लेख
10-Jan-2026
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विश्व राजनीति के बदलते परिदृश्य में आर्कटिक क्षेत्र अचानक एक नए भू-रणनीतिक केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्रीनलैंड, जो अब तक केवल बर्फ और वीराने की भूमि समझा जाता था, आज महाशक्तियों की महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बन गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड को खरीदने या बलपूर्वक अधिग्रहण करने की संभावना ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गहरी चिंता में डाल दिया है। यह केवल एक भूभाग पर दावा नहीं है, बल्कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्मित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है। यूरोप ने इस प्रस्ताव का तीखा विरोध किया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के लोगों के अधिकारों को सर्वोपरि मानते हुए यूरोपीय नेताओं ने स्पष्ट किया है कि इस द्वीप का भविष्य बाहरी सौदेबाज़ी का विषय नहीं हो सकता। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करता है तो नाटो का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। यह वक्तव्य बताता है कि ग्रीनलैंड का प्रश्न केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा और सहयोग का प्रश्न है। भूगोल की दृष्टि से ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है, परंतु सांस्कृतिक और राजनीतिक रूप से यूरोप से जुड़ा रहा है। इसकी जनसंख्या मात्र छप्पन हज़ार है, पर क्षेत्रफल इतना विशाल कि यह विश्व का सबसे बड़ा द्वीप है। यही विशालता इसे आर्कटिक शक्ति संघर्ष का केंद्र बनाती है। रूस ने हाल के वर्षों में अपनी नौसैनिक उपस्थिति को मज़बूत किया है और ग्रीनलैंड, आइसलैंड तथा ब्रिटेन का सामरिक गलियारा—जीआईयूके गैप—नाटो की निगरानी का प्रमुख क्षेत्र बन गया है। ट्रम्प की दृष्टि में ग्रीनलैंड केवल भूगोल नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रभुत्व का साधन है। नाटो पर उनकी शंका और यूरोपीय सहयोगियों पर अविश्वास उन्हें इस दिशा में प्रेरित करता है। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पा लेता है तो वह आर्कटिक सुरक्षा ढाँचे को अकेले अपने हाथों में ले सकता है। यह यूरोप को हाशिए पर धकेलने और अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था बनाने का प्रयास होगा। आर्थिक दृष्टि से भी ग्रीनलैंड का महत्व असाधारण है। यहाँ दुर्लभ खनिज और ऊर्जा संसाधनों की संभावना है, जो आधुनिक तकनीक और रक्षा उद्योग के लिए अनिवार्य हैं। चीन की आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका लगातार नए स्रोत खोज रहा है। ग्रीनलैंड इस रणनीति में दीर्घकालिक विकल्प बन सकता है। सैन्य दृष्टि से ग्रीनलैंड पहले से ही अमेरिकी योजनाओं का हिस्सा है। पिटुफ़िक स्पेस बेस अमेरिका की मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी प्रणाली का अहम केंद्र है। ट्रम्प द्वारा घोषित “गोल्डन डोम” रक्षा पहल में भी ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति निर्णायक भूमिका निभा सकती है। इसके अतिरिक्त, ग्रीनलैंड वैज्ञानिक अनुसंधान का भी अद्वितीय स्थल है। यहाँ का वातावरण खगोल विज्ञान और अंतरिक्ष अध्ययन के लिए उपयुक्त है। जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक में नई समुद्री राहें खुल रही हैं, जो वैश्विक व्यापार को बदल सकती हैं। इन मार्गों पर नियंत्रण अमेरिका को समुद्री प्रभुत्व का नया अवसर देगा। परंतु इस महत्वाकांक्षा की कीमत भी भारी है। यदि अमेरिका ग्रीनलैंड को बलपूर्वक अधिग्रहित करता है तो यह यूरोप के साथ संबंधों को गहरे संकट में डाल देगा, नाटो को कमजोर करेगा और आत्मनिर्णय के सिद्धांत को चुनौती देगा। ग्रीनलैंड का प्रश्न केवल संसाधनों या सुरक्षा का नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संप्रभुता की मर्यादा का है। इस प्रकार ग्रीनलैंड आज केवल बर्फ का द्वीप नहीं, बल्कि भविष्य की शक्ति राजनीति का प्रतीक बन गया है। यदि महाशक्तियाँ इसे हथियाने की होड़ में उतरती हैं तो यह आर्कटिक ही नहीं, पूरी विश्व व्यवस्था को नए संकट में डाल सकता है। यही वह क्षण है जब मानवता को यह तय करना होगा कि शक्ति का मार्ग अधिग्रहण है या सहयोग। .../ 10 जनवरी /2026