भारत की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है। जहां सरकार के सामने विकल्प कम और चुनौतियां अधिक हैं। जीएसटी और डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में पिछले वर्षों के मुकाबले कम वृद्धि है। कर राजस्व में लगातार कमी होने से केंद्र और राज्य—दोनों सरकारों की वित्तीय स्थिति को गंभीर स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। आमतौर पर भारत में टैक्स कलेक्शन हर साल 10 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ता रहा है। मौजूदा वित्त वर्ष में यह वृद्धि 7 प्रतिशत से भी नीचे आती दिख रही है। यह संकेत मिलता है, अर्थव्यवस्था की रफ्तार कम होती जा रही है। मांग और खपत में वह मजबूती नहीं है, जिसकी उम्मीद सरकार कर रही थी। सरकार ने खपत बढ़ाने के लिए इनकम टैक्स में छूट और जीएसटी स्लैब में कटौती करके मांग और आपूर्ति को बढ़ाने का कदम उठाया था। लेकिन सरकार की इस प्रयास में कोई सफलता नहीं मिली। सवाल यह है कि जब लोगों की आय नहीं बढ़ रही है, तो टैक्स छूट का लाभ किसे मिलेगा? बड़ी आबादी आज संगठित और असंगठित क्षेत्र में जो रोजगार उपलब्ध हो पा रहा है। इसमें अस्थायी नौकरियों बढ़ती जा रही हैं। जहां आय कम है, अनिश्चित आय,सामाजिक सुरक्षा लगभग न के बराबर है। ऐसे में उपभोक्ता खर्च कैसे बढ़ेगा? यही कारण है, त्योहारों के मौसम के बावजूद जीएसटी कलेक्शन में वह वृद्धि नजर नहीं आई, जिसका दावा केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा किया जा रहा था। इस कमजोर कर-संग्रह ने सरकारों को चिंता में डालकर वैकल्पिक रास्तों को खोजने की दिशा मे धकेल दिया है। रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार द्वारा एक नया फैसला लिया गया है इसके अनुसार बैंकों के डिविडेंड वितरण से जुड़े नियमों में जो बदलाव किया है। वह इसी मजबूरी का नतीजा है। अब बैंकों को अपने मुनाफे का 75 प्रतिशत डिविडेंड देने की अनुमति की तैयारी की जा रही है। अभी यह सीमा 40 प्रतिशत थी। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी अधिक है, इसलिए इस बदलाव से सरकारी खजाने को ज्यादा लाभ प्राप्त होगा। राजस्व संग्रह में जो कमी आएगी। केंद्र सरकार इससे अपना खजाना भरेगी। यह राहत अल्पकालिक है। इससे बैंकों की पूंजीगत मजबूती कमजोर होगी। बेंकों की ऋण देने की क्षमता प्रभावित होगी। भविष्य में किसी संकट से निपटने मैं बैंकों की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो जाएगी। यह परिवर्तन वित्तीय अनुशासन से ज्यादा राजकोषीय घाटे के दबाव को दर्शाता है। केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारों की आर्थिक हालत भी चिंताजनक है। राज्यों पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। कई राज्यों की आर्थिक स्थिति ऐसी है,अगर बैंकों से कर्ज लेने की क्षमता यदि वर्तमान में जो है वही रहेगी। तो वह कर्मचारियों को वेतन देने में भी असमर्थ हो सकते हैं। केंद्र और राज्यों की संयुक्त उधारी 25 से 30 लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुंच गई है। इतना बड़ा कर्ज केंद्र एवं राज्य सरकारों के बजट एवं भविष्य की पीढ़ियों पर भारी बोझ डालने वाला है। सरकार के लिए सबसे आसान रास्ता अप्रत्यक्ष कर बढ़ाना होता है। यही कारण है, पेट्रोलियम उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी में केंद्र सरकार समय-समय पर बढ़ोतरी करती है। इसका लाभ केंद्र सरकार को राजस्व के रूप मे मिलता है। इसका खामियाजा उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है। इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ता पर आता है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है, जिसमें कर बढ़ने से खपत और कमजोर होती है। खपत कमजोर होने से कर-संग्रह और भी घट जाता है। 1 फरवरी को केंद्र सरकार का 2026-27 का बजट पेश होने जा रहा है, सरकार के सामने राजकोषीय संतुलन बनाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती है। एक ओर केंद्र एवं राज्य सरकारों पर ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ रहा है, कुल टैक्स कलेक्शन का बड़ा हिस्सा ब्याज एवं कर्ज के भुगतान की देनदारी में जा रहा है। दूसरी ओर विकास व सामाजिक योजनाओं के लिए सरकार के पास बजट में पैसा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है, क्या सरकार केवल अल्पकालिक उपायों—जैसे डिविडेंड बढ़ाना, डिसइन्वेस्टमेंट और एक्साइज ड्यूटी—पर निर्भर रहेगी, या रोजगार सृजन की आय बढ़ाने और स्थायी मांग पैदा करने की ठोस रणनीति अपनाएगी? यह बजट केवल संख्याओं का खेल नहीं होना चाहिए। यह तय करेगा भारत की अर्थव्यवस्था उपभोग और कर्ज के सहारे आगे बढ़ेगी या उत्पादन, रोजगार और आय के मजबूत आधार पर आगे बढ़ेगी। मूल समस्या लोगों की आय और सुरक्षित रोजगार का समाधान का प्रावधान इस बजट में किया जाना चाहिए। अन्यथा कर-संग्रह बढ़ाने के सारे प्रयास अंततः विफल साबित हो सकते हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपने बजट में गंभीरता से ध्यान देना होगा। अन्यथा आने वाला समय केंद्र एवं राज्य सरकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। .../ 10 जनवरी /2026