राष्ट्रीय
03-Jan-2026


नई दिल्ली (ईएमएस)। 2026 की दहलीज पर खड़ी दुनिया तेज़ी से बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का सामना कर रही है। भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ता कर्ज़, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का विस्तार, व्यापार युद्ध और संरक्षणवादी नीतियां संकेत दे रहे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए संक्रमण काल में प्रवेश कर चुकी है। सारी दुनिया के देश आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में महंगाई, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव ने पारंपरिक आर्थिक ढांचे को चुनौती दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव, यूरोप में ऊर्जा संकट और विकासशील देशों पर बढ़ता ऋण बोझ वैश्विक आर्थिक अस्थिरता को और बढ़ा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं ने भी धीमी वैश्विक वृद्धि और वित्तीय जोखिमों को लेकर चेतावनी देना शुरू कर दी है। तकनीकी मोर्चे पर एआई और ऑटोमेशन ने उत्पादन, रोजगार और निवेश के स्वरूप मैं भारी बदलाव आया है। जहां एक ओर उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर नौकरियों पर संकट और आय असमानता बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन और हरित ऊर्जा में निवेश ने आर्थिक प्राथमिकताओं को नया मोड़ दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के बाद की दुनिया बहुध्रुवीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकती है। जहां वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव होगा। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक आपूर्ति श्रृंखलाएं और क्षेत्रीय आर्थिक गठजोड़ 2026 की वित्तीय व्यवस्था में नई पहचान बन सकते हैं। कुल मिलाकर, 2026 केवल एक कैलेंडर वर्ष नहीं है। बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बदलाव का संकेतक बनता दिख रहा है। सवाल यह नहीं कि बदलाव होगा या नहीं, बल्कि यह है, भारत सहित दुनिया के अन्य देश और संस्थाएं इस बदलाव का मुकाबला किस तरह से कर पाती हैं। एसजे/ईएमएस/03/01/2026