जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू का नाम आते ही देश की राजनीति, वैचारिक टकराव और राष्ट्रवाद बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस अपने-आप केंद्र में आ जाती है। एक बार फिर ऐसा ही हुआ है। 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद जेएनयू के साबरमती हॉस्टल के बाहर आधी रात को नारेबाजी हुई। इन नारों को लेकर न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन सक्रिय हुआ, बल्कि सियासी गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। मामला अब केवल कैंपस अनुशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि लोकतंत्र में विरोध की सीमा क्या है और राष्ट्र की संवैधानिक संस्थाओं के फैसलों पर असहमति जताने का तरीका कैसा होना चाहिए। घटना के अनुसार, शुरुआत में यह जमावड़ा एक स्मृति दिवस तक सीमित था, लेकिन जैसे ही जमानत याचिकाएं खारिज होने की खबर आई, माहौल अचानक बदल गया। आरोप है कि वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े कुछ छात्रों और छात्रसंघ पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे लगाए। जेएनयू प्रशासन ने इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि कैंपस की शांति और गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा और दोषियों की पहचान कर सख्त कार्रवाई होगी। दूसरी ओर, छात्रसंघ की ओर से यह दलील दी जा रही है कि लगाए गए नारे वैचारिक थे, किसी व्यक्ति पर व्यक्तिगत हमला नहीं थे और यह विरोध का एक रूप था। यही वह बिंदु है जहां से बहस और गहरी हो जाती है। क्या देश के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस तरह की नारेबाजी को केवल वैचारिक असहमति कहकर टाला जा सकता है, या फिर यह सार्वजनिक शांति और संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने का मामला बनता है? राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी इस विवाद को और धार देती हैं। सत्तारूढ़ दल और उसके नेताओं ने इसे राष्ट्रविरोधी मानसिकता करार दिया है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने जेएनयू को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का अड्डा बताते हुए तीखी टिप्पणी की, वहीं दिल्ली सरकार में मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा को शर्मनाक बताया। इसके उलट, कांग्रेस नेता उदित राज ने प्रदर्शन का बचाव करते हुए कहा कि यह नाराजगी जताने का तरीका है और उमर खालिद व शरजील इमाम के साथ अन्याय हुआ है। यह बयानबाजी बताती है कि कैंपस की एक घटना किस तरह राष्ट्रीय राजनीति का औजार बन जाती है। असल सवाल यह है कि जेएनयू बार-बार ऐसे विवादों का केंद्र क्यों बनता है। इसका जवाब उसके इतिहास और वैचारिक संरचना में छिपा है। जेएनयू लंबे समय तक वामपंथी विचारधारा का गढ़ रहा है। यहां बहस, असहमति और सत्ता के खिलाफ सवाल पूछना अकादमिक संस्कृति का हिस्सा रहा है। पिछले एक दशक में, जब से एबीवीपी जैसे दक्षिणपंथी छात्र संगठन मजबूत हुए हैं, कैंपस में लेफ्ट और राइट के बीच वैचारिक संघर्ष और तेज हो गया है। किसी भी बड़े राष्ट्रीय मुद्दे पर यहां प्रतिक्रिया तीखी और मुखर दिखाई देती है। एक पक्ष इसे लोकतंत्र की जीवंतता मानता है, तो दूसरा इसे राष्ट्रविरोधी एजेंडा करार देता है। लेकिन हर विरोध की एक मर्यादा होती है। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी का अर्थ यह नहीं कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया जाए या न्यायपालिका के फैसलों को सड़कों पर नारेबाजी के जरिए चुनौती दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिकाएं खारिज करते समय कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला दिया है। इससे असहमति हो सकती है, लेकिन असहमति का रास्ता कानूनी और संवैधानिक होना चाहिए। नारेबाजी अगर भड़काऊ है और सार्वजनिक शांति भंग करती है, तो वह अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में उचित नहीं ठहराई जा सकती। यह भी सच है कि जेएनयू केवल विवादों का नाम नहीं है। इसी विश्वविद्यालय ने देश को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत विनायक बनर्जी, नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत, सीताराम येचुरी और पी. साईनाथ जैसी शख्सियतें दी हैं। यह तथ्य याद दिलाता है कि किसी संस्थान को कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी तरह खारिज करना भी गलत है। समस्या संस्थान नहीं, बल्कि वह माहौल है जिसमें असहमति अक्सर अराजकता का रूप ले लेती है। अब जिम्मेदारी कई स्तरों पर बनती है। विश्वविद्यालय प्रशासन को निष्पक्ष और पारदर्शी कार्रवाई करनी होगी ताकि संदेश जाए कि कैंपस में अनुशासन सर्वोपरि है, लेकिन कार्रवाई बदले की भावना से नहीं, नियमों के तहत हो। छात्रों को भी यह समझना होगा कि वैचारिक संघर्ष का मतलब व्यक्तिगत अपमान या हिंसक भाषा नहीं है। अकादमिक परिसर बहस के लिए होते हैं, उत्तेजना फैलाने के लिए नहीं। सत्तारूढ़ सरकार से अपेक्षा है कि वह इस तरह की घटनाओं को केवल राजनीतिक चश्मे से न देखे। हर विरोध को राष्ट्रविरोधी ठहराना समस्या का समाधान नहीं है। सरकार को युवाओं की बेचैनी, असहमति और सवालों को संवाद के जरिए संबोधित करने की जरूरत है। साथ ही, कानून का सख्ती से पालन भी आवश्यक है ताकि कोई यह न समझे कि विश्वविद्यालय परिसर कानून से ऊपर हैं। संतुलन बनाना सरकार की जिम्मेदारी है, दमन और उदासीनता दोनों ही नुकसानदेह हैं। विपक्ष की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सत्ता से सवाल पूछना है, लेकिन हर विवाद में बिना तथ्यों की पूरी समझ के किसी भी प्रदर्शन का अंध समर्थन करना भी गलत संदेश देता है। विपक्ष को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ-साथ संवैधानिक मर्यादाओं के पक्ष में है। यदि नारेबाजी की भाषा आपत्तिजनक है, तो उसे गलत कहने का साहस भी विपक्ष को दिखाना चाहिए। तभी वह एक जिम्मेदार विपक्ष कहलाएगा। अंततः, जेएनयू का यह विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है। क्या हम असहमति को संभालना सीख पा रहे हैं? क्या हमारी राजनीति हर मुद्दे को ध्रुवीकरण में बदलने के बजाय समाधान की ओर ले जा रही है? विश्वविद्यालयों का काम समाज को सोचने वाले नागरिक देना है, न कि स्थायी टकराव का मैदान बनना। अगर जेएनयू को सच में देश का बौद्धिक केंद्र बनाए रखना है, तो वहां अभिव्यक्ति की आज़ादी और अनुशासन के बीच संतुलन कायम करना होगा। यह बवाल केवल एक रात की नारेबाजी नहीं है। यह हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है। सरकार, विपक्ष, विश्वविद्यालय प्रशासन और छात्र सभी को आत्ममंथन करना होगा कि विरोध की आवाज़ ऊंची हो सकती है, लेकिन भाषा और तरीका ऐसा हो जो लोकतंत्र को मजबूत करे, न कि उसे और विभाजित कर दे। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 9 जनवरी /2026