लेख
07-Jan-2026
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(श्रद्धांजलि लेख ) साहस,जीवटता जिनके आभूषण रहे हर कठिनाई जिनकी जिनकी दासी रही डर जिनकी देहरी पर कभी टिक न सका मुश्किलें जिनके सामने सदा हारती रही ऐसे जांबाज का कैंसर से हार जाना हौंसलो का मर जाना नही हो सकता न शरीर से मर जाने से आत्मा मरा करती है। इसलिए शरीर से न सही मगर आत्मा रूप में रुड़की के वरिष्ठ पत्रकार शाहनवाज खान सदैव अपनी निष्पक्ष व निर्भीक पत्रकारिता के कारण सदैव जीवित रहेंगे।पत्रकार दीपक मिश्रा ने सही ही कहा कि पत्रकारिता और ईमानदारी क्या होती है, इसका भान उन्हें और हमे राव शाहनवाज खान ने कराया।क्या अधिकारी, क्या नेता—सबके सब उनके व्यक्तित्व का लोहा उनके जीवनपर्यंत मानते रहे।वही उनके साथ पत्रकारिता में वर्षों तक कंधे से कंधा मिलाकर चले वरिष्ठ पत्रकार सुभाष सैनी के शब्दों में, रुड़की में मेरे साथ 15 वर्षों तक पत्रकारिता क्षेत्र में सेवाएं देने वाले ढंडेरा रुड़की के मूल के राव शाहनवाज खान अब इस दुनिया में नहीं रहे। उन्होंने जॉली ग्रांट अस्पताल में अंतिम सांस ली है। वे पिछले 12 वर्षों से गले के कैंसर से पीड़ित थे लेकिन वे जिस प्रकार का हौसला पत्रकारिता में रखते थे इसी हौसलें से अंतिम समय तक उन्होंने कैंसर की बीमारी से अपनी जंग जारी रखी। हम उन्हें सम्मान से खान साहब कहा करते थे।‌ वे ही सुभाष सैनी को साप्ताहिक सदाचार टाइम्स से वर्ष 1987-88 में दैनिक बद्री विशाल में लाये थे।‌ फिर सन 1989 में दैनिक जागरण में सुभाष सैनी के प्रभारी रहते हुए खान साहब ने उनका 15 वर्षों तक साथ निभाया ,जिसे वे आज भी याद रखते है।सुभाष सैनी के शब्दों, खान साहब कठोर स्वभाव के जरुर थे लेकिन जिसे जबान देते थे, उसका साथ नहीं छोड़ते थे। उन्होंने बद्री विशाल, हिमाचल टाइम्स, दैनिक जागरण तथा प्रधान टाइम्स में अपनी सेवाएं दी। खान साहब अविवाहित थे ।उनके पिताजी का काफी दिन पहले इंतकाल हो गया था जबकि उनकी माताजी खान साहब की देखभाल में लगी रहती थी। इसी तरह मुनव्वर अली साबरी कहते है कि वरिष्ठ पत्रकार राव शाहनवाज खां के निधनकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकेगी। वे न केवल एक सशक्त और निर्भीक पत्रकार थे, बल्कि पत्रकारिता के एक मजबूत स्तंभ और मूल्यों के संवाहक भी थे। उनका संपूर्ण जीवन सत्य, निष्पक्षता और जनहित के लिए समर्पित रहा। राव शाहनवाज खां अपने कर्म, विचार और लेखनी से सदैव पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत रहे। उनके मार्गदर्शन और अनुभव से अनेक युवा पत्रकारों ने सीख ली और आगे बढ़ने की दिशा पाई। उनका स्नेह, सरल स्वभाव और समाज के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण सदैव स्मरणीय रहेगा। उनकी बेबाकी और सत्य के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें एक विशिष्ट पहचान देती थी।वास्तव में ​बेबाक पत्रकारिता के एक सशक्त हस्ताक्षर, राव शाहनवाज़ का जाना,एक बड़े हस्ताक्षर का खो जाना है।​एक निडर और निष्पक्ष कलम के रूप में उनकी पहचान एक ऐसे पत्रकार के रूप में थी, जिन्होंने कभी भी सत्ता या व्यवस्था के सामने अपनी कलम को झुकने नहीं दिया। वह अपनी बेबाकी के लिए मशहूर रहे। समाज के दबे-कुचले लोगों की समस्याओं को शासन-प्रशासन तक पहुँचाना उनकी प्राथमिकता रही। उनकी रिपोर्टिंग में एक धार थी, जो सच को बिना किसी डर के कहने का साहस रखती थी। ​दशकों तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहते हुए उन्होंने कई युवा पत्रकारों को राह दिखाई। रुड़की की गलियों से लेकर राजधानी के गलियारों तक, उनकी लेखनी का सम्मान किया जाता था। उन्होंने पत्रकारिता को केवल एक पेशे के रूप में नहीं, बल्कि एक मिशन के रूप में जिया।राव ​शाहनवाज़ का जाना एक खालीपन छोड़ गया है, जिसे भर पाना मुश्किल है। उनकी कमी हर उस व्यक्ति को खलेगी जो सत्य और न्याय की बात करता है। उनकी बेबाक बातें और निडर स्वभाव हमेशा हमारी यादों में जीवित रहेंगे। ​उनकी कलम की स्याही सूख सकती है, पर उनके शब्द और साहस हमेशा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।उनके बारे में कुछ खास बातें ओर है,जिनमे उनकी अखबारों को सहेजकर रखने की आदत लाजवाब थी,उनके कार्यालय में आज भी दशकों पुराने अखबार तिथिवार करीने से रखे हुए मिल जाएंगे।वे दूसरों की पीड़ा,दुसरो की समस्याओं को अपने सिर ओढ़ लेते थे।मेरे पास जब भी आते किसी न किसी की समस्या लेकर आते और जब तक उस समस्या को विस्तार से बता न लेते और फिर उसका समाधान न करवा लेते उन्हें चैन नही पड़ता था।एक बार प्रेस वार्ता के नाम पर पत्रकार संगठन द्वारा पैसे लिए जाने को मैंने विरोध कर पत्रकार वार्ताओं का बहिष्कार दैनिक हिंदुस्तान में रहते हुए किया तो राव शाहनवाज मेरे समर्थन में चट्टान की तरह आकर खड़े रहे और जब तक उक्त व्यवस्था बंद नही करा दी तब तक मैं ऒर वे किसी पत्रकार वार्ता में नही गए।ऐसे अपने दिलदार राव साहब को शत शत नमन। (लेखक 35 वर्षो से पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में सक्रीय है) ईएमएस / 07 जनवरी 26