वैश्विक स्तरपर बीसवीं सदी में हरित क्रांति को मानव इतिहास की सबसे बड़ी कृषि उपलब्धियों में गिना गया,जिसने अकाल से जूझती दुनियाँ को अन्न- आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर किया। रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और उन्नत बीजों के व्यापक उपयोग ने उत्पादन को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया। किंतु इक्कीसवीं सदी में वही कृषि मॉडल अब एक वैश्विक पर्यावरणीय, स्वास्थ्य और पारिस्थितिक संकट का रूप ले चुका है। रासायनिक खादों का अंधाधुंध उपयोग मिट्टी की उर्वरता, भूजल की शुद्धता, खाद्य पोषण और जैव विविधता चारों स्तंभों को एक साथ कमजोर कर रहा है। यह संकट केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका हर जगह इसके दुष्परिणाम स्पष्ट दिखने लगे हैं।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि मिट्टी केवल फसल उगाने का माध्यम नहीं है,बल्कि यह एक जीवंत पारिस्थितिक प्रणाली है जिसमें अरबों सूक्ष्मजीव, केंचुए, फफूंद और जीवाणु सक्रिय रहते हैं। ये तत्व मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं, पोषक तत्वों का चक्र चलाते हैं और पौधों को प्राकृतिक रूप से पोषण उपलब्ध कराते हैं।रासायनिक खादों विशेषकर नाइट्रोजन,फॉस्फोरस और पोटाश आधारित उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग इस संतुलन को नष्ट कर देता है।लगातार रसायनों के प्रयोग से मिट्टी की जैविक कार्बन सामग्री घटती है, जिससे उसकी जल धारण क्षमता कम हो जाती है और वह कठोर,निर्जीव तथा बंजर होने लगती है। अंतरराष्ट्रीय मृदा विज्ञान संगठनों के अनुसार, विश्व की लगभग 33 प्रतिशत कृषि भूमि पहले ही किसी न किसी रूप में क्षरण का शिकार हो चुकी है। भारत, चीन और अमेरिका जैसे कृषि प्रधान देशों में मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत तेजी से खत्म हो रही है। यह स्थिति दीर्घकाल में खाद्य उत्पादन को अस्थिर बना देती है और किसानों को और अधिक रसायनों पर निर्भर होने के लिए मजबूर करती है, एक ऐसा दुष्चक्र, जिससे बाहर निकलना अत्यंत कठिन हो जाता है।लाभकारी रासायनिक खादों का सबसे घातक प्रभाव मिट्टी में मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों पर पड़ता है। नाइट्रोजन स्थिर करने वाले जीवाणु, माइकोराइजा फफूंद और जैविक अपघटक जीव मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता के आधार होते हैं। जब रसायन सीधे पौधों को पोषण उपलब्ध करा देते हैं, तो ये सूक्ष्मजीव निष्क्रिय होने लगते हैं या मर जाते हैं। परिणामस्वरूप मिट्टी की आत्मनिर्भरता समाप्त हो जाती है और वह बाहरी इनपुट पर निर्भर हो जाती है। साथियों बात अगर हम संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्टें को समझने की करें तो यह चेतावनी देती हैं कि यदि यही प्रवृत्ति जारी रही,तो आने वाले दशकों में बड़ी मात्रा में कृषि भूमि जैविक रूप से मृत हो सकती है। ऐसी मिट्टी में उत्पादन बनाए रखने के लिए रसायनों की मात्रा लगातार बढ़ानी पड़ती है, जिससे लागत, प्रदूषण और जोखिम तीनों बढ़ते हैं।रासायनिक खादों का एक बड़ा हिस्सा पौधों द्वारा अवशोषित नहीं हो पाता और वर्षा या सिंचाई के साथ मिट्टी की निचली परतों में रिसकर भूजल में मिल जाता है। नाइट्रेट और फॉस्फेट जैसे तत्व भूजल को प्रदूषित कर देते हैं, जो सीधे पीने के पानी के स्रोत बनते हैं। यह समस्या अब केवल ग्रामीण कृषि क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी गंभीर रूप ले चुकी है।भारत के इंदौर में जहरीला जल पीने से 15 से अधिक लोगों की मृत्यु की घटना इस संकट कीभयावहता को उजागर करती है। यह केवल एक स्थानीय दुर्घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक समस्या का प्रतीक है जिसमें कृषि रसायन, औद्योगिक अपशिष्ट और अव्यवस्थित जल प्रबंधन मिलकर मानवजीवन के लिए घातक परिस्थितियाँ पैदा कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, नाइट्रेट- प्रदूषित जल से ब्लू बेबी सिंड्रोम, कैंसर और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। साथियों बात अगर हम वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जल संकट और कृषि रसायन को समझने की करें तो यूरोप के कई देशों,विशेषकर नीदरलैंड्स और फ्रांस में,भूजल में नाइट्रेट स्तर खतरनाक सीमा को पार कर चुका है,जिसके कारण सरकारों को उर्वरक उपयोग पर कड़े नियम