लेख
10-Jan-2026
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देवभूमि उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक प्राइवेट अस्पताल ने सिर्फ इसलिए मरीज के शव को बंधक बना लिया क्योंकि उस अस्पताल की कुछ फीस मर गए मरीज पर बकाया थी।शव दिलाने के लिए पुलिस को अस्पताल पर मुकदमा दर्ज करना पड़ा,तब जाकर शव मुक्त हुआ और उसका अंतिम संस्कार हो सका।चिकित्सीय सेवाओं में चिकित्सकों की कमी से जूझ रहे उत्तराखंड को राज्य में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवा बहाल करने के लिए विशेषज्ञ चिकित्सको को राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से भी ज़्यादा वेतन 7 लाख रुपये प्रतिमाह का भुगतान करना पड़ रहा है।फिर भी चिकित्सको द्वारा सरकारी सेवा में रहकर प्राइवेट प्रैक्टिस करने और दवा कम्पनियों से कमीशनखोरी के आरोप लगते रहे है।आपको बता दे कि देश मे 1.40 बिलियन लोगों के लिये सिर्फ 10 लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं। यानि प्रत्येक 13हजार नागरिकों पर मात्र एक डॉक्टर मौजूद है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस संदर्भ में एक हजार व्यक्तियों पर एक चिकित्सक के अनुपात को जायज़ और जरूरी माना है।भारत के शहरी क्षेत्रों में 58 प्रतिशत योग्य चिकित्सक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आँकड़ा 19 प्रतिशत से भी कम है। योग्य चिकित्सकों के अभाव में देश में में झोलाछाप डाक्टरों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इन झोलाछाप डॉक्टरों के कारण मरीजों की जान सासत में है। स्वास्थ्य विभाग की अनदेखी के कारण झोलाछाप डाक्टर ही नही पंजीकृत डॉक्टर भी कमीशनखोरी की बदौलत चाँदी कूट रहे है। गावों में झोलाछाप डाक्टर सरेआम क्लीनिक चलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि भारत में 57.3प्रतिशत डॉक्टर बिना मेडिकल डिग्री के हैं।इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट 1956, दिल्ली मेडिकल काउंसिल एक्ट 1997, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स 1945 में कहा गया है कि केवल एक रजिस्टर्ड डॉक्टर ही एलोपैथिक दवा लिख सकता है। “भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए, भारतीय चिकित्सा केंद्रीय परिषद अधिनियम, 1970 के अनुसार भारतीय चिकित्सा पद्धति के अभ्यासी के अलावा कोई भी व्यक्ति जो किसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता रखता है और किसी राज्य रजिस्टर या भारतीय चिकित्सा के केंद्रीय रजिस्टर में नामांकित है, भारतीय में मेडिकल और किसी भी राज्य में मरीजों के लिए दवा लिख सकेगा। इनके अलावा यदि कोई ऐसा करता पाया तो उसके लिए इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 में कारावास की सजा का उल्लेख है जो एक वर्ष तक का हो सकता है या जुर्माना जो 1,000 रुपये तक हो सकता है या दोनों हो सकता है, दिल्ली मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1997 के तहत क्लॉज (27) में ‘कठोर दंड’ का उल्लेख किया गया है । इसमें तीन साल तक की कैद या 20,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते है। वही एक व्यक्ति ने बीती 7 अगस्त को दारुल उलूम देवबंद के मुफ्तियों से सवाल संख्या 67643 में पूछा कि एक मरीज डॉक्टर के पास जाता है। डॉक्टर मरीज को देखने के बाद कुछ जांच लिखता है फिर वह रोगी जिस प्रयोगशाला में जाता है उसके संचालक इस जांच की वास्तविक राशि से दोगुना राशि लेते हैं, क्योंकि उन्हें इस जांच का आधा मूल्य यानि कमीशन डॉक्टर को देना पड़ता है, और अगर कोई लैब डॉक्टर को हिस्सा न दे तो डॉक्टर उस लैब की जांच को गलत बताते हैं और उस प्रयोगशाला में फिर मरीज को नहीं जाने देते।इसी तरह मेडिकल स्टोरों से दवा लेने पर डॉक्टरो पर कमीशन लेने का आरोप हैं। अगर कोई मुस्लिम डॉक्टर लैब या मेडिकल स्टोर से दवा या परीक्षण के नाम पर कमीशन लेता है तो यह जायज है या नाजायज?। इस सवाल पर मुफ्तियों की खंडपीठ ने जवाब संख्या 67643 में कहा कि डॉक्टर लैब या मेडिकल स्टोर वालों से मरीज भेजने पर या मेडिकल स्टोर वालों की दवाईयां लिखने पर जो कमीशन लेते हैं, ये शरई में जायज नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी जमाने में हकीम लोग दवाई लिखने पर अत्तार यानि दवा विक्रेता से 25 प्रतिशत या उससे कम कमीशन लेते थे। हमारे हजरात अकाबिरे उलेमा देवबंद ने अपने फतवे में इसे रिश्वत और नाजायज करार दिया है।जब मुस्लिम धर्म मे यह नाजायज है तो अन्य धर्म के चिकित्सकों के लिए भी नाजायज ही माना जाएगा।लेकिन वर्तमान में भारी भरकम वेतन व परामर्श फीस लेने पर भी चिकित्सको द्वारा पैथोलॉजी लैब,एक्सरे,अल्ट्रासाउंड व सिटी स्कैन सेंटरों से मरीज भेजने के नाम पर मोटा कमीशन लेने की शिकायतें आम हो गई है,जिसमे बेचारा मरीज पीस रहा है।ऐसे में इन चिकित्सको को स्वास्थ्य का भगवान कैसे कहे आप ही बताइए। (लेखक ज्वलंत मुद्दों के जानकार उपभोक्ता कानून के वरिष्ठ अधिवक्ता है) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 10 जनवरी 26