(पुण्य तिथि पर विशेष विशेष) लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अकटूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। इनके पिता का नाम मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव और मां का नाम राम दुलारी देवी था। शास्त्री जी के पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। उन्हे लोग मुंशी जी कहकर संबोधित करते थे।जब शास्त्री जी की आयु महज 18महिने की ही हुई थी, दुर्भाग्य से उनके पिता का निधन हो गया।तब उनकी मां रामदुलारी देवी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर आ गई थी। हालांकि कुछ समय बाद ही शास्त्री के नाना भी चल बसे ऐसी स्थिति में लालबहादुर शास्त्री की परवरिश करने में उनके मौसा मौसी ने उनकी मां की हर तरह से मदद की। इस सबके बावजूद वे उन सुनहरे दिनों से वंचित हो गए जिसके वे हकदार थे।खेलने खाने की आयु में उन्हें अभावों में जीवन यापन करने पर विवश होना पड़ा। यही अहम् वजह थी कि उनमें स्वावलंबन की प्रवृत्ति बचपन से भरी हुई थी ।वे बचपन से ही भोजन बनाने, कपड़े साफ करने से लेकर अपना सारा काम स्वयं ही करते थे।आगे चलकर स्वयं के सारे काम स्वयं करना उनकी आदत बन गई थी।वह जेल में होते थे या बाहर अपने कपड़े स्वयं ही साफ करते थे,जवाहर लाल नेहरु की मृत्यु के बाद 9 जून 1964 को प्रधानमंत्री बनने पर भी कभी-कभी वह अपने कमरे की सफाई स्वयं कर लेते थे,नौकर जब तक बिस्तर बिछाने के लिए पहुंचते,तब तक वे स्वयं ही बिस्तर लगा चुके होते थे। उनकी इस आदत को देखकर यदि कोई उन्हें ऐसा करने से मना करता तो वे बड़े स्नेह से कहते भाई , जो आदत जन्म से बनी है, उसमें अब क्यों परिवर्तन किया जाए ।ईश्वर ने जब हाथ पैर सही सलामत दिए हैं तब दूसरों को कष्ट क्यों दिया जाए । शास्त्री जी ने जन्म से लेकर मृत्युपर्यत कर्म की ही उपासना की उन्होंने किसी आवश्यक वस्तुओं की अभिलाषा कभी नहीं रखी यह उनके व्यक्तित्व कि सबसे बड़ी खासियत थी ।शास्त्री जी सदा आत्मसम्मान को बनाए रखने में विश्वास करते थे ।पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण कर देने पर शास्त्री जी ने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया तथा किसानों को भी उनके बराबर का दर्जा दिया,जय जवान जय किसान का नारा देकर उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों में दोनों को आवश्यक माना, शास्त्री जी सैनिकों को सतत रूप से खाद्य साम्रगी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हफ्ते में स्वयं एक दिन व्रत रखते थे,साथ ही उन्होंने समूचे देशवासियों से भी एक दिन का व्रत रखने की अपील की,इसका सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि पूरा देश उनसे सहमत होकर एक दिवसीय उपवास रखने लगा और इस तरह उपवास से बचा राशन सीमा पर जूझ रहे जवानों को उपलब्ध होता रहा। इसका सकारात्मक प्रभाव शास्त्री जी के जीवन पर यह पड़ा कि उनके हृदय में दीन-हीन, पिछड़े ,शोषित तथा उपेक्षित वर्ग के लोगों के लिए करुणा का भाव उमड़ पड़ा था।