लेख
11-Jan-2026
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12 जनवरी 1863 को कोलकाता में जन्मे बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और उनके आध्यात्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस थे, जिनसे उन्होंने वेदांत और योग की शिक्षा ली. 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में भाग लिया और अपने भाषण से भारतीय आध्यात्मिकता और हिंदू धर्म का विश्वभर में प्रचार किया, जिससे उन्हें वैश्विक ख्याति मिली. उन्होंने रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो शिक्षा, सेवा और भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए समर्पित हैं.उन्होंने राष्ट्रवाद, शिक्षा, मानवतावाद और सामाजिक समानता पर जोर दिया; वे पाश्चात्य शिक्षा और भारतीय आध्यात्म के समन्वय के पक्षधर थे. वे युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं; उनका जन्मदिन भारत में राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है..क्योंकि स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनके घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने बेटे नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की तीव्र भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए परंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ। सन्‌ 1884 में विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े मेहमान-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर मेहमान को भोजन कराने वाले, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहें और मेहमान को अपने बिस्तर पर सुला दें। विज्ञापन रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे, परंतु परमहंस जी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंस जी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंस जी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ। स्वामी विवेकानंद अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुंब की देनदार हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में निरंतर हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि शेष था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे। एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानंद को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम रेखांकित हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी बढ़ी पूरी पी गए। कंपनी लोगो हिंदी हिंदी गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भंडार की महक फैली सके। उनकी इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा। 25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहनने के लिए। तत्पश्चात वे पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी।इस दौरान स्वामी विवेकानंद ने कहा कि राम और सीता भारत के आदर्श हैं। स्वामी विवेकानंद ने भगवान श्रीराम का आदर्श जीवन पश्चिम के सामने रखकर भारत के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का परिचय कराया, स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकी प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला, परंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चौंक गए। फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन साल तक वे अमेरिका रहे और वहां के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे। अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक संस्थाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकी विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया। 4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग दिया लेकिन उनके विचार आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है। ईएमएस / 11 जनवरी 26