भारत के सफाई के मामले में सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा रखने वाले मध्यप्रदेश के इंदौर शहर से दूषित पेयजल पीने से पंद्रह मौत और सैकड़ों की संख्या में बीमार होने की भयावह तस्वीर शर्मसार करने वाली है।इस से आंकड़ों और स्वच्छता के नीचे छिपी जमीनी हकीकत का पर्दाफाश होता है वहीं शहरी क्षेत्रों में भी पेयजल आपूर्ति की वास्तविक स्थिति का नंगा सच सामने आता है इस से यह भी पता चलता है कि हमारे सिस्टम में लापरवाही अव्यवस्था और बेशर्मी का शर्मनाक तंत्र काम कर रहा है जो किसी शिकायत का समाधान करने के स्थान पर उस पर परदेदारी कर छिपाने का प्रयास करता है यदि समय रहते दूषित पेयजल आपूर्ति की शिकायतों का निस्तारण किया जाता तो इतने सारे परिवार अपने सगे संबंधियों को खोकर गमजदा नही होते। आपको पता हो कि इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से छह दिन में 15 लोगों की मौत हो गई।पहले दिन आठ मरीजों की मौत की बात सामने आई और बीमार लोगों की संख्या 1100 से अधिक पहुंच गई। नगर निगम ने आनन-फानन में पानी के सैंपल जांच के लिए भेजे। प्रशासनिक कार्रवाई के तौर पर दो अधिकारियों को निलंबित किया गया और एक की सेवा समाप्त कर दी गई। जांच में पता चला कि नर्मदा जल लाइन के ऊपर और आसपास ड्रेनेज चैंबर बने हुए थे। इससे भी गंभीर तथ्य यह था कि एक पुलिस चौकी का टायलेट भी इसी पाइपलाइन के ऊपर बना दिया गया, जिससे सीवेज सीधे पेयजल लाइन में रिसने की आशंका पुख्ता हो गई। आपको बता दें कि घटना के बाद नगरिय विकास मंत्री कैलाश वर्गीय से जब एक चैनल के रिपोर्टर ने इस मामले में जानकारी मांगी तो मंत्री जी की प्रतिक्रिया बेहद आपत्ति जनक थी उनके लिए पेयजल से मौत की घटना सिर्फ घंटा भर थी। बाद में इसका विडियो सामने आने पर सरकार को बेहद अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि यह एक ऐसी त्रासद घटना है, जिसे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहनलाल यादव ने आपातकालीन स्थिति बताया है। चौतरफा आलोचनाओं के बीच मध्य प्रदेश सरकार ने आपातकालीन उपाय तेज कर दिए हैं, लेकिन यह समस्या ऐसी है कि जिसका स्थायी उपाय करने की जरूरत है। इस हादसे से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। इस एक हादसे ने देश के तमाम शहरों में लोगों को चिंता में डाल दिया है। देश के सबसे स्वच्छ शहर में अगर लोगों को जहरीला पानी मिल सकता है, तो बाकी शहरों का क्या हाल होगा? दूषित जल से नुकसान का सही आकलन करना जरूरी है। करीब 80 प्रतिशत बीमारियों और एक तिहाई मौतों के पीछे दूषित जल ही दोषी है। हालांकि, हमें यह भी देखना होगा कि दूषित जल के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं? इदौर की घटना न केवल चिंता पैदा करती है, बल्कि शहरी प्रशासन के दावों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। हाल ही में सामने आए दूषित जल आपूर्ति के मामलों ने नागरिकों के स्वास्थ्य, भरोसे और बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता पर सीधा असर डाला है। स्वच्छता रैंकिंग में शीर्ष पर रहने वाला शहर यदि सुरक्षित पेयजल भी सुनिश्चित नहीं कर पा रहा, तो यह व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार का संकेत है। दूषित जल की समस्या अक्सर पाइपलाइन में लीकेज, सीवेज लाइनों के साथ क्रॉस कनेक्शन, पुराने इंफ्रास्ट्रक्र, और नियमित जल-गुणवत्ता जांच की कमी से पैदा होती है। बारिश के मौसम में यह खतरा और बढ़ जाता है, जब जल भराव और दवाव में बदलाव से गंदा पानी सप्लाई लाइनों में प्रवेश कर जाता है। परिणामस्वरूप, डायरिया, पीलिया और अन्य जलजनित रोगों का जोखिम बढ़ जाता है, जिसकी कीमत आम नागरिक को अपनी सेहत से चुकानी पड़ती है। इंदौर के मामले में अभी जो तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार, सीवेज लाइन में रिसाव था और वह जलापूर्ति लाइन से होकर गुजर रही थी। यह अपनी तरह का कोई पहला मामला नहीं है। ऐसा अनेक जगहों पर हुआ है और समय रहते समाधान के उपाय भी किए गए हैं। दरअसल, जहां लोग जागरूक हों और स्थानीय निकाय अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाता हो, वहां दूषित आपूर्ति को रोकना आसान है। इंदौर में ऐसा हो सकता है कि दूषित जल पर देर से ध्यान गया हो। इंदौर में ऐसे अनेक सवाल खड़े हुए हैं, जो देश के दूसरे शहरों पर भी लागू होतेहैं। क्या पेयजल की गुणवत्ता