कर्नाटक की सियासत में एक बार फिर आईना जनता ने दिखाया है और इस बार यह आईना कांग्रेस नेतृत्व खासकर राहुल गांधी की उस राजनीति के सामने रखा गया है जो चुनावी हार के बाद बार बार संदेह और साजिश की भाषा बोलती है। जिस राज्य में कांग्रेस की सरकार है वहीं उसी सरकार के संरक्षण में कराए गए सर्वे ने राहुल गांधी के वोट चोरी अभियान की हवा निकाल दी है। यह कोई विपक्षी एजेंसी का दावा नहीं है बल्कि कांग्रेस शासित कर्नाटक में कराया गया वह सर्वे है जिसमें जनता ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं और ईवीएम पर उन्हें भरोसा है। यह परिणाम केवल एक आंकड़ा नहीं है बल्कि उस राजनीतिक सोच पर करारा तमाचा है जो हर हार के बाद संस्थाओं पर सवाल उठाकर लोकतंत्र को कमजोर करने का काम करती है। लोकतंत्र में जनता की राय सर्वोपरि होती है और जब जनता खुद यह कह दे कि चुनाव प्रक्रिया पर उसका भरोसा कायम है तो किसी भी नेता या पार्टी का नैतिक दायित्व बनता है कि वह उस भरोसे का सम्मान करे। कर्नाटक में कराए गए इस सर्वे में 91 प्रतिशत से अधिक लोगों ने यह माना कि देश और राज्य में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है क्योंकि यह उस राज्य से आया है जहां कांग्रेस सत्ता में है और जहां राहुल गांधी ने खुद वोट चोरी के आरोपों को सबसे मुखर तरीके से उठाया था। यदि वाकई चुनाव प्रक्रिया में कोई व्यापक गड़बड़ी होती तो सबसे पहले उसकी गूंज कांग्रेस के अपने गढ़ में सुनाई देती लेकिन यहां तो जनता ने बिल्कुल उलटा संदेश दिया है। राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह वोट चोरी का नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश की वह केवल राजनीतिक हताशा का उदाहरण था। हार के बाद आत्ममंथन करने के बजाय चुनाव आयोग और ईवीएम को कटघरे में खड़ा करना कांग्रेस की पुरानी आदत बन चुकी है। कर्नाटक में सितंबर 2025 में की गई प्रेस वार्ता में राहुल गांधी ने आलंद विधानसभा सीट के आंकड़ों का हवाला देकर यह आरोप लगाया था कि मतदाता सूची से विपक्षी समर्थकों के नाम हटाए गए। इस आरोप के आधार पर राज्य सरकार ने पत्र लिखे एसआईटी बनाई और जांच की प्रक्रिया शुरू हुई। लेकिन अब उसी राज्य में कराए गए सर्वे ने यह साफ कर दिया है कि जनता राहुल गांधी की इस कहानी से सहमत नहीं है। यह सर्वे बेंगलुरु बेलगावी कलबुगी और मैसूरु जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के 102 विधानसभा क्षेत्रों में कराया गया जिसमें 5100 लोगों से बातचीत की गई। इतने बड़े सैंपल का मतलब है कि यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि जमीनी सच्चाई को समझने की कोशिश थी। नतीजे बताते हैं कि अलग अलग क्षेत्रों में भी चुनाव प्रक्रिया पर भरोसे का स्तर काफी ऊंचा है। कहीं 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग निष्पक्षता की बात कर रहे हैं तो कहीं लगभग 70 प्रतिशत से अधिक लोग पूरी व्यवस्था पर भरोसा जता रहे हैं। यह विविधता के बावजूद एक समान संदेश देता है कि चुनावी संस्थाओं पर जनता का विश्वास अडिग है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस जिस नैरेटिव को गढ़ रही थी उसी को उसके अपने राज्य की जनता ने नकार दिया। यह स्थिति कांग्रेस के लिए दोहरी मुश्किल खड़ी करती है। एक तरफ वह राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग और ईवीएम पर सवाल उठाती है और दूसरी तरफ उसके अपने शासन वाले राज्य में जनता उन सवालों को खारिज कर देती है। इससे यह संदेश जाता है कि कांग्रेस की राजनीति तथ्यों पर नहीं बल्कि प्रचार पर आधारित है। यही कारण है कि बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी को लीडर ऑफ प्रोपेगेंडा कहकर संबोधित किया है। बीजेपी का यह पलटवार केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं है बल्कि उस हकीकत की ओर इशारा करता है जिसमें कांग्रेस हार को स्वीकार करने के बजाय संस्थाओं को बदनाम करने का रास्ता चुनती है। लोकतंत्र में हार जीत एक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन जब हार के बाद बार बार यह कहा जाए कि चुनाव ही