- समुद्र की गहराइयों से उठती नारी शक्ति की गूंज भारत के सैन्य इतिहास में कुछ क्षण केवल घटनाएं नहीं, राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बन जाते हैं। पिछले दिनों जब भारत की सर्वोच्च कमांडर और राष्ट्रपति महामहिम द्रौपदी मुर्मू ने भारतीय नौसेना की अत्याधुनिक पनडुब्बी ‘आईएनएस वाघशीर’ पर सवार होकर समुद्र की गहराइयों में प्रवेश किया, वह क्षण भारत के सैन्य इतिहास में एक प्रतीकात्मक मील का पत्थर बन गया। उनकी यह यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी बल्कि यह भारत की समुद्री शक्ति, रक्षा आत्मनिर्भरता, महिला नेतृत्व और हिंद महासागर क्षेत्र में देश की निर्णायक भूमिका का सशक्त प्रदर्शन थी। राष्ट्रपति मुर्मू न केवल भारत की पहली महिला राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने पनडुब्बी यात्रा की बल्कि इसका गहरा प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि भारत अब तकनीकी, रणनीतिक और नेतृत्व, तीनों स्तरों पर नया आत्मविश्वास अर्जित कर चुका है। लगभग 19 वर्ष पहले फरवरी 2006 में भारत के राष्ट्रपति ‘मिसाइल मैन’ डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने आईएनएस सिंधु रक्षक में समुद्री यात्रा की थी। तब से लेकर अब तक भारत का रक्षा परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। जो राष्ट्र तब विदेशी प्रणालियों पर निर्भर था, वह आज आत्मनिर्भरता और उन्नत तकनीकी क्षमता के साथ समुद्र की गहराइयों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा है। राष्ट्रपति मुर्मू की यह यात्रा इस ऐतिहासिक निरंतरता को नया आयाम देती है। यह केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रपति की एक सक्रिय, संलग्न और रणनीतिक भूमिका का प्रतीक है, जहां सर्वोच्च नेतृत्व स्वयं उन चुनौतियों और अवसरों को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करता है, जिनसे हमारे सशस्त्र बल प्रतिदिन जूझते हैं। ‘आईएनएस वाघशीर’ प्रोजेक्ट-75 स्कॉर्पीन कार्यक्रम की छठी और अंतिम पनडुब्बी है, जो भारतीय नौसेना में जनवरी 2025 में शामिल हुई थी। इसका निर्माण मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (एमडीएल) ने फ्रांस की कंपनी ‘नेवल ग्रुप’ के तकनीकी सहयोग से किया। यह सहयोग अब केवल तकनीक हस्तांतरण का मॉडल नहीं रहा बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ की वास्तविक सफलता का उदाहरण बन चुका है। भारत आज न केवल जटिल नौसेना प्रणालियों को जोड़ने में सक्षम है बल्कि उनमें नवाचार करने की दिशा में भी अग्रसर है। तकनीकी रूप से वाघशीर दुनिया की सर्वश्रेष्ठ डीजल-इलैक्ट्रिक पनडुब्बियों में गिनी जाती है। लगभग 67 मीटर लंबी और 1,565 टन वजनी यह पनडुब्बी 350 मीटर तक गोता लगाने और पानी के नीचे 37 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलने में सक्षम है। आईएनएस वाघशीर का उन्नत स्टील्थ डिजाइन इसे दुश्मन के सोनार और रडार से लगभग अदृश्य बनाता है। वायर-गाइडेड टॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइलें इसे दुश्मन के किसी भी युद्धपोत को ध्वस्त करने की क्षमता देती हैं। उच्च-संवेदनशील सोनार और रडार प्रणालियां इस पनडुब्बी को खुफिया जानकारी, निगरानी और विशेष अभियानों के लिए आदर्श प्लेटफॉर्म बनाती हैं। 