आईजोल (ईएमएस)। वैज्ञानिकों ने मिजोरम राज्य की रहस्यमयी पहाड़ियों में सांप की लगभग अदृश्य बनी रही प्रजाति की खोज की है । वैज्ञानिक द्वारा करीब 15 साल की लंबी रिसर्च, फील्ड स्टडी और गहन डीएनए विश्लेषण के बाद इस नई प्रजाति को मान्यता मिली है। इस सांप को ‘अदृश्य’ इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह न तो आमतौर पर दिखाई देता है और न ही इंसानों के संपर्क में आता है। इस खोज ने न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के हर्पेटोलॉजिस्ट यानी सरीसृप विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। यह सांप जमीन के नीचे रहने वाला, रात में सक्रिय और आकार में बेहद छोटा है, जिसकी वजह से दशकों तक यह वैज्ञानिकों की नजर से ओझल रहा। जब इसके डीएनए की जांच की गई तो यह अपनी नजदीकी प्रजातियों से करीब 15 प्रतिशत तक अलग पाया गया। इसी जेनेटिक अंतर ने यह साफ कर दिया कि यह कोई ज्ञात प्रजाति नहीं, बल्कि एक पूरी तरह नई स्पीशीज है। इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम ‘कैलामेरिया मिजोरामेंसिस’ रखा गया है, जो मिजोरम राज्य के नाम से प्रेरित है। यह रीड स्नेक यानी कैलामेरिया जीनस से संबंध रखती है। दुनिया भर में कैलामेरिया जीनस की अब तक 69 प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर इतनी गुप्त और छिपकर रहने वाली हैं कि उन पर रिसर्च बहुत सीमित रही है। कैलामेरिया मिजोरामेंसिस की लंबाई करीब 20 से 30 सेंटीमीटर के बीच पाई गई है। इसका शरीर पतला, चिकना और भूरा-ग्रे रंग का होता है, आंखें छोटी होती हैं और यह पूरी तरह गैर-विषैला सांप है, जिससे इंसानों को किसी तरह का खतरा नहीं है। इस खोज की कहानी साल 2008 में शुरू हुई थी, जब मिजोरम यूनिवर्सिटी के कैंपस में पहली बार इसका एक नमूना मिला। उस समय वैज्ञानिकों को लगा कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में पाई जाने वाली किसी पहले से ज्ञात प्रजाति का हिस्सा होगा। लेकिन जब इसके जेनेटिक आंकड़ों की तुलना की गई, तो कई सवाल खड़े हो गए। इसके बाद प्रोफेसर एच.टी. लालरेमसांगा और उनकी टीम ने मिजोरम के अलग-अलग इलाकों ऐजॉल, रेइक, सिहफिर, सॉलेन्ग, मामित और कोलासिब से लगातार नमूने इकट्ठा किए। रूस, जर्मनी और वियतनाम के वैज्ञानिकों के सहयोग से डीएनए विश्लेषण किया गया और करीब 15 साल बाद यह स्पष्ट हुआ कि यह सांप आनुवंशिक रूप से एक अलग प्रजाति है। यह खोज मिजोरम और पूरे नॉर्थईस्ट भारत की जैव विविधता को वैश्विक मंच पर मजबूती से स्थापित करती है। रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने मिजोरम की हर्पेटोफॉना की एक अपडेटेड सूची भी तैयार की, जिसमें कुल 169 प्रजातियां दर्ज की गईं, जिनमें 52 उभयचर और 117 सरीसृप शामिल हैं। फिलहाल कैलामेरिया मिजोरामेंसिस की पुष्टि केवल मिजोरम में हुई है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि यह मणिपुर, नागालैंड, असम और बांग्लादेश के चटगांव हिल ट्रैक्ट्स में भी पाई जा सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज इस बात का प्रमाण है कि नॉर्थईस्ट भारत आज भी जैविक रहस्यों से भरा हुआ है। सुदामा/ईएमएस 13 जनवरी 2026