पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर गंभीर संवैधानिक बहस के केंद्र में है। राजनीतिक सलाहकार संस्था आइ पैक के दफ्तर और उससे जुड़े ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के बाद जिस तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं हस्तक्षेप करती दिखीं उसने केवल राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश में संस्थागत मर्यादाओं को लेकर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। चुनाव से पहले इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बंगाल में राजनीति और प्रशासन के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है। ईडी की कार्रवाई को लेकर तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि यह पूरी तरह राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित है। वहीं केंद्रीय एजेंसी का कहना है कि मामला कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा है और जांच के ठोस आधार मौजूद हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि छापेमारी क्यों हुई। असली सवाल यह है कि एक संवैधानिक पद पर बैठी मुख्यमंत्री का इस तरह जांच प्रक्रिया में सीधे उतरना क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुरूप है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का हरी फाइल लेकर ईडी अधिकारियों के सामने आना केवल एक दृश्य नहीं था बल्कि यह एक राजनीतिक संदेश भी था। यह संदेश था कि राज्य की सत्ता केंद्रीय एजेंसियों को खुली चुनौती दे रही है। यदि कोई आम नागरिक या राजनीतिक कार्यकर्ता जांच एजेंसी के काम में बाधा डालता है तो उसे कानून का सामना करना पड़ता है। फिर वही नियम मुख्यमंत्री पर क्यों लागू नहीं होने चाहिए। यही वह बिंदु है जहां से संवैधानिक मर्यादा पर बहस शुरू होती है। ममता बनर्जी का यह कहना कि केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष को डराने के लिए किया जा रहा है एक पुराना आरोप है। इसमें आंशिक सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि केंद्र और राज्यों के बीच टकराव की राजनीति में एजेंसियां कई बार विवादों में आती हैं। लेकिन यह तर्क तभी तक स्वीकार्य है जब तक जांच प्रक्रिया में सहयोग किया जाए। यदि मुख्यमंत्री स्वयं जांच में हस्तक्षेप करती हैं और दस्तावेज हटाने के आरोप लगते हैं तो सवाल उनके इरादों पर उठना स्वाभाविक है। पिछले कार्यकालों की ओर देखें तो ममता बनर्जी की राजनीति का एक स्पष्ट पैटर्न सामने आता है। उन्होंने खुद को लगातार केंद्र के खिलाफ एक संघर्षशील नेता के रूप में पेश किया है। भूमि अधिग्रहण आंदोलन से सत्ता में आई तृणमूल कांग्रेस ने परिवर्तन का वादा किया था। लेकिन वर्षों बीतने के बाद यह परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित रह गया। शासन प्रणाली में वही समस्याएं और कई मामलों में उससे भी गंभीर स्थितियां देखने को मिलीं। कानून व्यवस्था के मोर्चे पर पश्चिम बंगाल लंबे समय से सवालों के घेरे में रहा है। चुनावी हिंसा यहां एक सामान्य घटना बन चुकी है। पंचायत से लेकर विधानसभा चुनाव तक खून बहने की खबरें आती रही हैं। राजनीतिक विरोधियों पर हमले और बूथ कैप्चरिंग जैसी घटनाओं ने लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर किया है। राज्य प्रशासन पर यह आरोप लगता रहा है कि वह सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई करने में उदासीन रहता है। पुलिस व्यवस्था की निष्पक्षता भी लगातार संदेह के घेरे में रही है। कई मामलों में यह देखा गया कि विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर सख्ती दिखाई गई जबकि तृणमूल समर्थकों को संरक्षण मिला। इससे यह धारणा बनी कि राज्य में कानून सभी के लिए समान नहीं है। जब कानून का पालन राजनीतिक पहचान पर निर्भर हो जाए तो लोकतंत्र का आधार कमजोर हो जाता है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी ममता सरकार का रिकॉर्ड सवालों से भरा रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाला और अन्य वित्तीय अनियमितताओं ने राज्य की प्रशासनिक साख को गहरी चोट पहुंचाई है। कई मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी जांच के दायरे में आए। इसके बावजूद सरकार का रुख हमेशा यही रहा कि यह सब राजनीतिक साजिश है। लेकिन जब लगातार एक के बाद एक मामले सामने आते हैं तो केवल साजिश का तर्क जनता को संतुष्ट नहीं कर पाता। कोयला तस्करी का मामला भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। ईडी का दावा है कि इसमें संगठित नेटवर्क और हवाला के जरिए धन का लेनदेन हुआ। यदि जांच एजेंसी के आरोप सही हैं तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों की लूट का मामला है। ऐसे में जांच को बाधित करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। तुष्टिकरण की राजनीति भी ममता बनर्जी की कार्यशैली का एक प्रमुख पहलू रही है। अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने के लिए सरकार पर बार बार आरोप लगे कि वह संतुलित नीति अपनाने के बजाय एकतरफा फैसले करती है। इससे सामाजिक विभाजन गहरा हुआ। धर्म के आधार पर राजनीति करने से अल्पकालिक लाभ भले मिल जाए लेकिन दीर्घकाल में यह समाज को कमजोर करता है। सरकार की योजनाओं में भी यह आरोप लगा कि लाभ वितरण में समानता नहीं बरती गई। इससे बहुसंख्यक समाज में असंतोष बढ़ा और राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हुआ। एक मुख्यमंत्री का दायित्व होता है कि वह सभी वर्गों को साथ लेकर चले। लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति इस संतुलन को बिगाड़ देती है। ईडी की छापेमारी के दौरान राज्य पुलिस द्वारा एजेंसी अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करना भी अभूतपूर्व घटना है। इससे यह संदेश गया कि राज्य सरकार केंद्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसी के काम को रोकने के लिए पुलिस का इस्तेमाल कर रही है। यह संघीय ढांचे के लिए एक खतरनाक संकेत है। यदि हर राज्य सरकार केंद्रीय एजेंसियों की जांच को इस तरह चुनौती देने लगे तो कानून का राज कैसे चलेगा। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सबको है। केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करना विपक्ष का काम है। लेकिन जांच एजेंसियों के काम में बाधा डालना विरोध नहीं बल्कि कानून उल्लंघन है। मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का उदाहरण पेश करे न कि टकराव का। ममता बनर्जी का यह डर कि चुनावी वर्ष में उन्हें निशाना बनाया जा रहा है राजनीतिक दृष्टि से समझा जा सकता है। लेकिन डर के आधार पर संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ना स्वीकार्य नहीं हो सकता। यदि वे खुद को निर्दोष मानती हैं तो जांच का सामना करना ही सबसे मजबूत जवाब होता। आज पश्चिम बंगाल एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। जनता के सामने यह प्रश्न है कि क्या वह ऐसे नेतृत्व को समर्थन दे जो संस्थाओं से टकराव को राजनीति का हथियार बनाता है या फिर कानून और पारदर्शिता को प्राथमिकता देता है। चुनाव केवल सत्ता का नहीं बल्कि शासन के मॉडल का चयन भी होता है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ममता बनर्जी की राजनीति टकराव और आरोपों के इर्द गिर्द घूमती है। पिछले कार्यकाल का अनुभव बताता है कि कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर सरकार की विश्वसनीयता कमजोर हुई है। तुष्टिकरण की नीति ने सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचाया है। एक मजबूत लोकतंत्र में नेता कानून से ऊपर नहीं होता। मुख्यमंत्री हो या आम नागरिक सभी को समान नियमों का पालन करना होता है। यदि यही सिद्धांत स्थापित नहीं हुआ तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा। पश्चिम बंगाल की जनता और देश की संवैधानिक संस्थाओं के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड़, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार लेखक) ईएमएस / 11 जनवरी 26