लेख
10-Jan-2026
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हाइड्रोजन भविष्य का ईंधन है। वास्तव में, यह एक स्वच्छ (क्लीन) ऊर्जा स्रोत है। जब हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है, तो इससे केवल पानी निकलता है, न कि कार्बन डाइऑक्साइड या अन्य प्रदूषक गैसें। यही कारण है कि यह जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण से निपटने में सहायक हो सकता है। इसके अलावा, हाइड्रोजन का उपयोग वाहनों (फ्यूल सेल कार), उद्योगों, बिजली उत्पादन और ऊर्जा भंडारण में किया जा सकता है। विशेष रूप से ग्रीन हाइड्रोजन, जो नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन) से बनाया जाता है, भविष्य की टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था की मजबूत नींव बन सकता है।हालाँकि, यह बात अलग है कि उत्पादन लागत, भंडारण और परिवहन जैसी चुनौतियाँ अभी मौजूद हैं, लेकिन तकनीकी प्रगति के साथ हाइड्रोजन ऊर्जा आने वाले वर्षों में पेट्रोल-डीज़ल का प्रभावी विकल्प बन सकती है। इस क्रम में हाल ही में एक न्यूज़ एजैंसी के हवाले से ख़बर आई है कि हमारे देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा से शुरू होने जा रही है। पाठकों को बताता चलूं कि हाल ही में 6 जनवरी 2025 मंगलवार को राज्य सरकार ने एक बयान जारी कर जानकारी दी है कि हरियाणा में देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से लैस ट्रेन जींद जिले से दौड़ने को तैयार है। दूसरे शब्दों में कहें तो हरियाणा का जींद जिला देश के रेलवे इतिहास में नया अध्याय जोड़ने जा रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि यह उपलब्धि न केवल हरियाणा बल्कि पूरे भारत के लिए तकनीकी और पर्यावरणीय प्रगति का प्रतीक है।जींद-सोनीपत सेक्शन पर 140 किमी/घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली इस हाइड्रोजन ट्रेन को दुनिया की सबसे लंबी हाइड्रोजन ट्रेन बताया जा रहा है। इसमें शून्य शोर और प्रदूषण होगा। मतलब यह है कि यह एक तरह से हरित ट्रेन होगी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार चेन्नई की आईसीएफ(इंटीग्रल कोच फैक्ट्री)द्वारा निर्मित यह ट्रेन 2600 से अधिक यात्रियों को ले जा सकेगी, तथा यह ट्रेन 89 किलोमीटर के रूट पर चलेगी और इसमें आधुनिक सुविधाएं जैसे तापमान सेंसर, बायो-टॉयलेट और आरामदायक सीटें होंगी।कहा जा रहा है कि प्रतिदिन दो फेरे लगाते हुए कुल 356 किलोमीटर की दूरी तय करेगी। जानकारी अनुसार हाइड्रोजन ट्रेन को सुचारू ढंग से ऊर्जा मुहैया कराने के लिए 11 किलोवाट का हाइड्रोजन प्लांट जींद में स्थापित किया गया है तथा इसी से ट्रेन को निर्बाध ऊर्जा उपलब्ध कराई जाएगी। इस परियोजना के लिए जिस हाइड्रोजन प्लांट को स्थापित किया गया है, उसकी ऊर्जा भंडारण क्षमता तीन हजार किलोग्राम है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पहले चरण में ट्रेन को दस कोच के साथ चलाया जाएगा। हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ होता है। इसको देखते हुए कई स्तर पर सुरक्षा की तैयारियां की गई हैं जिससे किसी घटना को होने से रोका जा सके। हाइड्रोजन लीक की आपात स्थिति से निपटने के लिए कंप्यूटेशनल फ्लूड डायनेमिक्स शोध भी कराया गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो ट्रेन में सुविधा- सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। मसलन, ट्रेन की अधिकतम गति 150 किलोमीटर प्रतिघंटा होगी।