12-Jan-2026
...


नई दिल्ली (ईएमएस)। विशेषज्ञ मानते हैं कि मानसिक सुकून पाने के लिए दवाओं के अलावा कुछ प्राकृतिक और सरल उपाय भी बेहद प्रभावी हो सकते हैं। इन्हीं में से एक है किताबें पढ़ना, जिसे बिब्लियो थेरेपी कहा जाता है। पढ़ना न केवल ज्ञान बढ़ाता है, बल्कि भावनाओं को समझने, तनाव घटाने और आत्मविश्वास मजबूत करने में भी मदद करता है। बिब्लियो थेरेपी का मतलब है पढ़ने के जरिए मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना। अमेरिकन नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, इस थेरेपी में स्व-सहायता वर्कबुक, उपन्यास, कहानियां, पंफलेट और ऑडियो बुक्स जैसी सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। व्यक्ति अपनी समस्या और मानसिक स्थिति के अनुसार किताबें पढ़ता है, जिससे उसे अपनी भावनाओं को समझने और उनसे निपटने का रास्ता मिलता है। यह पूरी तरह गैर-औषधीय और प्राकृतिक तरीका है, जिसे कोई भी व्यक्ति घर बैठे आसानी से अपना सकता है। कई शोधों में यह सामने आया है कि किताबें पढ़ने से मानसिक तनाव में उल्लेखनीय कमी आती है। खासतौर पर सर्जरी या किसी बड़े ऑपरेशन से पहले मरीजों में चिंता का स्तर काफी बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में बिब्लियो थेरेपी का उपयोग करने पर मरीजों की घबराहट कम होती है और मानसिक रूप से वे खुद को अधिक संतुलित महसूस करते हैं। शोध यह भी बताते हैं कि ऑपरेशन से पहले चिंता कम होने पर सर्जरी के बाद होने वाली जटिलताओं का खतरा भी घट जाता है। नर्स और स्वास्थ्यकर्मी इस पद्धति को अपनाकर मरीजों को मानसिक रूप से मजबूत बना सकते हैं। यह थेरेपी सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं है। रोजमर्रा की जिंदगी में भी जो लोग तनाव, अवसाद या चिंता से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह बेहद कारगर साबित हो सकती है। किताबों के माध्यम से व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से जुड़ता है, अपने हालात को समझता है और समाधान की दिशा में सोचने लगता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और मन को शांति मिलती है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिब्लियो थेरेपी की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी और सुलभता है। यह सस्ती है, कहीं भी और कभी भी अपनाई जा सकती है। नियमित रूप से अपनी पसंद की किताबें पढ़ना न केवल दिमाग को मजबूत बनाता है, बल्कि भावनात्मक संतुलन भी बनाए रखता है और व्यक्ति को अधिक सकारात्मक व रचनात्मक बनने में मदद करता है। बता दें कि तेज रफ्तार जिंदगी, काम का दबाव और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच आज तनाव, चिंता और एंग्जाइटी आम समस्या बन चुकी है। ऐसे समय में मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल उतनी ही जरूरी हो गई है, जितनी शारीरिक सेहत की। सुदामा/ईएमएस 12 जनवरी 2026