50 दिनों तक समुद्र में तैनाती की क्षमता से यह लंबी अवधि के मिशन संचालित कर सकती है। सबसे भविष्यवादी तत्व इसकी मॉड्युलर संरचना है, जो इसे आने वाले वर्षों में ‘एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन’ प्रणाली से लैस करने की सुविधा प्रदान करेगी। इस तकनीक के जोड़ने के बाद वाघशीर को सतह पर आए बिना लंबे समय तक गहराइयों में तैनात किया जा सकेगा, जिससे इसकी स्टील्थ और मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। राष्ट्रपति मुर्मू की यह यात्रा कारवार स्थित आईएनएस कदंब नौसैनिक अड्डे से प्रारंभ हुई, जो भारत के समुद्री सामर्थ्य का केंद्र बन चुका है। ‘प्रोजेक्ट सीबर्ड’ के तहत विकसित यह अड्डा 45 वर्ग किलोमीटर में फैला एक विशाल सामरिक बेस है। पूर्ण निर्माण के बाद यह स्वेज नहर के पूर्व में पृथ्वी का सबसे बड़ा नौसैनिक अड्डा होगा, जहां 50 से अधिक युद्धपोतों को रखने की क्षमता होगी। यह आधार केवल एक सैन्य सुविधा नहीं बल्कि भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टि का प्रतीक है। यहां से भारत न केवल अपने समुद्री तट की सुरक्षा करता है बल्कि पश्चिमी हिंद महासागर क्षेत्र पर सामरिक निगरानी भी रखता है। कारवार का विकास हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की निर्णायक भूमिका के अनुरूप है, जहां व्यापारिक मार्ग, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक नियंत्रण सब कुछ समुद्र पर निर्भर है। राष्ट्रपति की यात्रा का सबसे भावनात्मक क्षण वह रहा, जब उन्होंने पनडुब्बी में तैनात नौसैनिकों से संवाद किया। पनडुब्बी सेवा, सामान्य नौसैनिक जीवन से कहीं अधिक कठिन होती है, जहां सीमित स्थान, पूर्ण गोपनीयता, महीनों तक अंधकार और हर क्षण अप्रत्याशित खतरे रहते हैं। ऐसे वातावरण में राष्ट्रपति का स्वयं आकर सैनिकों का अभिवादन करना उनके मनोबल को अतुलनीय शक्ति प्रदान करता है। उन्होंने नौसैनिकों के अनुशासन, तकनीकी दक्षता और त्याग की प्रशंसा करते हुए कहा कि ‘भारतीय सैन्य शक्ति का असली आधार उसकी मानव शक्ति है।’ यह कथन भारत की उस सैन्य नीति को उजागर करता है, जो आधुनिक हथियारों जितनी ही ऊर्जा अपने जवानों की प्रतिबद्धता में देखती है। एक आदिवासी पृष्ठभूमि से आने वाली महिला, जो देश की सर्वोच्च संवैधानिक पद पर हैं, उनका अत्याधुनिक पनडुब्बी में उतरना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं बल्कि सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक है। भारत की सशस्त्र सेनाओं में महिलाओं की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। 2014 में जहां महिला अधिकारियों की संख्या लगभग 3,000 थी, वहीं आज यह 11,000 से अधिक हो चुकी है। 2020 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय के बाद 500 से अधिक महिला अधिकारियों को स्थायी आयोग दिया गया। 2022 से राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में महिला कैडेट्स के प्रवेश से नए युग की शुरुआत हुई। राष्ट्रपति मुर्मू का सुखोई-30 एमकेआई, राफेल और अब पनडुब्बी में तीनों सशस्त्र शाखाओं का प्रत्यक्ष अनुभव, यह केवल नारी सशक्तिकरण का प्रतीक नहीं बल्कि यह संदेश भी है कि 21वीं सदी का भारत नेतृत्व को लिंग की सीमाओं से परिभाषित नहीं करता। उनकी यह यात्रा समाज की उस प्रेरणा का स्वर बन गई है, जो भारत की बेटियों को कहती है कि ‘समुद्र की गहराइयां भी तुम्हारे साहस से अपरिचित नहीं हैं।’ प्रोजेक्ट-75, जिसने वाघशीर जैसी पनडुब्बियों को जन्म दिया, भारत की तकनीकी स्वायत्तता की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है। इसका उद्देश्य केवल छह पनडुब्बियां बनाना नहीं बल्कि भारत को पनडुब्बी निर्माण और डिजाइन की घरेलू क्षमता देना था। भारत अब अगले चरण ‘प्रोजेक्ट-75 (आई)’ की ओर बढ़ रहा है, जिसमें पूर्णतः स्वदेशी डिजाइन और निर्माण पर ध्यान रहेगा। इससे भारत न केवल अपनी रक्षा जरूरतें पूरा करेगा बल्कि भविष्य में अन्य देशों को भी नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्यात करने में सक्षम होगा। यह मार्ग ‘आत्मनिर्भर भारत’ की उस व्यापक सोच से जुड़ा है, जहां रक्षा उत्पादन को आर्थिक विकास, कूटनीति और तकनीकी नवाचार से जोड़ा गया है। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हिंद महासागर क्षेत्र वह भौगोलिक परिसीमा है, जहां वैश्विक शक्ति-संतुलन तय हो रहा है। विश्व व्यापार का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं समुद्री मार्गों से गुजरता है। चीन की बढ़ती नौसैनिक सक्रियता, दक्षिण चीन सागर का तनाव और इंडो-पैसिफिक में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने इस क्षेत्र को नया केंद्र बना दिया है। ऐसे में, भारत की नीति स्पष्ट है, सागर : सभी के लिए सुरक्षा और विकास।’ इसके विस्तार स्वरूप भारत ने महासागर और MAITRI जैसी पहलें शुरू की हैं, जो क्वाड देशों (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत) के साथ तालमेल से संचालित हो रही हैं। राष्ट्रपति की यह यात्रा विश्व समुदाय के लिए संकेत है कि भारत केवल क्षेत्रीय खिलाड़ी नहीं बल्कि एक नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर है, जो नियम-आधारित, स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री व्यवस्था को सशक्त कर रहा है। राष्ट्रपति की यह यात्रा केवल एक प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं थी बल्कि यह संदेश थी कि भारत का सर्वोच्च नेतृत्व अपने सिपाहियों के साथ खड़ा है, उनके जीवन, उनके संघर्ष और उनके गौरव को पूरी संवेदना से समझता है। पनडुब्बी के संकरे गलियारों में राष्ट्रपति का नौसैनिकों से बातचीत करना, उनके उपकरणों को देखना और उनके मनोबल को सराहना, यह उस गहरे विश्वास का प्रतीक है, जो सरकार और सशस्त्र बलों के बीच सेतु बनाता है। यह विश्वास ही भारत की सैन्य शक्ति का अदृश्य किन्तु सबसे प्रबल स्तंभ है। आईएनएस वाघशीर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की समुद्री यात्रा भारत के आत्मनिर्भर, समावेशी और रणनीतिक भारत का जीवंत प्रतीक बन गई है। यह एक यात्रा मात्र नहीं थी बल्कि यह उस आत्मविश्वास की घोषणा थी, जो कहता है कि भारत अब किसी के संरक्षण में नहीं बल्कि अपनी तकनीक, अपने मानव संसाधन और अपने नेतृत्व के बल पर विश्व मंच पर खड़ा है। समुद्र की गहराइयों में उतरती यह पनडुब्बी केवल धातु का ढ़ांचा नहीं बल्कि उस राष्ट्र की आत्मा है, जो शांति के प्रति समर्पित है पर आवश्यकता पड़ने पर अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए तैयार भी है। कुल मिलाकर, राष्ट्रपति मुर्मू और आईएनएस वाघशीर, दोनों एक ऐसे नए भारत के प्रतीक हैं, जो नारी शक्ति, आत्मनिर्भरता और अडिग संकल्प के सहारे अपना भविष्य खुद गढ़ रहा है। (लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं) ईएमएस / 03 जनवरी 26