लीक की स्थिति से निपटने के लिए इसमें सेसर लगे हैं। तापमान नियंत्रण और वेंटिलेशन का इंतजाम किया गया है। इतना ही नहीं, जर्मन कंपनी टीयूवी को सेफ्टी ऑडिट का जिम्मा दिया गया है। निश्चित ही इस ट्रेन से ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन शून्य करने में मदद मिलेगी। बहरहाल, यहां यह उल्लेखनीय है कि रेलवे ने देश के अलग-अलग हिस्सों में वर्ष 2030 तक कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेन चलाने का लक्ष्य रखा है। एक ट्रेन को तैयार करने में औसतन 80 करोड़ रुपये लगेंगे और ट्रेन दौड़ाने के लिए एक रूट पर ढांचा तैयार करने का खर्च करीब 70 करोड़ रुपये होगा। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि जून 2025 में एनटीपीसी ने लद्दाख के लेह जिले में पांच हाइड्रोजन बसों को हरी झंडी दिखाई थी तथा देश के दुर्गम क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की कड़ी में ये बड़ी उपलब्धि थी। इसी कड़ी में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी 30 मार्च 2022 को हाइड्रोजन ईंधन से लैस कार से संसद भवन पहुंचे थे। यहां यह भी गौरतलब है कि केंद्र सरकार नेशनल ग्रीन-हाइड्रोजन मिशन के तहत देशभर में वर्ष 2030 तक एक हजार से अधिक हाइड्रोजन बसें चलाने की तैयारी में है। यहां पाठकों को यह भी जानकारी देना चाहूंगा कि केंद्रीय नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के साथ हाल ही में 6 जनवरी 2026 मंगलवार को टोयोटा मिराई ईंधन सेल इलेक्ट्रिक वाहन की एकसाथ सवारी की। ग्रीन हाइड्रोजन ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में ये बड़ी उपलब्धि है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार केंद्रीय मंत्री जोशी ने भारत मंडपम से केंद्रीय मंत्री गडकरी के आवास तक मिराई चलाई। मालूम हो कि टोयोटा मिराई दूसरी पीढ़ी का हाइड्रोजन ईंधन-सेल इलेक्ट्रिक वाहन है जो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए बिजली पैदा करता है, जो उप-उत्पाद के रूप में केवल जल वाष्प उत्सर्जित करता है। हरियाणा से जो हाइड्रोजन ट्रेन चलाई जानी है, उसका किराया 5-25 रुपये के बीच रहने का अनुमान है। हाल फिलहाल, पाठक जानते हैं कि पेट्रोल, डीज़ल और हाइड्रोजन ईंधन आज के परिवहन और ऊर्जा विमर्श के तीन प्रमुख स्तंभ हैं, जिनकी भूमिका और प्रभाव अलग-अलग हैं। पेट्रोल एक पारंपरिक जीवाश्म ईंधन है, जो हल्के वाहनों में व्यापक रूप से उपयोग होता है और अच्छा पावर देता है, लेकिन इसके दहन से कार्बन डाइऑक्साइड व अन्य विषैली गैसें निकलती हैं, जो वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन, धरती के ताप को बढ़ाती हैं। वहीं दूसरी ओर डीज़ल ईंधन अधिक ऊर्जा घनत्व और बेहतर माइलेज के कारण भारी वाहनों और कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, किंतु इससे निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड और सूक्ष्म कण मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। इसके विपरीत, हाइड्रोजन ईंधन को भविष्य का स्वच्छ विकल्प माना जा रहा है, क्योंकि फ्यूल-सेल तकनीक में इससे केवल पानी उप-उत्पाद के रूप में निकलता है और कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है, हालांकि जैसा कि ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि इसकी उत्पादन लागत, भंडारण और बुनियादी ढांचे की कमी अभी बड़ी चुनौती बनी हुई है। यहां तक कि इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल(इवी) और सीएनजी की तुलना में भी हाइड्रोजन ईंधन पर्यावरण और भविष्य