राष्ट्रीय
13-Jan-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इस समय एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ भारत के लिए मध्य एशिया का प्रवेश द्वार माना जाने वाला ईरान पिछले तीन वर्षों के सबसे भीषण गृहयुद्ध जैसे संकट से जूझ रहा है, तो दूसरी तरफ भारत ने अफगानिस्तान में अपनी कूटनीतिक बाजी पलट दी है। काबुल के सन्नाटे के बीच तालिबान शासित अफगानिस्तान ने नूर अहमद नूर को नई दिल्ली में अपना नया राजदूत नियुक्त किया है। इसके जवाब में भारत ने भी काबुल स्थित अपने दूतावास को पूरी तरह सक्रिय करते हुए करण यादव को अपना दूत बनाकर वहां भेजा है। यह घटनाक्रम सामान्य लग सकता है, लेकिन ईरान में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों और सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा और साहसिक दांव माना जा रहा है। अगस्त 2021 में जब काबुल पर तालिबान का कब्जा हुआ था, तब वैश्विक विशेषज्ञों ने माना था कि अफगानिस्तान में भारत का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो चुका है। पाकिस्तान इस बात का जश्न मना रहा था कि उसे वहां रणनीतिक गहराई हासिल हो गई है। लेकिन 2026 आते-आते स्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। नूर अहमद नूर का दिल्ली आना और करण यादव का काबुल में कमान संभालना इस बात का संकेत है कि भारत अब आदर्शवाद के बजाय कठोर राष्ट्रहितों को प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन पूर्ण राजनयिक मिशन का संचालन शुरू करना यह दर्शाता है कि भारत वहां चीन और पाकिस्तान द्वारा छोड़े गए खाली स्थान को भरने के लिए तैयार है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह कदम काबुल में बीजिंग और इस्लामाबाद के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए उठाया गया है। अफगानिस्तान में भारत की इस सक्रियता के पीछे ईरान का गहराता संकट एक बड़ी वजह है। इस वक्त ईरान बारूद के ढेर पर बैठा है और वहां की सड़कों पर मौत का तांडव दिखाई दे रहा है। प्रदर्शनकारी धार्मिक शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर हैं और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में बड़ी मस्जिदों को आग की लपटों में घिरा देखा जा सकता है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस हिंसा में अब तक 500 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और हजारों को हिरासत में लिया गया है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि उसने अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह में भारी निवेश किया है। यदि ईरान में गृहयुद्ध और लंबा खिंचता है या सत्ता परिवर्तन हिंसक होता है, तो चाबहार पोर्ट और उससे जुड़ा व्यापारिक मार्ग ठप हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही चेतावनी दी है कि यदि ईरानी सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की, तो अमेरिका भी सैन्य कार्रवाई शुरू कर सकता है। ऐसे अनिश्चित माहौल में भारत केवल ईरान के भरोसे नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत ने अफगानिस्तान के भीतर अपनी उपस्थिति को दोबारा मजबूत कर लिया है ताकि अगर ईरान का रास्ता बाधित हो, तो भी अफगानिस्तान के भीतर भारत के हित सुरक्षित रहें। रोचक बात यह है कि जो तालिबान कभी पाकिस्तान की कठपुतली माना जाता था, वह अब भारत से सहयोग की गुहार लगा रहा है। तालिबान चाहता है कि भारत अपनी अधूरी विकास परियोजनाओं को फिर से शुरू करे और इसके बदले वह भारतीय राजनयिकों को पूरी सुरक्षा देने का वादा कर रहा है। भारत के लिए अपने प्रमुख प्रोजेक्ट्स जैसे सलमा बांध (मैत्री बांध), अफगान संसद भवन और विभिन्न स्कूलों व अस्पतालों के निवेश को बचाना प्राथमिकता है। करण यादव और उनकी टीम का मुख्य कार्य इन परियोजनाओं की सीधी निगरानी करना होगा। भारत का यह सॉफ्ट पावर ही है जिसकी वजह से अफगान जनता और वहां की वर्तमान सत्ता पाकिस्तान के बजाय भारत की ओर देख रही है, क्योंकि पाकिस्तान ने वहां अशांति फैलाई जबकि भारत ने विकास की नींव रखी। वीरेंद्र/ईएमएस 13 जनवरी 2026