लेख
03-Jan-2026
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देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा पाने वाला इंदौर आज एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है, जो किसी एक गली, एक कॉलोनी या एक हादसे तक सीमित नहीं है। भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में दूषित पानी पीने से अब तक 14 लोगों की मौत हो चुकी है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, यह 14 घरों में पसरे सन्नाटे की गिनती है, 14 चिताओं की राख है और सैकड़ों बीमार शरीरों की कराह है। जिन शहरों को हम विकास, स्वच्छता और आधुनिक व्यवस्था का मॉडल बताते नहीं थकते, वहीं अगर नल से ज़हर बहने लगे तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता नहीं तो और क्या है। भागीरथपुरा की संकरी गलियों में बीते कई दिनों से मातम पसरा है। अरविंद, उम्र 43 वर्ष, कुलकर्णी भट्टा निवासी, इस त्रासदी का 14वां शिकार बना। उससे पहले 21 से 31 दिसंबर के बीच 13 जिंदगियां बुझ चुकी थीं। यह कोई अचानक आया तूफान नहीं था। यह मौतें धीरे-धीरे आईं, चेतावनी देती रहीं, शिकायतों की शक्ल में दस्तक देती रहीं, लेकिन जलदाय विभाग और जिम्मेदार तंत्र ने उन्हें सुना ही नहीं। दो साल से लोग कह रहे थे कि नलों से बदबूदार, गंदा पानी आ रहा है। दो साल से बच्चे बीमार पड़ रहे थे, बुजुर्ग उल्टियां कर रहे थे, घरों में दवाइयों की बोतलें जमा हो रही थीं। अगर तब सुना जाता, तो शायद आज 14 चिताएं न जल रहीं होतीं। पानी जीवन है, यह वाक्य हम किताबों में पढ़ते हैं। लेकिन जब वही पानी मौत बन जाए, तो सवाल सीधे उस विभाग पर जाता है, जिसकी जिम्मेदारी लोगों तक सुरक्षित जल पहुंचाने की है। जलदाय विभाग की पाइपलाइनों में लीकेज था, यह बात अब सरकारी रिपोर्ट भी मान चुकी है। सीएमएचओ की जांच रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि पाइपलाइन में रिसाव के कारण पानी दूषित हुआ और उसी पानी को पीने से लोग बीमार पड़े और मरे। सांसद ने भी स्वीकार किया कि पानी के सैंपल में जानलेवा बैक्टीरिया मिले हैं। लेकिन यह स्वीकारोक्ति तब आई, जब कई घर उजड़ चुके थे। क्या किसी विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ रिपोर्ट आने के बाद बयान देना है, या समय रहते खतरे को रोकना भी उसका दायित्व है? स्वास्थ्य विभाग ने करीब आठ हजार घरों का सर्वे किया, ढाई हजार से ज्यादा लोग संक्रमित या संदिग्ध पाए गए, सैकड़ों अस्पताल में भर्ती हुए। यह संख्या बताती है कि समस्या कितनी व्यापक थी। फिर भी जलदाय विभाग की तरफ से न समय पर सप्लाई रोकी गई, न वैकल्पिक व्यवस्था की गई, न ही बड़े स्तर पर चेतावनी जारी की गई। जिन नलों से पानी आता है, वही नल मौत का फंदा बन गए और लोग मजबूरी में वही पानी पीते रहे। जिनके पास बोतलबंद पानी खरीदने की हैसियत नहीं थी, उनके लिए इससे ज्यादा कठिनाई और क्या हो सकती थी? जब मंत्री कैलाश विजयवगीय भागीरथपुरा पहुंचे और मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपए के चेक देने की कोशिश की गई, तो वह दृश्य अपने आप में व्यवस्था के प्रति लोगों के गुस्से का आईना था। परिजनों ने चेक लेने से मना कर दिया। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें पैसे नहीं चाहिए, उन्हें जवाब चाहिए। महिलाओं ने मंत्री को घेरकर कहा कि दो साल से शिकायत कर रहे थे, अगर तब सुन लिया गया होता तो आज इतने लोग नहीं मरते। यह कोई राजनीतिक विरोध नहीं था, यह एक मां, एक पत्नी, एक बहन की पीड़ा थी, जिसे चेक से नहीं खरीदा जा सकता। मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के बयान इस त्रासदी में और नमक छिड़कते नजर आए। कहीं कहा गया कि जांच होगी, कहीं कहा गया कि जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, कहीं यह बताया गया कि आंकड़े जल्द जारी किए जाएंगे। सवाल यह है कि जब लोग मर रहे थे, तब ये बयान कहां थे? जब बदबूदार पानी की शिकायतें दर्ज हो रही थीं, तब जलदाय विभाग की मशीनरी क्यों नहीं जागी? क्या हर हादसे के बाद यही रटी-रटाई पंक्तियां सुनना ही जनता की नियति है? इंदौर की यह घटना सिर्फ एक शहर की कहानी नहीं है। यह उस पूरे देश का आईना है, जहां आजादी के इतने वर्षों बाद भी साफ पानी की गारंटी नहीं दी जा सकी। शहरों में स्मार्ट सिटी की बातें होती हैं, करोड़ों की परियोजनाएं गिनाई जाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि गरीब और मध्यम वर्ग आज भी नल खोलते वक्त डरता है कि पता नहीं आज पानी आएगा भी या नहीं, और अगर आएगा तो कैसा आएगा। भागीरथपुरा के लोग आज यही डर जी रहे हैं। जलदाय विभाग पर सवाल इसलिए भी गंभीर हैं क्योंकि पानी की सप्लाई कोई विलासिता नहीं, बल्कि मूलभूत अधिकार है। पाइपलाइनों की नियमित जांच, लीकेज की मरम्मत, पानी की गुणवत्ता की लगातार मॉनिटरिंग, यह सब विभाग की रोजमर्रा की जिम्मेदारी है। अगर दो साल से गंदा पानी आ रहा था, तो यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि संस्थागत लापरवाही है। यह लापरवाही तब और खतरनाक हो जाती है, जब उसके नतीजे मौत के रूप में सामने आते हैं। आज भागीरथपुरा में जो हो रहा है, वह आने वाले कल की चेतावनी है। अगर जलदाय विभाग और प्रशासन ने इस घटना से सबक नहीं लिया, तो अगला आंकड़ा किसी और शहर, किसी और कॉलोनी से आ सकता है। सवाल सिर्फ 14 मौतों का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है, जो हर बार हादसे के बाद जागती है और फिर धीरे-धीरे सो जाती है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, जब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक हर मुआवजा सिर्फ एक औपचारिकता रहेगा। स्वच्छ शहर की चमकदार छवि के पीछे यह कड़वा सच छिपा है कि यहां भी लोग पानी के लिए तरसते हैं, यहां भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। जिन घरों में आज शोक है, वहां कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी। आज वहां खाली बर्तन और सूनी आंखें हैं। यह केवल इंदौर की नहीं, पूरे सिस्टम की हार है। यह समय आत्ममंथन का है। जलदाय विभाग को सिर्फ बयान देने से आगे बढ़कर ठोस सुधार करने होंगे। मंत्रियों को उल्टे-सीधे जवाब देने के बजाय जनता के सवालों का ईमानदारी से सामना करना होगा। और सबसे जरूरी, यह मानना होगा कि पानी की एक-एक बूंद की जिम्मेदारी किसी विभाग की फाइल नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी है। क्योंकि जब नल से पानी नहीं, मौत बहने लगे, तो कोई भी शहर स्वच्छ नहीं कहलाता। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस/03/01/26