लेख
10-Jan-2026
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देश का आर्थिक परिदृश्य इस समय गंभीर दौर से गुजर रहा है। जीएसटी और डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन में आई गिरावट ने केंद्र और राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है। आमतौर पर भारत में पिछले 30 वर्षों से टैक्स कलेक्शन 10–15 प्रतिशत की दर से बढ़ता रहा है, हालिया आंकड़े बताते हैं, यह वृद्धि अब 7 प्रतिशत से नीचे फिसलती हुई दिख रही है। यह स्थिति केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। केंद्र एवं राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति की वास्तविक हकीकत है। लोगों की जेब में खर्च करने के लिए अब पैसा नहीं है। कर्ज का बोझ अधिक होने के कारण अब नया कर्ज भी नहीं मिल रहा है। बचत पहले ही खत्म हो चुकी है, जिसके कारण लोगों को सीमित खर्चे में अपना जीवन-यापन करना पड़ रहा है। सरकार ने खपत बढ़ाने के लिए इनकम टैक्स और जीएसटी स्लैब में कटौती की। इसके बाद भी बाजार में इसका अपेक्षित असर नहीं दिख रहा है। मूल समस्या लोगों की आय सीमित है। महंगाई बढ़ती जा रही है। जिसके कारण कर छूट का फायदा भी आम लोगों को नहीं मिल पा रहा है। जब रोजगार स्थायी नहीं होंगे, आय में वृद्धि नहीं होगी, तब तक उपभोग बढ़ने की उम्मीद करने का कोई मतलब नहीं है। गिग इकोनॉमी के बढ़ते दायरे ने रोजगार के आंकड़े सुधारे हैं, लेकिन इससे बहुत कम आय लोगों को हो रही है। इस काम में भी अस्थिरता होने के कारण लोगों की क्रयशक्ति में कोई इजाफा नहीं हो रहा है। आर्थिक स्थिति की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा का संकट और भी गहरा होता जा रहा है। इस वित्तीय दबाव के बीच सरकार की नजर अब गैर-कर स्रोतों पर टिक गई है। बैंकों के लिए डिविडेंड वितरण की सीमा 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का प्रस्ताव इसी मजबूरी को दर्शाता है। इससे केंद्र सरकार को अपने राजस्व को बढ़ाने में मदद मिलेगी। अल्पकाल के लिए सरकार को राजस्व मिलेगा, लेकिन रिजर्व बैंक और सरकार के इस परिवर्तन से बैंकों की पूंजीगत मजबूती और भविष्य की आर्थिक स्थिरता पर गंभीर संकट जल्द ही देखने को मिल सकता है। यह ऐसा ही है, जैसे आज की जरूरत के लिए जमा पूंजी और बचत को गिरवी रखना या खर्च कर देना है। केंद्र ही नहीं, राज्य सरकारों की आर्थिक स्थिति भी चिंताजनक है। बढ़ता कर्ज, वेतन और ब्याज भुगतान का बोझ, और सीमित राजस्व ने राज्यों को कर्ज के मकड़जाल में फंसा दिया है। केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाना केंद्र सरकार के लिए आसान विकल्प है। इसका फायदा राज्य सरकारों को नहीं मिल रहा है। मनरेगा जैसी योजनाओं पर केंद्र सरकार द्वारा 40 फ़ीसदी हिस्सेदारी राज्य सरकारों पर डाल देने से राज्यों की आर्थिक स्थिति में गंभीर संकट आने वाला है या तो मनरेगा जैसी योजनाएं नाम बदलने के बाद बंद होंगी। इसका सीधा असर रोजगार और महंगाई के रूप में आम जनता पर पड़ना तय है। 2026-27 के बजट में सरकार के पास राजस्व में वृद्धि करने के विकल्प सीमित हैं। वहीं केंद्र और राज्य सरकारों के ऊपर खर्च और योजनाओं को चलाने के लिए आय में निरंतर खाई बढ़ती चली जा रही है। आगामी बजट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं है। बजट आर्थिक दिशा तय करने की कसौटी होगा। केंद्र एवं राज्य सरकारें 2026-27 के बजट में केंद्र एवं राज्य सरकारें जो प्रावधान करेगी, वह कसौटी में कितने खरे उतरेंगे यह कहना मुश्किल है। सवाल साफ है, क्या सरकारें तात्कालिक राहत के लिए दीर्घकालिक स्थिरता को दांव पर लगाएगी, या रोजगार, आय और मांग बढ़ाने की ठोस रणनीति आगामी बजट में अपनाएगी? जिस तरह से राज्यों के ऊपर निरंतर कर्ज बढ़ता चला जा रहा है उनकी आय पिछले वर्षों की तुलना में नहीं बढ़ रही है। खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। केंद्र सरकार का राजस्व राज्यों में घट रहा है। केंद्र सरकार सेस और शुल्क बढ़ाकर अपने राजस्व में तो किसी तरह से वृद्धि कर पा रही है, लेकिन राज्यों के पास कोई वैकल्पिक उपाय नहीं है। ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था भविष्य में किस दिशा की ओर जाएगी कहना मुश्किल है। पिछले एक दशक में जिस तरह से सरकार ने अपने खर्च बढ़ाये हैं। नई-नई योजनाएं लागू की है। अब इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के पास धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2026-27 के लिए जो बजट केंद्र एवं राज्य सरकार तैयार कर रही हैं। उन चुनौतियों से किस तरह से निपटेंगी इसको लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। एसजे/ 10 जनवरी /2026