लगाने पड़े हैं। अमेरिका में डेड ज़ोन की समस्या-जहाँ नदियों से बहकर गए पोषक तत्व समुद्र में ऑक्सीजन की कमी पैदा कर देते हैं,कृषि रसायनों के दुष्प्रभावका अंतरराष्ट्रीय उदाहरण है। यह दर्शाता है कि रासायनिक खाद का असर केवल खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नदियों, झीलों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र तक फैल जाता है। साथियों बात अगर हम रसायनों के अत्यधिक उपयोगसे खाद्य पोषण में गिरावट और जहरीला भोजन इसको समझने क़ी करें तो,रसायनों के अत्यधिक उपयोग से फसलें भले ही आकार में बड़ी और देखने में आकर्षक हों, लेकिन उनकी पोषण गुणवत्ता लगातार गिर रही तत्वों की कमी सीधे पौधों की पोषण संरचना को प्रभावित करती है।इसके अतिरिक्त कीटनाशकों और उर्वरकों के अवशेष भोजन में बने रहते हैं, जो मानव शरीर में धीरे-धीरे जमा होकर कैंसर, मधुमेह, हार्मोन असंतुलन और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी ने कई कृषि रसायनों को संभावित कार्सिनोजेन की श्रेणी में रखा है, जो इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है।रासायनिक खाद और कीटनाशकों से जुड़ा स्वास्थ्य संकट तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और व्यापक होता है। किसान, खेत मजदूर और ग्रामीण समुदाय सबसे पहले इसकी चपेट में आते हैं, लेकिन शहरी उपभोक्ता भी इससे अछूते नहीं हैं। भोजन, पानी और पर्यावरण तीनों माध्यमों से रसायन मानव शरीर में प्रवेश करते हैं।यह एक ऐसा साइलेंट पैंडेमिक”है, जो धीरे-धीरे समाज की स्वास्थ्य संरचना को कमजोर कर रहा है और स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ डाल रहा है।मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट का सीधा असर उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं पर पड़ता है। केंचुए, जिन्हें मिट्टी का किसान कहा जाताहै,रासायनिक खादों के कारण तेजी से कम हो रहे हैं। कीटों और सूक्ष्म जीवों की विविधता में कमी से प्राकृतिक परागण और कीट नियंत्रण की प्रक्रियाएँ बाधित होती हैं। इससे जैव विविधता का संतुलन बिगड़ता है और पारिस्थितिकी तंत्र अस्थिर हो जाता है।पक्षियों, उभयचरों और जलीय जीवों की कई प्रजातियाँ कृषि रसायनों के कारण संकटग्रस्त हो चुकी हैं। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व से जुड़ा प्रश्नहै,क्योंकिपारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ने का अंतिम प्रभाव मानव जीवन पर ही पड़ता है। साथियों बात अगर हम जैविक खाद और टिकाऊ खेती:एकमात्र व्यवहारिक विकल्प, इसको समझने की करें तो इस वैश्विक संकट का समाधान रासायनिक खेती के विकल्पों में निहित है।जैविक खाद, हरी खाद, कंपोस्ट, वर्मी-कंपोस्ट और प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित कर सकती हैं। ये न केवल मिट्टी के सूक्ष्मजीवों को संरक्षित करती हैं, बल्कि भूजल प्रदूषण को भी रोकती हैं। जैविक खेती से उत्पादित भोजन अधिक पोषक और सुरक्षित होता है, जिससे दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं।विश्व के कई देशों ने टिकाऊ कृषि को नीति स्तर पर अपनाना शुरू कर दिया है। यूरोपीय संघ की फार्म टू फोर्क रणनीति, भारत की प्राकृतिक खेती पहल और अफ्रीका में एग्रो-इकोलॉजी आंदोलन इस दिशा में सकारात्मक कदम हैं। अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि सभ्यता के सामने एक निर्णायक मोड़ पैदा हो गया है,रासायनिक खादों का संकट केवल कृषि का मुद्दा नहीं है; यह मानव स्वास्थ्य, पर्यावरणीय सुरक्षा,खाद्यसंप्रभुता और भावी पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। यदि वर्तमान रुझान जारी रहे, तो दुनियाँ को भोजन की कमी नहीं, बल्कि स्वस्थ भोजन की कमी का सामना करना पड़ेगा। अब यह स्पष्ट हो चुका है किअल्पकालिक उत्पादन लाभ के लिए दीर्घकालिक प्राकृतिक संसाधनों का बलिदान देना आत्मघाती है।जैविक खाद और टिकाऊ खेती केवल विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है।यह परिवर्तन केवल किसानों से नहीं,बल्कि नीति- निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उपभोक्ताओं और वैश्विक समुदाय से सामूहिक प्रतिबद्धता की मांग करता है।मिट्टी,जल और जीवन तीनों को बचाने का यही एकमात्र रास्ता है, और यही मानव सभ्यता के भविष्य की वास्तविक कसौटी भी। संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस/10/01/26