का परीक्षण नियमित रूप से किया जाता है? क्या पेयजल की गुणवत्ता में आ रहे बदलावों पर नजर रखी जाती है? क्या यह देखा जाता है कि जलापूर्ति तंत्र या सीवेज तंत्र कितना पुराना हो गया है? कितने साल या दशक के बाद इस तंत्र का नवीनीकरण करना चाहिए ? इंदौर की दुखद घटना साफ संकेत है कि देश के अच्छे शहरों में भी जलापूर्ति तंत्र को तत्काल ठीक करने की जरूरत है। एक बड़ी समस्या यह भी है कि कई शहरों और कस्बों में पानी और सीवर की सप्लाई लाइनें एक साथ या बहुत पास बिछी हुई हैं। पाइपलाइन में लीकेज या कम प्रेशर की स्थिति में बैक्टीरिया, वायरस और केमिकल सीधे घरों तक पहुंच जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी साफ कर चुका है कि सुरक्षित पेयजल के लिए वॉटर और सीवर लाइन का पूरी तरह अलग होना, नियमित मेंटेनेंस और समय-समय पर टेस्टिंग बेहद जरूरी है। आज जिस दौर में हम हैं, वहां गांव हो या शहर, हम कभी भी पेयजल गुणवत्ता से समझौता नहीं कर सकते। यह देश के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है, जिसमें निवेश बढ़ाना देश के विकास के लिए बहुत जरूरी है। एक मोटे अनुमान के अनुसार, देश के अधिकांश शहरों में व्यवस्थित सीवेज तंत्र का अभाव है। पिछले साल वर्ल्ड वाटर वीक 2025 में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ ने 2000 से 2024 तक की संयुक्त रिपोर्ट जारी की। जेएमपी के इस ग्लोबल डेटा के अनुसार, लगभग 2.1 अरब लोग अभी भी साफ और प्रबंधित पेयजल तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। वहीं, यूनिसेफ के भारत प्रोग्राम के आंकड़े भी चिंताजनक थे। रिपोर्ट में बताया गया कि देश में लाखों लोग अभी भी सुरक्षित पानी से वंचित हैं और केवल 50 प्रतिशत से भी कम आबादी के पास ही सुरक्षित जल उपलब्ध है। इसके अलावा, कई राज्यों में भूजल की स्थिति गंभीर हो गई है, जिसमें नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और अन्य भारी धातुएं अनुमेय सीमा से कहीं अधिक पाई गई हैं। खासकर ग्रामीण इलाकों में पानी की सुरक्षा और गुणवत्ता एक बड़ा खतरा बनी हुई है। अगर देश में 70 एमएलडी दूषित जल पैदा होता है, तो उसमें से महज 30 एमएलडी जल के शोधन की क्षमता है। बगैर-शोधन के जब दूषित जल मिट्टी में मिलता है, तो जाहिर है, जल व मिट्टी, दोनों की हानि होती है। इंदौर जैसे कथित स्वस्थ शहर में खतरे की एक घंटी बजी है और यह पूरे देश के जागने का समय है। यह मामला केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी परीक्षा है। पृथ्वी की सतह का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा पानी से ढका हुआ है। हालांकि, 97 प्रतिशत पानी समुद्री है। 3 प्रतिशत पानी ही मीठा है जिसे फ्रेश वाटर भी कहा जाता है। अगर इस 3 प्रतिशत पानी में ही जहर घुलने लगे तो क्या होगा। इंदौर में पानी की वजह हुई मौतों ने एक बार फिर साफ पानी का मुद्दा उठा दिया है। हालांकि, ये भारत या पूरी दुनिया में पहली बार नहीं हुआ। पानी की वजह से रोजाना कई जिंदगिया खत्म हो रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ समय-समय पर अलर्ट करता रहा है कि असुरक्षित पेयजल गंभीर खतरा है और हर व्यक्ति तक शुद्ध और प्रबंधित पेयजल पहुंचना जरूरी है। साथ ही ये भी ध्यान में दिलाया कि जिन देशों में पानी की गुणवत्ता खराब है वहां, स्वास्थ्य व्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा और विकास की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2024 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्राउंडवाटर व्यापक रूप से प्रदूषित हो चुका है। रिपोर्ट में लिए गए नमूनों में नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक और यूरेनियमजैसी तत्वों की मात्रा परमिसिबल लिमिट से अधिक पाई गई है। देश के कई राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, पंजाब, बिहार और तेलंगाना हॉटस्पॉट के रूप में सामने आए हैं, जहां स्थिति गंभीर है। लंबे समय तक फ्लोराइड अधिक मात्रा में रहने से दांत और हड्डियों की समस्याएं बढ़ रही हैं, जबकि आर्सेनिक के कारण कैंसर और त्वचा रोग जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। इन हालातों को देखते हुए देश भर में पेयजल की सुरक्षित और स्वस्थ व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है । (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 5 जनवरी /2026