वाशिंगटन(ईएमएस)। अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के विभिन्न देशों की आंतरिक राजनीति, चुनावों और सत्ता संरचनाओं में सीधे हस्तक्षेप करने वाली एक आक्रामक शक्ति के रूप में उभरा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिकी विदेश नीति अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें सैन्य शक्ति और आर्थिक प्रतिबंधों का खुला उपयोग देखा जा रहा है। अमेरिका कहीं अपने पसंदीदा नेताओं को सत्ता में बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, तो कहीं प्रतिकूल सरकारों को गिराने के लिए युद्धपोतों और भारी-भरकम टैरिफ का सहारा ले रहा है। दक्षिण अमेरिकी देश वेनेजुएला में ट्रंप प्रशासन का हस्तक्षेप सबसे मुखर रहा है। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से बेदखल करने के लिए अमेरिका ने उन पर नशीले पदार्थों की तस्करी के गंभीर आरोप लगाए और वेनेजुएला की समुद्री सीमा के पास अमेरिकी युद्धपोत तैनात कर दिए। इतना ही नहीं, सीआईए (सीआईए) को मादुरो सरकार के खिलाफ गुप्त सैन्य कार्रवाई की मंजूरी दी गई है और अमेरिकी सेना वेनेजुएला के तेल टैंकरों को जब्त कर रही है, ताकि देश की आर्थिक कमर तोड़ी जा सके। ब्राजील में भी अमेरिका का दखल साफ तौर पर नजर आया है। ट्रंप ने अपने वैचारिक सहयोगी और पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के समर्थन में वर्तमान लूला डी सिल्वा सरकार पर 50 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगा दिया। यह किसी भी संप्रभु राष्ट्र पर अमेरिका द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे बड़ा आर्थिक दंड माना जा रहा है। इसके अलावा, बोल्सोनारो के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने वाले ब्राजील के सुप्रीम कोर्ट के जज पर वीजा पाबंदियां लगाकर अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि वह अपने सहयोगियों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। मध्य अमेरिकी देश होंडुरास में नवंबर 2025 में हुए चुनावों ने अमेरिकी प्रभाव की एक और कहानी लिखी। ट्रंप ने चुनाव से पहले ही अपने पसंदीदा उम्मीदवार नसरी असफुरा का खुलकर समर्थन किया और चेतावनी दी कि यदि असफुरा नहीं जीते, तो अमेरिका होंडुरास को मिलने वाली आर्थिक सहायता बंद कर देगा। धांधली के आरोपों और तकनीकी गड़बड़ियों के बीच जब असफुरा को विजेता घोषित किया गया, तो अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने इसे अमेरिकी दबाव की जीत बताया। इसी तरह अर्जेंटीना के संसदीय चुनावों में भी राष्ट्रपति जेवियर मिलेई के पक्ष में ट्रंप की सख्ती वाली धमकियों ने वहां के राजनीतिक और आर्थिक माहौल को पूरी तरह प्रभावित किया। इन घटनाओं ने वैश्विक स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या अमेरिका अब एक लोकतांत्रिक रक्षक के बजाय सत्ता परिवर्तन के वैश्विक केंद्र के रूप में कार्य कर रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस/29दिसंबर2025