अभावों ने उन्हें संयमशील, परिश्रमी कर्मशील, स्वाभिमानी व स्वावलंबी बनाया जो मरते दम तक उनकी पूजी रही। शास्त्री जी में ज्ञान प्राप्ति की इच्छा इतनी बलवती थी कि उसके आगे अभाव रूपी बाधाएं बोनी पड़ जाती। लिखने पढ़ने की ललक और अभावों के मध्य जब अंतर्द्वंद्व छिड़ता तो अभाव ही सदैव पराजित होता ,यह बात इस उदाहरण से स्पष्ट होती है कि जब शास्त्री जी के पास नाव चलाने वाले को देने के लिए पैसे नहीं होते तो वे बिना किसी हिचकिचाहट के रामनगर से गंगा नदी को तैरकर पार करके स्कूल पहुचते और पढाई में हमेशा अब्बल रहते। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि यदि किसी बात के लिए व्यक्ति दृढ़ संकल्प ले ले तो उसे अपने कार्य में सफलता अवश्य मिलती है, शास्त्री जी का व्यक्तित्व गलत बातों को कभी भी स्वीकार नहीं कर सका, प्रायः ऐसा होता है कि हम दूसरों को तो नसीहत देते हैं परंतु स्वयं उस नसीहत का पालन नहीं करते ,शास्त्री जी स्वयं कोई कार्य करके, तब दूसरों को नसीहत देते थे, उदाहरणार्थ घर के भीतर टहलते हुए वे पुस्तकों ,पेन, पेंसिल,रबर, कपड़ों आदि को यथा स्थान रख देते थे , इससे उनका तात्पर्य मात्र इतना ही था कि घर के अन्य सदस्य यह सीख ले कि वस्तुओं को यथा स्थान पर रखना चाहिए,हकीकत में सदस्यों को कुछ कहने सुनने की अपेक्षा उनके ऊपर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता और वे मन ही मन यह दृढ़ निश्चय करते कि अब आगे से उन्हें वैसा करने का मौका नही देता। ऐसे अनेक उदाहरण है,जो लाल बहादुर शास्त्री के स्व -प्रणेता होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं, शास्त्री जी अपने वाक् चातुर्य से कर्म क्षेत्र में सदैव ही अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ने में सफल रहे,उनकी खासियत यह थी कि वह प्रत्येक कार्य वक्त पर करते थे, शास्त्री जी अपने जीवन में नैतिक गुणों पर ज्यादा बल देते थे,कोई भी प्रलोभन उन्हें सही मार्ग से विचलित नहीं कर सका,इस शास्त्री जी का कहना था कि व्यक्ति कहीं भी रहें,कितना भी ऊंचा उठ जाए या नीचे गिरे,उसे अपने भीतर के सत्य को नही शास्त्री जी विनम्र व सहनशील व्यक्ति थे,यदि कोई उन्हें कठोर शब्दों में कुछ बोल देता था तो भी वे उस का तत्काल प्रतिकार नहीं करते थे, शास्त्री का खान-पान पूर्णतः शाकाहारी था, भोजन में उन्हें दाल रोटी, सब्जी, चावल पसंद थे, शास्त्री जी का जीवन सादगीपूर्ण था, उनके घर में सिर्फ वही वस्तुएं थी,जो दैनिक जीवन के लिए जरूरी होती है, लालबहादुर शास्त्री के सादगीपूर्ण व्यक्तित्व को संजोने में जिन शख्सियतों का प्रभाव था, वे थे-महात्मा गांधी, पुरुषोत्तम दास टंडन, आचार्य नरेंद्रदेव, डॉक्टर भगवान दास ,पंडित जवाहरलाल नेहरू, इन्हीं के जीवन आदर्शों को शास्त्री जी अपना आदर्श समझकर आजीवन चलते रहे, उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर ही पंडित अटल बिहारी वाजपेई ने यह टिप्पणी की थी---यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि वैचारिक मतभेद कभी भी चारित्रिक उज्जवलता को कलुषित नहीं कर सकते।शास्त्री जी से मेरा यद्यपि वैचारिक मतभेद था ,परंतु उनकी चारित्रिक उज्जवलता का शुभ स्वरूप मुझे आलोकित करता रहा है। शास्त्री जी बचपन से स्वावलंबी एवं स्वाभिमानी प्रवृति के थे,वे बचपन से ही भोजन बनाने से लेकर कपड़े धोने आदि कार्य स्वयं किया करते थे,प्रधानमंत्री बनने पर भी वे अपने कमरे की सफाई कर्मचारियों के आने से पहले कर लेते थे।