अगर किसी हिन्दू को बांग्लादेश में जिंदा जलाया जाता है और भारत में किसी मुस्लिम की लिंचिंग होती है तो आपका ह्रदय किसके पक्ष में रहता है? क्या वह सिर्फ हिन्दू के लिए धड़कता है या सिर्फ मुस्लिम के लिए? यह एक कसौटी है कि आपके अंदर आदमी कितना जीवित है? यह आपके धर्म की भी कसौटी है। यह आपकी धार्मिकता और मानवीयता की जांच करता है। यह घटना लोगों को यह खबर भी देती है कि आदमी कितना जीवित है और कितना मर गया है? लब्बोलुआब यह कि मानवता और धर्म का पैमाना है। आजकल देश और दुनिया में एक ऐसी हवा बही है, जिसमें आदमी छोटा होता चला जा रहा है। बांग्लादेश में जलते हिन्दू को लेकर भारत में हिन्दू उत्तेजित होता है और मुस्लिम की लिंचिंग पर खुश होता है तो वे हिन्दू वस्तुत: धार्मिक नहीं हैं या मुस्लिम हिन्दू के जलाये जाने पर आह्लादित होता है और लिचिंग पर गुस्सा जाहिर करता है तो वे भी धार्मिक नहीं हैं। वे ढोंग या पाखंड करते हैं या दरअसल धर्म की राजनीति करते हैं। जिन्ना कोई धार्मिक आदमी नहीं थे। वे ना नमाज पढ़ते थे, न मस्जिद जाते थे। वे शराब भी पीते थे और सूअर का मांस भी खाते थे। उन्होंने शादी भी एक पारसी से की। उन्होंने धर्म का इस्तेमाल किया। सावरकर और गोलवलकर ने भी वही किया। ओवैसी और मोहन भागवत वही कर रहे हैं। पूरी बीजेपी धर्म की राजनीति कर रही है। इस राजनीति के लिए सुविधा यह है कि उसे देश और समाज की वास्तविक समस्याओं से जूझना नहीं पड़ता। उसे सिर्फ एक दूसरे के खिलाफ विष वमन करना है। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें अपने अपने धर्मों की अच्छाई भी पसंद नहीं है। वे उन घटनाओं और वैचारिक कमजोरियों की तलाश में रहते हैं जो दोनों के बीच वैमनस्यता को फैलाये। मृत्यु सिर्फ देह की क्षय से नहीं होती। देह रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है। आपके अंदर का इंसान जैसे जैसे छीजता जाता है, वैसे वैसे आपकी मृत्यु होती जाती है। वह समाज मृत ही समझिए, जहां इंसानियत का टोटा पड़ जाता है। ट्रंप का जन्म आदमी में हुआ है, लेकिन वे इंसान नहीं हैं। वे आदमी की सभ्यता पर कलंक हैं। वे आदमी की बेइज्जती में रस लेते हैं। उन्होंने अपने देश से जंजीरों में बांध कर लोगों को अमानवीय ढंग से बाहर किया। वे इंसान के रूप में बहुत क्षुद्र हैं। उनके अंदर दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों के लिए कोई सम्मान नहीं है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को तो बंधक ही बना लिया। भारत के प्रधानमंत्री के खिलाफ निम्न स्तर की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का इंसान कहां लुप्त हो गया है जो ऐसी भाषा का प्रतिवाद भी नहीं करते। अन्याय करना और अन्याय सहना - दोनों जुर्म है। एक लाख चालीस करोड़ का आत्मसम्मान प्रधानमंत्री से जुड़ा है। उनकी चुप्पी करोड़ों करोड़ भारतीयों की खिल्ली उड़ा रही है। राष्ट्राध्यक्ष होने मात्र से यह निर्धारित नहीं होता कि आप कितने बड़े इंसान हैं? राष्ट्राध्यक्ष तो बहुत हुए लेकिन वे बुद्ध, कबीर, गांधी, अम्बेडकर, मार्टिन लूथर किंग का सम्मान प्राप्त नहीं कर सके। अनेक राष्ट्राध्यक्षों का इतिहास कूड़ेदान में सड़ रहा है। अपने युग में जिनकी तूती बोलती थी , आज उनका कोई नामलेवा नहीं है। मानव- धारा अपने पूर्वजों को छांट लेती है। गोडसे के इतिहास पर आप लाख शान चढ़ाना चाहें, वह हत्यारा ही बना रहेगा। मानव होने की कसौटी न धर्म है, न पद हैं। कसौटी मात्र एक है कि आपके अंदर आदमी कितना जीवित है। ईएमएस/10 जनवरी2026