वेनेजुएला को लेकर एक बार फिर दुनिया की भू-राजनीति उबाल पर है। जिस देश के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, वही देश आज राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक बदहाली और अंतरराष्ट्रीय दबावों के चक्रव्यूह में फंसा है। अमरीका द्वारा राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने, तेल उद्योग में सीधे दखल और सत्ता परिवर्तन की मंशा से जुड़ी खबरों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या यह सब लोकतंत्र की रक्षा के लिए है या फिर संसाधनों पर नियंत्रण की वही पुरानी कहानी, जो इराक से लेकर पनामा तक दोहराई जाती रही है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के कथित बयान कि वेनेजुएला का तेल अब अमरीका की भागीदारी से चलेगा। केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि दशकों पुरानी रणनीति की गूंज हैं। वेनेजुएला का तेल साधारण नहीं है। यह भारी, गाढ़ा क्रूड है, जिसे रिफाइन करने की क्षमता अमरीका की बड़ी रिफाइनरियों के पास है। कभी एक समय था जब अमरीका प्रतिदिन लाखों बैरल तेल वेनेजुएला से आयात करता था। बाद में प्रतिबंधों, राजनीतिक टकराव और आंतरिक संकट के चलते यह सिलसिला टूट गया। आज वही तेल, वही जरूरत और वही भूख एक बार फिर वैश्विक राजनीति को दिशा दे रही है। मादुरो को लेकर अमरीका का आरोप रहा है कि उनका शासन तानाशाही, भ्रष्ट और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। इसमें संदेह नहीं कि वेनेजुएला के भीतर आर्थिक संकट गहरा है, जनता महंगाई, बेरोजगारी और जरूरी वस्तुओं की कमी से जूझ रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी देश के आंतरिक संकट का समाधान बाहरी सैन्य या राजनीतिक हस्तक्षेप है। क्या लोकतंत्र की स्थापना बमों, गिरफ्तारियों और तेल समझौतों के जरिए की जा सकती है। इतिहास इस सवाल का जवाब देता है, लेकिन वह जवाब अमरीका के पक्ष में कम ही जाता है। इराक में सद्दाम हुसैन को हटाने के पीछे भी हथियारों और लोकतंत्र की दुहाई दी गई थी। नतीजा क्या हुआ, यह दुनिया ने देखा। लीबिया में गद्दाफी के पतन के बाद स्थिरता आई या अराजकता, यह भी किसी से छिपा नहीं। पनामा में मैनुअल नौरिएगा की गिरफ्तारी, हैती और आइवरी कोस्ट में सत्ता परिवर्तन, चेकोस्लोवाकिया में बाहरी दबाव हर जगह एक ही पैटर्न दिखता है। पहले नैतिकता की भाषा, फिर रणनीतिक हित और अंत में संसाधनों पर नियंत्रण। वेनेजुएला के मामले में यह पैटर्न और भी साफ दिखता है। एक ओर रूस, चीन और ईरान जैसे देश खुलकर अमरीकी हस्तक्षेप की निंदा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वेनेजुएला को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार है। दूसरी ओर अमरीका इसे लोकतंत्र की बहाली के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन जब किसी हमले के तुरंत बाद तेल उद्योग में बड़े पैमाने पर अमरीकी भागीदारी की घोषणा होती है, तो संदेह स्वाभाविक है। डॉनल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति इसी संदेह को और गहरा करती है। यह नीति मूल रूप से अमरीकी हितों को सर्वोपरि रखने की बात करती है, चाहे इसके लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों, संप्रभुता और कूटनीतिक मर्यादाओं को क्यों न ताक पर रखना पड़े। सवाल यह नहीं है कि कोई देश अपने हितों की रक्षा करे या नहीं, सवाल यह है कि क्या किसी दूसरे देश की कीमत पर ऐसा करना जायज है। मादुरो को पकड़ना सही था या गलत, इसका उत्तर एकतरफा नहीं हो सकता। यदि मादुरो ने अपने देश के संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानवाधिकारों का उल्लंघन किया है, तो इसका निर्णय वेनेजुएला की जनता और वहां की न्यायिक व्यवस्था को करना चाहिए। बाहरी ताकतों द्वारा किसी राष्ट्रपति को हटाना या पकड़ना अंतरराष्ट्रीय कानून की आत्मा के खिलाफ जाता है। यह न केवल उस देश की संप्रभुता को चोट पहुंचाता है, बल्कि भविष्य में और अधिक अस्थिरता को जन्म देता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि वेनेजुएला की सड़कों पर मादुरो के समर्थन में उतरे लोग सिर्फ किसी नेता के समर्थक नहीं हैं, बल्कि वे उस डर की अभिव्यक्ति हैं कि कहीं उनका देश एक बार फिर किसी वैश्विक शक्ति के प्रयोगशाला में न बदल जाए। लैटिन अमरीका का इतिहास ऐसे प्रयोगों से भरा पड़ा है, जहां बाहरी हस्तक्षेप ने दशकों तक घाव दिए हैं। अमरीका के भीतर भी इस तरह की कार्रवाइयों पर सवाल उठते रहे हैं। क्या सचमुच लोकतंत्र बंदूक की नली से निर्यात किया जा सकता है। क्या किसी देश की जनता की तकलीफों का समाधान उसके प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण से होगा। वेनेजुएला का संकट जटिल है। यह सिर्फ मादुरो बनाम विपक्ष का मामला नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिबंधों, तेल कीमतों, आंतरिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय दबावों का मिश्रण है। इसे एक व्यक्ति की गिरफ्तारी से हल करना सरलीकरण होगा। ट्रंप सही थे या गलत, यह सवाल भी इसी जटिलता से जुड़ा है। उनके समर्थक कहेंगे कि अमरीका ने अपने रणनीतिक और ऊर्जा हितों की रक्षा की। आलोचक कहेंगे कि यह साम्राज्यवादी सोच का नया संस्करण है। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है। लेकिन इतना तय है कि जिस क्षण लोकतंत्र की भाषा तेल के सौदों से जुड़ जाती है, उस क्षण नैतिकता कमजोर पड़ने लगती है। दुनिया आज बहुध्रुवीय हो रही है। रूस, चीन और अन्य ताकतें अब हर मामले में अमरीका की अगुवाई स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वेनेजुएला का मुद्दा इसी बदलती वैश्विक व्यवस्था का प्रतीक है। यह सिर्फ एक देश या एक राष्ट्रपति की कहानी नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें संसाधन, सत्ता और सिद्धांत आमने-सामने खड़े हैं। अंततः सवाल यह होना चाहिए कि वेनेजुएला की जनता क्या चाहती है। शांति, स्थिरता और सम्मानजनक जीवन। यह लक्ष्य बाहरी दखल से नहीं, बल्कि संवाद, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आंतरिक सुधारों से हासिल हो सकता है। यदि अमरीका सचमुच लोकतंत्र और मानवाधिकारों के पक्ष में है, तो उसे तेल से पहले इंसान को प्राथमिकता देनी होगी। वरना इतिहास एक बार फिर यही लिखेगा कि सत्ता के खेल में आदर्श हार गए और तेल जीत गया। (वरिष्ठ पत्रकार, सहित्यकार,स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 6 जनवरी /2026