उनकी इस आदत को देखकर यदि कोई उन्हें मना करता, तो वे बड़े प्रेम से कहते भाई जो आदत बचपन से बनी है उसमें क्यों परिवर्तन किया जाए। परमपिता परमेश्वर ने जब दो हाथ-दो पैर सही सलामत दिए हैं ,तब दूसरों को कष्ट क्यों दिया जाए, शास्त्री जी ने जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत कर्म की उपासना की , उन्होंने किसी अनावश्यक वस्तु की अभिलाषा कभी नहीं रखी। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी ,शास्त्री जी सदा आत्मसम्मान को बनाए रखने में विश्वास करते थे ,पाकिस्तान द्वारा भारत पर आक्रमण कर देने पर शास्त्री जी ने सैनिकों का मनोबल बढ़ाया तथा किसानों को भी उनके बराबर का दर्जा दिया। , जय जवान जय किसान का नारा देकर उन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों में दोनों को आवश्यक माना, शास्त्री जी सैनिकों को निरंतर खाघ आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए हफ्ते में स्वयं एक दिन उपवास रखते थे, साथ ही उन्होंने समूचे हिंदुस्तान वासियों से भी एक दिन उपवास रखने की अपील की, इसका सकारात्मक प्रभाव यह हुआ कि समूचा हिंदुस्तान इससे सहमत होकर सप्ताह में एक दिन व्रत रखने लगा , इस तरह उपवास से बचा राशन सीमा पर जूझ रहे जवानों को उपलब्ध होता रहा, इस काम से दो फायदे हुए, एक तो यह कि देश ने अमेरिका सहित किसी भी पश्चिमी देश के सामने भोजन की याचना नहीं कि एवं इससे हमारे आत्मसम्मान की भी रक्षा हो सकी। दूसरे हम विदेशी कर्ज से भी बचे रहें ऐसा नहीं है कि लाल बहादुर शास्त्री केवल हिंदुस्तान के आत्मसम्मान की रक्षा करते थे उन्होंने अपने जीवन में भी इसका पालन किया, वह अपनी जरूरतें स्वयं पूरा करते थे, स्वयं शास्त्री जी के शब्दों में मैं अपनी आवश्यकताएं उतनी ही रखता हूं जितनी आवश्यक होती है, लाल बहादुर शास्त्री जी अनुकूल तथा विपरीत, दोनों ही परिस्थितियों में समान रहते थे, शास्त्री जी सच्चे भारतीय थे, उनके बहुआयामी व्यक्तित्व में देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी उन्होंने देश के साथ कभी भी विश्वासघात नहीं किया ,चाहे वह पाकिस्तान से युद्ध के पश्चात ताशकंद समझौते की बात रही हो अथवा खाद्यान्न मंगाने के लिए विदेशों से कर्ज लेने की बात ,यह भावना उनकी दिनचर्या में भी देखने को मिलती थी। लाल बहादुर शास्त्री ने विश्व समुदाय में भारत की एक प्रथक पहचान बनाई, उन्होंने दो गुटों अमेरिका व सोवियत संघ से प्रथक गुट बनाकर इससे सहमत होने वाले देशों को मिलाया और गुट निरपेक्ष देशों की अगुआई करके विश्व समुदाय में अपनी पृथक पहचान बनाई, यह सब शास्त्री जी की दूरदर्शी सोच के कारण ही संभव हो सका था, लाल बहादुर शास्त्री जैसा प्रधानमंत्री भारत को अब शायद ही कभी मिले ,लाल बहादुर शास्त्री ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के निधन के पश्चात् 9जून 1964को प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया था, वे तकरीबन 18महीने तक देश के प्रधानमंत्री रहे, ताशकन्द में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के पश्चात 11जनवरी 1966की रात लाल बहादुर शास्त्री ने अंतिम सांस ली। (लेखक के विषय में-- मप्र शासन से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 10 जनवरी /2026