गलत थे तो यह जनता के मत का अपमान बन जाता है। कर्नाटक के इस सर्वे ने यह साबित कर दिया है कि जनता खुद को इस तरह की राजनीति से दूर रखना चाहती है और उसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भरोसा है। राहुल गांधी की राजनीति में एक विरोधाभास साफ दिखाई देता है। एक तरफ वे संविधान और लोकतंत्र की रक्षा की बात करते हैं और दूसरी तरफ उसी लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया यानी चुनाव पर सवाल खड़े करते हैं। यदि चुनाव ही निष्पक्ष नहीं हैं तो फिर उनकी पार्टी कर्नाटक में सत्ता में कैसे आई यह सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठता है। कांग्रेस इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं देती क्योंकि सच्चाई यह है कि चुनाव तभी सही माने जाते हैं जब परिणाम उनके पक्ष में हों और जब परिणाम विपरीत हों तो वही चुनाव संदेहास्पद घोषित कर दिए जाते हैं। कर्नाटक का यह सर्वे कांग्रेस के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि जनता अब उस राजनीति को समझने लगी है जो हर हार के बाद बहाने ढूंढती है। अवसर इसलिए कि यदि कांग्रेस सचमुच लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखती है तो उसे इस जनमत को स्वीकार कर अपनी रणनीति बदलनी चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से अब तक कांग्रेस नेतृत्व से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है। उलटे वह हर मंच से वही पुराने आरोप दोहराता नजर आता है जिससे उसकी विश्वसनीयता और कमजोर होती जाती है। ईवीएम पर भरोसे का सवाल केवल तकनीक का नहीं बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का सवाल है। भारत में दशकों से चुनाव प्रक्रिया में सुधार होते रहे हैं और ईवीएम उसी सुधार का हिस्सा है। यदि आज 91 प्रतिशत से अधिक लोग यह कहते हैं कि चुनाव निष्पक्ष हैं तो इसका मतलब है कि व्यवस्था ने जनता का विश्वास अर्जित किया है। इस विश्वास को कमजोर करना किसी भी जिम्मेदार नेता का काम नहीं हो सकता। लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस बार बार वही काम करती दिखाई देती है जिससे यह सवाल उठता है कि क्या वे सच में लोकतंत्र को मजबूत करना चाहते हैं या केवल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रहे हैं। कर्नाटक की जनता ने इस सर्वे के जरिए यह भी दिखाया है कि वह भावनात्मक नारों के बजाय ठोस सच्चाई पर भरोसा करती है। वोट चोरी जैसे गंभीर आरोप केवल भाषणों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से साबित नहीं होते। इसके लिए ठोस प्रमाण चाहिए और जब प्रमाण नहीं होते तो ऐसे आरोप खुद आरोप लगाने वाले पर भारी पड़ जाते हैं। आज वही हो रहा है। राहुल गांधी का वोट चोरी अभियान अब उनके लिए बोझ बनता जा रहा है और कांग्रेस की साख को नुकसान पहुंचा रहा है। अखबार के इस आलेख के माध्यम से यह कहना जरूरी है कि लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सबको है लेकिन वह आलोचना जिम्मेदारी के साथ होनी चाहिए। चुनाव आयोग और पूरी चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठाना कोई हल्की बात नहीं है। इससे जनता के मन में संदेह पैदा होता है और लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। कर्नाटक का सर्वे इस बात का प्रमाण है कि जनता इन प्रयासों को नकार रही है और वह जानती है कि उसका वोट सुरक्षित है। अंत में यह कहा जा सकता है कि कर्नाटक की जनता ने राहुल गांधी और कांग्रेस को स्पष्ट संदेश दे दिया है। यह संदेश न केवल वोट चोरी के आरोपों को खारिज करता है बल्कि उस राजनीति को भी नकारता है जो हार के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करती है। कांग्रेस यदि सच में जनता की पार्टी बनना चाहती है तो उसे इस आईने में खुद को देखना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र पर भरोसा जनता का है न कि केवल राजनीतिक भाषणों का। यही इस सर्वे का सबसे बड़ा सबक है और यही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324,वरिष्ठ पत्रकारसहित्यकार,स्तम्भकार) ईएमएस / 05 जनवरी 26