की दृष्टि से अधिक बेहतर माना जाता है। जैसा कि हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहनों से केवल जलवाष्प निकलती है, जिससे वायु प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन शून्य होता है, जबकि इसी(इलैक्ट्रोनिक व्हीकल) में अप्रत्यक्ष प्रदूषण बिजली उत्पादन के स्रोत पर निर्भर करता है और सीएनजी से भी कम मात्रा में ही सही, पर कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। वहीं दूसरी ओर हाइड्रोजन वाहनों की रेंज अधिक होती है और इन्हें भरने में केवल कुछ मिनट लगते हैं, जबकि इवी(इलैक्ट्रोनिक व्हीकल) को चार्ज करने में भी समय लगता है और सीएनजी की रेंज सीमित होती है।यह भी उल्लेखनीय है कि इवी के भी पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ते हैं। दरअसल,इवी की बैटरी लिथियम आयन की होती है और लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे धातुओं का खनन पर्यावरण के लिए हानिकारक होता है। इससे मिट्टी और जल स्रोत प्रदूषित हो सकते हैं तथा इन धातुओं कीखनन प्रक्रिया में भारी ऊर्जा खर्च होती है, जिससे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन होता है। वहीं पर दूसरी ओर इलैक्ट्रोनिक व्हीकल को बिजली कोयला या पेट्रोल-जनित पावर प्लांट से ही मिलती है, इसलिए इन व्हीकल्स को पूरी तरह शून्य उत्सर्जन नहीं कहा जा सकता है। दरअसल यह निर्भर करता है कि बिजली कैसे पैदा होती है।बैटरी निपटान और रीसायक्लिंग की भी समस्या है। जैसा कि पुरानी बैटरी टॉक्सिक होती हैं तथा यदि इसे सही तरीके से रीसायक्लिंग नहीं किया जाए , तो बैटरी के रसायन मिट्टी और पानी को प्रदूषित कर सकते हैं।इवी उत्पादन में भी अधिक ऊर्जा खपत होती है। दरअसल ,बैटरी निर्माण में ऊर्जा अधिक लगती है, जो प्रारंभिक पर्यावरणीय प्रभाव बढ़ा देती है।इसलिए इवी के पर्यावरणीय फायदे तभी अधिक होते हैं जब उनकी बैटरियों का उत्पादन और रीसायक्लिंग पर्यावरण-मित्र तरीके से हो और उन्हें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से चलाया जाए। वहीं पर सीएनजी (कंप्रेस्ड नेचुरल गैस) का मुख्य घटक मीथेन है, जो बहुत शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। इसके उत्पादन, परिवहन और भंडारण के दौरान रिसाव ग्लोबल वार्मिंग में योगदान कर सकता है। यह बात अलग है कि सीएनजी का दहन पेट्रोल या डीज़ल की तुलना में बेहतर होता है, लेकिन कभी-कभी अधूरा दहन होने से नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य प्रदूषक निकल सकते हैं। इसके अलावा, सीएनजी मुख्यतः प्राकृतिक गैस से प्राप्त होती है, और इसका खनन तथा फ्रैक्चरिंग जमीन, जल स्रोत और जैव विविधता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। अंत में यही कहूंगा कि वर्तमान में हाइड्रोजन ईंधन हालांकि महंगा है और इसका इंफ्रास्ट्रक्चर भारत में बहुत सीमित है, इसलिए आज के समय में इवी और सीएनजी अधिक व्यावहारिक विकल्प हैं। फिर भी, लंबी दूरी, भारी वाहनों और दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा समाधान के रूप में हाइड्रोजन ईंधन को भविष्य का सबसे बेहतर विकल्प माना जा रहा है।समग्र रूप से देखा जाए तो पेट्रोल और डीज़ल के साथ ही साथ इवी तथा सीएनजी वर्तमान की जरूरत हैं, लेकिन पर्यावरणीय संकट के समाधान के लिए हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ और टिकाऊ ईंधन की ओर ऊर्जा संक्रमण अब अनिवार्य होता जा रहा है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड) ईएमएस / 10 जनवरी 26