लेख
04-Jan-2026
...


:: सालों पहले की चेतावनियाँ अनदेखी रहीं, अब गईं बेकसूर ज़िंदगियाँ :: दूषित पेयजल के कारण इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में हुई मौतों ने भारत के “सबसे स्वच्छ शहर” की चमकदार छवि को गहरा धक्का पहुँचाया है और मध्यप्रदेश में सुरक्षित पेयजल आपूर्ति के सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भागीरथपुरा में सीवेज मिश्रित पानी पीने से कम से कम 16 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से बीमार हुए हैं। यह इलाका लगभग पूरी तरह नगर निगम की पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति पर निर्भर है। इस घटना ने न केवल प्रदेश बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है और शहरी जल अवसंरचना की कमजोर हकीकत सामने ला दी है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इंदौर में पानी की गुणवत्ता को लेकर आधिकारिक चेतावनियाँ सालों पहले ही दर्ज की जा चुकी थीं, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। :: अनदेखी रह गईं पुरानी चेतावनियाँ :: सरकारी रिकॉर्ड और आधिकारिक आकलनों के अनुसार वर्ष 2016–17 में इंदौर शहर के 58 स्थानों पर जल प्रदूषण की पहचान की गई थी, जिनमें भागीरथपुरा भी शामिल था। ये निष्कर्ष केंद्र और राज्य सरकार के जल गुणवत्ता निगरानी तंत्र के तहत सामने आए थे, यानी जल जीवन मिशन के बड़े पैमाने पर लागू होने से काफी पहले। इसके बावजूद दीर्घकालिक सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए। स्थानीय निवासियों ने बार-बार दुर्गंधयुक्त और मटमैले पानी की शिकायतें कीं, लेकिन उन्हें सामान्य पाइपलाइन समस्या मानकर टाल दिया गया। अब ये मौतें निगरानी, रखरखाव और जवाबदेही की प्रणालीगत विफलता को उजागर कर रही हैं। :: जल जीवन मिशन : आंकड़े मजबूत, सुरक्षा कमजोर :: केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन (JJM) योजना के तहत मध्यप्रदेश में नल कनेक्शन का तेजी से विस्तार हुआ है। 10 मार्च 2025 को राज्यसभा में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 46,423 जल आपूर्ति योजनाएँ ली गई हैं। 6 मार्च 2025 तक 75.88 लाख ग्रामीण परिवारों (67.86%) को कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन मिल चुका है, जबकि अगस्त 2019 में यह आंकड़ा मात्र 12.10% था। वर्ष 2019–20 से अब तक केंद्र सरकार ने मध्यप्रदेश को ₹26,952 करोड़ आवंटित किए हैं, जिनमें से ₹16,232 करोड़ का उपयोग हो चुका है। लेकिन सरकारी और संबद्ध सर्वे बताते हैं कि पहुंच बढ़ने के बावजूद पानी की गुणवत्ता गंभीर चिंता बनी हुई है। प्रदेश के 30 से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल प्रदूषण दर्ज किया गया है और कई नमूने मानव उपभोग के योग्य नहीं पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि नल कनेक्शन बिना नियमित जल परीक्षण और पाइपलाइन सुरक्षा के, जनस्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। :: अन्य राज्यों की तुलना में मध्य प्रदेश कहां खड़ा है? गोवा, हरियाणा, पंजाब और तेलंगाना जैसे राज्यों ने नल कनेक्शन के साथ-साथ जल गुणवत्ता परीक्षण, उपचार और स्थानीय निगरानी को भी प्राथमिकता दी है। इसके विपरीत मध्यप्रदेश आज भी पुरानी पाइपलाइनों, सीवेज रिसाव, तेज़ शहरी विस्तार और विभागीय समन्वय की कमी से जूझ रहा है। बार-बार “सबसे स्वच्छ शहर” का खिताब पाने वाले इंदौर में यह त्रासदी इस सवाल को जन्म देती है कि क्या कचरा प्रबंधन की सफलता ने पानी और स्वच्छता की गहरी खामियों को ढक दिया? :: निलंबन से आगे की ज़रूरत :: घटना के बाद अधिकारियों के निलंबन और मुआवजे की घोषणाएँ हुई हैं, लेकिन जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि त्रासदी के बाद की कार्रवाई, रोकथाम का विकल्प नहीं हो सकती। इंदौर की यह जल त्रासदी साफ संदेश देती है— साफ़ सड़कें, सुरक्षित पानी की गारंटी नहीं होतीं। मध्यप्रदेश के लिए अब चुनौती सिर्फ आंकड़े पूरे करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि स्वच्छ पेयजल को नीति नहीं, नागरिक का बुनियादी अधिकार माना जाए। (लेखक मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनितिक विश्लेषक हैं। ) ईएमएस/4 जनवरी 2025