पर्यटन को अक्सर आर्थिक विकास और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का साधन माना जाता है। यह रोजगार देता है, स्थानीय बाजारों को सक्रिय करता है और सांस्कृतिक धरोहरों को वैश्विक पहचान दिलाता है। लेकिन जब पर्यटन अनियंत्रित रूप से बढ़ता है, तो यह पर्यावरण और सामाजिक ढाँचे पर गंभीर दबाव डालता है। भारत के कई धार्मिक और सांस्कृतिक नगर इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। बनारस में बने कॉरिडोर का उदाहरण लें। शहर का भौगोलिक विस्तार सीमित है, लेकिन यहाँ प्रतिदिन लाखों लोग पहुँचते हैं। यदि रोज़ाना 10–15 लाख पर्यटक भ्रमण करने लगें, तो शहर की मूल व्यवस्था—जो स्थानीय नागरिकों के लिए बनी थी—ठप पड़ जाती है। यही हाल विन्ध्याचल, रामलला की नगरी अयोध्या और मथुरा जैसे नगरों का है। इन स्थानों पर पर्यटन से कुछ लोगों को रोजगार मिलता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भीड़ और प्रदूषण से स्थानीय जीवन असहनीय हो रहा है। साथ ही स्वच्छ जल, शौचालय, यातायात और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से नागरिकों की कठिनाई और बढ़ जाती है। पर्यावरणीय दृष्टि से स्थिति और भी चिंताजनक है। हाल ही में जारी रिपोर्टों के अनुसार भारत के 40 शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल हैं। 2025 में दिल्ली का एक्यूआई 400 – 450 रहा जबकि सरकारी आंकड़ा इसको 250 छूने में भी डर रहा था और पीएम 2.5 स्तर 96 µg/m³ तक। इसका अर्थ है कि पर्यटन और रोजगार के नाम पर नागरिकों को अपने स्वास्थ्य को जोखिम में डालना पड़ रहा है। भारत में प्रदूषण से होने वाली मौतें कोविड-19 से भी अधिक हैं। 2022 में ही पीएम 2.5 प्रदूषण से 17 लाख से अधिक मौतें दर्ज हुईं। पूर्व एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने इसे “साइलेंट पैंडेमिक” कहा है, जो कोविड से भी अधिक जानें ले रहा है। पिछले दशक में सांस रोगियों की संख्या कई गुना बढ़ी है, और सीओपीडी, अस्थमा, निमोनिया जैसी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। आयुष्मान योजना के तहत इलाज का बोझ सरकारी कोष पर भारी पड़ रहा है। पर्यटन से जितनी आय नहीं, उससे कहीं अधिक खर्च स्वास्थ्य पर हो रहा है। सकारात्मक पक्ष यह है कि पर्यटन से आय और सांस्कृतिक पहचान मिलती है। लेकिन यदि यह आय नागरिकों की साँसों की कीमत पर आती है, तो यह विकास नहीं बल्कि विनाश है। इको-टूरिज़्म और जिम्मेदार पर्यटन नीतियाँ इस समस्या का समाधान हो सकती हैं, परंतु इनके क्रियान्वयन में कठोरता और ईमानदारी आवश्यक है। निष्कर्षतः, पर्यटन का विस्तार तभी सार्थक है जब वह पर्यावरणीय संतुलन और नागरिक जीवन की गुणवत्ता को सुरक्षित रखे। अन्यथा, यह रोजगार का भ्रम पैदा करेगा और भविष्य में भयंकर परिणाम लेकर आएगा। सवाल यही है—क्या हम पर्यटन को विकास मानें या विनाश की ओर बढ़ते कदम। ईएमएस / 03 जनवरी 26