द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सारी दुनिया के देशों के लिए बनी बहुपक्षीय व्यवस्था का अहम स्तंभ विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) अस्तित्व में आया था। 1995 में अस्तित्व में आए डब्ल्यूटीओ का उद्देश्य था,नियम-आधारित, पारदर्शी और भेदभाव-रहित वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देना। वैश्विक व्यापार के जरिए दुनिया के सारे देशों को आपस में आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए जोड़ना। लगभग तीन दशक बाद, वैश्विक व्यापार संधि सबसे गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और विकसित देशों की बदलती प्राथमिकताओं ने इसके भविष्य पर सवाल खडेक करना शुरू कर दिया है। डब्ल्यूटीओ की सबसे बड़ी ताकत उसका नियम-आधारित ढांचा है। जिसमें सभी सदस्य देशों के लिए समान नियम तय किए गए। विकासशील देशों को विशेष और भिन्न व्यवहार के संरक्षण का प्रावधान किया गया था। ताकि वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें। किंतु समय के साथ विकसित देशों, विशेषकर अमेरिका ने यह तर्क देना शुरू किया। डब्ल्यूटीओ के नियम “पुराने” हो चुके हैं, उभरती अर्थव्यवस्थाएँ जैसे चीन इन नियमों का अनुचित लाभ उठा रहा है। डब्ल्यूटीओ के संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण नियमों की अवहेलना होने पर कोई भी देश इसकी अपील निकाय मे विवाद निपटाने के लिए न्यायाधिकरण में जा सकता था। अमेरिका द्वारा जजों की नियुक्ति रोके जाने के कारण यह निकाय निष्क्रिय हो चुका है। नतीजतन, डब्ल्यूटीओ की सबसे प्रभावी व्यवस्था—विवाद समाधान का यह नियम गोड़ हो गया है। नियमों के उल्लंघन पर फैसला ही न हो, तो नियमों का अस्तित्व भी अर्थहीन हो जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से अमेरिकी हितों के लिए टेरिफ़ व्यवस्था लागू की। डिजिटल व्यापार, ई-कॉमर्स, डेटा प्रवाह, पर्यावरणीय मानक और कार्बन टैक्स जैसे कारोबार मैं मनमाने शुल्क लगाए। इस तरह के विवाद पर डब्ल्यूटीओ स्पष्ट दिशा देने में पूरी तरह से असफल साबित हुआ है। वैश्विक अर्थव्यवस्था 21वीं सदी में प्रवेश कर चुकी है। डब्ल्यूटीओ अब भी 20वीं सदी के ढांचे में फंसा हुआ है। क्षेत्रीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों मैं समय के साथ सुधार होना जरूरी थे जो नहीं हुए। कुछ मामलों में समय के साथ बदलाव अति आवश्यक थे। वर्तमान अराजकता का बढ़ना इस बात का संकेत है। कई देश डब्ल्यूटीओ के बाहर भी विकल्प तलाश कर रहे हैं। इसमें जो देश शक्तिशाली हैं। वह अपनी डफली और अपना राग बज रहे हैं। जिसके कारण वैश्विक व्यापार संधि के भविष्य की राह आसान नहीं रही, वैश्विक व्यापार संधि को जीवित और प्रासंगिक बनाए रखने के लिए संस्थागत नियमों मे सुधार अनिवार्य है। विवाद निपटान प्रणाली को पुनर्जीवित करना, विकासशील देशों की चिंताओं को गंभीरता से लेना,नए व्यापार क्षेत्रों के लिए नियम बनाना समय की मांग है। अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ जैसे बड़े खिलाड़ियों को यह समझना होगा। “नियमों से बाहर की ताकत” अंततः सभी के लिए नुकसानदेह है। भारत जैसे देशों के लिए वैश्विक व्यापार संधि अब भी महत्वपूर्ण है। यही एक ऐसा वैश्विक मंच है, जहाँ अपेक्षाकृत समान अवसर सभी के लिए मिलते हैं। कृषि सब्सिडी, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे मुद्दों पर भारत की चिंताओं का समाधान वैश्विक व्यापार संधि के माध्यम से ही संभव है।संक्षेप में, डब्ल्यूटीओ का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा, दुनिया बहुपक्षवाद को बचाना चाहती है या “जिसकी ताकत उसकी शर्तें” वाले दौर को स्वीकार कर लेगी। अमेरिका ने जिस तरह की स्थिति बनाई है उसे लग रहा है जिसकी लाठी उसकी भैंस का जमाना आ गया है। यदि वैश्विक व्यापार संधि में सुधार नहीं हुए,तो विश्व में नई अराजकता पैदा होगी। राजनीतिक एवं सामरिक संतुलन में वैश्विक व्यापार ही संतुलन बनाकर रख सकता है। इसमें सभी पक्षों के हित जुड़े हुए होते हैं। ईएमएस / 12 जनवरी 26