लेख
05-Jan-2026
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(06 जनवरी विश्व युद्ध अनाथ दिवस) युद्ध अनाथों का विश्व दिवस प्रतिवर्ष 6 जनवरी को मनाया जाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य दुनिया भर के उन निर्दोष बच्चों की व्यथा को वैश्विक मंच पर लाना है, जिन्होंने युद्ध की आग में अपने माता-पिता और अपना घर खो दिया है। जब दो देशों या गुटों के बीच सशस्त्र संघर्ष होता है, तो उसकी सबसे भारी कीमत अक्सर बच्चे ही चुकाते हैं। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि यह हजारों परिवारों को उजाड़ देता है और बच्चों को एक ऐसे अंधेरे भविष्य की ओर धकेल देता है जहाँ न तो सिर पर साया होता है और न ही मन में सुरक्षा का भाव। युद्ध के कारण अनाथ हुए इन बच्चों को विस्थापन की कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ता है, जहाँ उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी बनकर शिविरों में रहना पड़ता है। गरीबी और संसाधनों की कमी उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिससे उन्हें पर्याप्त भोजन, साफ पानी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ भी नहीं मिल पातीं। शिक्षा, जो किसी भी बच्चे के विकास की नींव होती है, युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में पूरी तरह ठप हो जाती है, जिससे इन बच्चों का भविष्य और भी असुरक्षित हो जाता है। युद्ध अनाथों के विश्व दिवस का प्राथमिक उद्देश्य उन मासूम बच्चों के अधिकारों के लिए पुरज़ोर तरीके से आवाज़ उठाना एवं उनके लिए संसाधनो को मुहैय्या कराने की ज़िम्मेदारी को उठाना जिनका जीवन युद्ध की विभीषिका ने पूरी तरह बदल दिया है। यह दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है, बल्कि सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों और आम नागरिकों के लिए एक सामूहिक आह्वान है कि वे आगे आएं और इन बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए ठोस कदम उठाएं। इस दिन का सबसे बड़ा लक्ष्य दुनिया को यह समझाना है कि युद्ध में अनाथ हुए बच्चे केवल भोजन या कपड़ों के मोहताज नहीं हैं, बल्कि उन्हें कानूनी सुरक्षा, नागरिकता की पहचान और एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का पूरा अधिकार है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए 6 जनवरी को दुनिया भर में जागरूकता बढ़ाने वाले विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें सेमिनार, शांति मार्च और डिजिटल अभियान प्रमुख हैं। इन पहलों के जरिए उन चुनौतियों को उजागर किया जाता है जिनका सामना ये बच्चे हर दिन करते हैं, जैसे कि शिक्षा से वंचित रहना, जबरन मजदूरी में धकेला जाना या युद्ध अपराधी समूहों द्वारा उनका शोषण किया जाना। आज जब हम आधुनिकता और मानवाधिकारों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तब युद्ध झेल रहे मुल्कों की बदतर होती स्थिति हमारे दावों की पोल खोल देती है। मासूम बच्चे, जिनका राजनीति या सत्ता के संघर्ष से कोई लेना-देना नहीं होता, सबसे ज्यादा प्रताड़ित होते हैं। वे या तो अपने ही देश में बने तंग राहत शिविरों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर हैं, या फिर उन्हें शरणार्थी बनाकर उनके देश से निकाल दिया जाता है। यदि हम खुद को मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध कहते हैं और फिर भी इन बच्चों की पीड़ा को नजरअंदाज करते हैं, तो मूल्यांकन करने पर हम मानवता के पैमाने पर बहुत पीछे खड़े नजर आएंगे। यह एक यक्ष प्रश्न है कि यदि कोई बच्चा युद्ध की आग के कारण अपना घर, अपना बचपन और अपना मुल्क खो चुका है, तो क्या उसे केवल विदेशी या बोझ मानकर दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए? शरणार्थी संकट के दौरान अक्सर देशों की सीमाएं इन मासूमों के लिए बंद कर दी जाती हैं, जो कि नैतिकता की हार है। हमें यह सोचना होगा कि यदि ईश्वर ने उसे इस दुनिया में जन्म दिया है, तो क्या इस विशाल धरती पर उसके लिए दो गज जमीन और सर ढकने के लिए एक छत का भी अधिकार नहीं है? क्या किसी बच्चे का अस्तित्व केवल उसके पासपोर्ट या नागरिकता के दस्तावेजों तक सीमित है? सच्चाई यह है कि धरती की कोई भी सीमा उस मानवीय अधिकार से बड़ी नहीं हो सकती, जो हर बच्चे को सुरक्षा और गरिमा प्रदान करती है। यदि हम ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि पूरी पृथ्वी ही ईश्वर का घर है और यहाँ जन्म लेने वाला प्रत्येक जीव यहाँ रहने का जन्मसिद्ध अधिकार रखता है। मानवीय मूल्यों का दिखावा करने के बजाय अब समय है कि दुनिया वसुधैव कुटुंबकम पूरी पृथ्वी एक परिवार है के सिद्धांत को धरातल पर उतारे। किसी भी बच्चे को केवल इसलिए नकारा नहीं जाना चाहिए क्योंकि उसका मुल्क युद्ध की भेंट चढ़ गया। उन्हें संरक्षण देना, उन्हें अपनाना और उनके जीवन को पुनः संवारना ही ईश्वर की सच्ची सेवा और मानवता की वास्तविक जीत है। (लेखक पत्रकार हैं ) ईएमएस / 05 जनवरी 26