अख़बारों की सुर्खियाँ आज भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताकर जश्न मना रही हैं। कहा जा रहा है, जापान को भारत ने पीछे छोड़ दिया है। जर्मनी को भी भारत जल्द पीछे छोड़ देगा। सवाल यह है, इस बढ़ती अर्थव्यवस्था का आम आदमी की ज़िंदगी से क्या रिश्ता है? जिस देश में अमीरों, मध्यमवर्गी परिवारों और गरीबों के बीच में आर्थिक असमानता हो। जहां आय का बड़ा हिस्सा कुछ गिने-चुने हाथों में सिमटता जा रहा हो, वहां जीडीपी का आंकड़ा हकीकत नहीं बताता है। दुनिया की आबादी में भारत की आबादी 17 फ़ीसदी है। ब्रिटेन, जापान और जर्मनी की कुल आबादी मात्र तीन फ़ीसदी है। भारत की आबादी 140 करोड़ है। ब्रिटेन जर्मनी और जापान तीनों की आबादी मात्र 24 करोड़ है ऐसी स्थिति में जीडीपी को अर्थव्यवस्था का मानदंड मानना कहीं से भी उन देशों की बराबरी करने जैसा नहीं है। रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की ताज़ा फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट इसी हकीकत को उजागर कर रही है। रिपोर्ट बताती है कि मार्च 2025 तक भारत में घरेलू कर्ज जीडीपी के 41.3 प्रतिशत तक पहुंच गया है। जो पांच साल के औसत से भी ज्यादा है। यह कर्ज सरकार या राज्यों का नहीं है, बल्कि आम नागरिकों के सिर पर कर्ज का बोझ है। पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड, वाहन और घरेलू सामान के लिए लिया गया कर्ज, तेजी से बढ़ा है। इसका मतलब है, कि आम आदमी को कर्ज लेकर खर्च करना पड़ रहा है। जबकि उत्पादन, कारोबार और कृषि क्षेत्र से जुड़ा कर्ज व्यक्तिगत कर्ज की तुलना में कम है। इसका सीधा मतलब है, देश में कर्ज का बड़ा हिस्सा मध्य और निम्न वर्ग को कर्ज लेकर खर्च करना पड़ रहा है। बैंकों और अन्य माध्यमों से जो कर्ज लिया जा रहा है, उसका उपयोग आय बढ़ाने या रोजगार पैदा करने वाले निवेश के रूप में नहीं हो रहा है। यह अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। जब लोग टीवी, फ्रिज या रोजमर्रा की जरूरतें यहां तक की खाने-पीने, शादी-विवाह, टैक्स और पढ़ाई के लिए ईएमआई पर कर्ज लेने को मजबूर हों। तो यह संकेत है, मध्य एवं निम्न वर्ग की आमदनी जरूरतों के मुकाबले कम है। ऐसी स्थिति में जीडीपी की ग्रोथ चाहे 8 प्रतिशत से ऊपर दिखे, अर्थव्यवस्था की दृष्टि से यह एक खतरनाक संकेत है। जीडीपी में शेयर बाजार सहित अन्य कई चीज ऐसी शामिल हैं, जो जीडीपी को बेहतर बनाती हैं लेकिन आम आदमी की बदहाली का वास्तविक स्वरूप प्रदर्शित नहीं होता है। वर्तमान हालात बैंकिंग सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है। जिस तरह की स्थितियां बन गई हैं। लोगों की नौकरी छूट रही है, रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ता ही जा रहा है। अचानक खर्च आ जाए, तो कर्ज चुकाने में लोग सक्षम नहीं हो रहे हैं। जिनके कारण एनपीए भी बैंकों का बढ़ता चला जा रहा है। ईएमआई देने में देर होती है, तो ब्याज कई गुना बढ़ जाता है। इससे ग्राहक और बैंक दोनों ही तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। इसका बैंकिंग वित्तीय व्यवस्था पर असर दिखने लगा है। आरबीआई की रिपोर्ट कहती है, आम लोगों की सेविंग्स कम हो रही है, उनके ऊपर कर्ज बढ़ रहा है। वित्तीय स्थिति दिन प्रतिदिन कमजोर हो रही है। असल चिंता यह है, वर्तमान में जीडीपी का यह मॉडल टिकाऊ नहीं है। जब तक एमएसएमई, छोटे उद्योग, कृषि और रोजगार सृजन को प्राथमिकता नहीं मिलेगी, यह क्षेत्र विकसित नहीं होगा। तब तक उधार पर टिकी अर्थव्यवस्था देश की आर्थिक स्थिति को कमजोर ही बनाएगी। जीडीपी की रैंकिंग से ज्यादा ज़रूरी है, लोगों की क्रय शक्ति बढ़े, स्थिर रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसर तेजी के साथ बढ़ें। जीडीपी के चमकदार आंकड़ों के पीछे छिपी उधारी की अर्थव्यवस्था तथा गरीबों और अमीरों के बीच में बढ़ती आर्थिक असमानता भारत के लिए गंभीर संकट के रूप में कभी भी बदल सकता है। भारत की 140 करोड़ की आबादी में लगभग 80 करोड़ आबादी 5 किलो के मुफ्त अनाज तथा तरह-तरह की सरकारी योजनाओं पर आश्रित है। पिछले एक दशक में पूंजीपतियों की आय और संपत्ति में बड़ी तेजी के साथ इजाफा हो रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था और टैक्स में इस वर्ग का सबसे कम योगदान है। बैंकों द्वारा इसी पूंजीवादी व्यवस्था को सबसे ज्यादा संरक्षण दिया जा रहा है। हर साल उनके हजारों करोड रुपए का ऋण माफ कर दिया जाता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका बहुत बड़ा असर देखने को मिल रहा है जिसके कारण रोजगार भी ग्रामीण क्षेत्रों में घटा है। औद्योगिक उत्पादन भी लगातार घट रहा है। ऐसी स्थिति में शेयर मार्केट और अन्य निवेश के जरिए हम जीडीपी को कब तक विकास के मानक पर रख पाएंगे। यह सोचनीय विषय है। वैश्विक वित्तीय संस्थाओं भारत सरकार के आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए हैं। केंद्र सरकार राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं यहां तक की ग्राम पंचायतों के ऊपर जिस तरह से कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। 45 फ़ीसदी आबादी पर कर्ज का बोझ है। देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती है। केंद्र एवं राज्य सरकारों को वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखना होगा। गरीबों और अमीरों के बीच की आय को लेकर जो विसंगति पैदा हो रही है। उसे दूर करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने चाहिए। असंगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़े, निम्न एवं मध्यम वर्ग की आय बढ़े। इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। अन्यथा जिस तरह से बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और शिक्षा का खर्च बढ़ता ही चला जा रहा है, वह जन रोष के रूप में भी देखने को मिल सकता है। इस तरह के हालत बनना भारत में शुरू हो गए हैं। एसजे/ 4 जनवरी /2026