताओं और कुप्रथाओं को स्वीकार नहीं करेगा, जो वर्षों से महिलाओं पर बोझ बनकर लदी हुई थीं। असम विधानसभा द्वारा पारित यह विधेयक आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है। यदि समाज और सरकार मिलकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा में संगठित रूप से आगे बढ़ते हैं, तो यह कानून केवल कानूनी दस्तावेज नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक सुधार का वास्तविक आधार बन जाएगा। महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े इस ऐतिहासिक कदम ने असम को देश में एक नए आदर्श के रूप में स्थापित किया है और यह संकेत दिया है कि परिवर्तन केवल कानूनों से नहीं बल्कि सामाजिक चेतना से आता है और असम ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ा दिया है। ईएमएस / 3/ 12 / 2025