कुछ ही महीनो में पांच राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। पिछले 4 वर्ष में जहां-जहां विधानसभा, लोकसभा और अन्य महत्वपूर्ण चुनाव होते हैं, वहां पर केंद्रीय परिवर्तन निदेशालय के अधिकारी (ईडी) ठीक उसी तरह से पहुंच जाती है जिस तरह से चुनाव आयोग वहां पर चुनाव कराने के लिए पहुंचता है। महाराष्ट्र, दिल्ली, झारखंड, छत्तीसगढ़ के जब चुनाव हुए थे, तब ईडी की कार्यवाही को सबने देखा है। लोकसभा के जब चुनाव हो रहे थे उस समय भी ईडी देश भर में सक्रिय हो गई थी। अब असम, केरल, पांडुचेरी, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु इत्यादि राज्यों में चुनाव होना है। वहां पर भी ईडी बड़ी तेजी के साथ सक्रिय हो गई है। चुनाव के कुछ महीने पहले ही कई वर्षों पुराने मामले की जांच और छापे की कार्यवाही ईडी के अधिकारी विपक्षी दलों के नेताओं या उनसे जुड़े हुए लोगों के खिलाफ कर देते हैं। भाजपा इसका इस्तेमाल चुनाव के लिए करती है। ईडी की इस टाइमिंग को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को विपक्षी दलों की शिकायतों को सुनने का ना तो समय है और ना ही वह सुनना चाहते हैं। केंद्र सरकार की शह पर ईडी सक्रिय होती है। इस तरह का आरोप विपक्षी नेता लगाते हैं। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार कोई हस्तक्षेप करेगी, इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पहले चुनाव आयोग जरूर निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए सजग रहता था। सभी राजनीतिक दलों को चुनाव में समान अवसर मिलें। इसको ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग समय-समय पर कार्यवाही करता था। पिछले 4 वर्षों में चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रहा। चुनाव आयोग के तीनो आयुक्त को विपक्षी दल गांधी जी के तीन बंदर बताने लगे हैं। जो भाजपा के खिलाफ शिकायत होने पर ना बुरा देखते हैं, ना बुरा सुनते हैं, ना बुरा कहते हैं। विपक्षी दल इसकी शिकायत कोर्ट में भी करते आ रहे हैं। हाल ही में ईडी के अधिकारी बंगाल के साथ-साथ तमिलनाडु, केरल और असम भी पहुंच गए हैं। सबसे बड़ी तीखी प्रतिक्रिया पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी ने दी है। पश्चिम बंगाल की टीएमसी पार्टी के आईटी सेल के आईपैड कंपनी पर ईडी के अधिकारियों ने छापा डाला। यह मामला 2020 में दर्ज किया गया था। दो चुनाव पहले हो चुके हैं। अब विधानसभा चुनाव के ठीक पहले ईडी के अधिकारी छापा मारने पहुंच गए। छापा स्थल पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहुंची। उन्होंने ईडी के अधिकारियों से पार्टी से संबंधित दस्तावेजों को छुड़ा लिया। ईडी के अधिकारियों के खिलाफ पश्चिम बंगाल पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया। वहां से ईडी के अधिकारियों को भागना पड़ा। अब यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ईडी लेकर गई है। इसी तरह से तमिलनाडु में शराब और रियल एस्टेट घोटाले को लेकर ईडी के अधिकारी सक्रिय हो गए हैं। इसी तरह केरल में गोल्ड तस्करी और सहकारी बैंक घोटाले के पुराने मामलों को खोलकर एलडीएफ के नेताओं और सरकार को घेरने की कोशिश ईडी के अधिकारी कर रहे हैं। केंद्रीय परिवर्तन निदेशालय (ईडी) के अधिकारियों का यह पैटर्न कोई नया नहीं है। इसके पहले भी झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को चुनाव के दौरान गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी तिहाड़ जेल की हवा खिलाई गई थी। महाराष्ट्र के चुनाव में शिवसेना और एनसीपी के नेताओं को भी ईडी ने अपने शिकंजे में कसा था। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़े हुए लोगों के खिलाफ ईडी ने कार्रवाई की थी। लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के सभी खातों को बंद कर दिया गया था। पिछले 4 वर्षों में ईडी का कोई विरोध नहीं हो रहा था, जिसके कारण ईडी का दायरा बढ़ता चला गया। लोकसभा-विधानसभा चुनाव के बाद अब स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में भी ईडी के अधिकारी चुनाव से पहले सक्रिय हो जाते हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग इन मामलौं में चुप्पी साधकर बैठा रहता है। विपक्षी राजनीतिक दल शिकायत करते हैं। चुनाव आयोग उस पर कोई कार्यवाही नहीं करता है। विपक्षी दल आरोप लगाते हैं, यह सब केंद्र सरकार के इशारे पर होता है। अब तो विपक्षी दल न्याय पालिका के खिलाफ भी खुलकर बोलने लगे हैं। विपक्षी दल जब न्यायपालिका में न्याय पाने के लिए जाते हैं, वहां से उन्हें न्याय तो नहीं मिलता है, हां तारीख पर तारीख जरूर मिलना शुरू हो जाती है। बिहार एसआईआर के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। बिहार में चुनाव भी हो गए, मामले की सुनवाई अभी भी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। ऐसी स्थिति में लोगों का संवैधानिक संस्थाओं से भरोसा उठने लगा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बता दिया है, वह इस लड़ाई को अब सड़कों पर लड़ने के लिए तैयार हैं। इससे विपक्षी दलों का डर और भय अब खत्म होने लगा है। विभिन्न राज्यों में यह प्रतिरोध अब देखने को मिलने लगा है। ममता बनर्जी के बाद अब अन्य विपक्षी दल के नेता बड़ी तेजी के साथ सक्रिय हो गए हैं। जिसके कारण आने वाले समय में चुनाव आयोग तथा ईडी के अधिकारियों की मुसीबतें बढ़ना तय है। ऐसा लोग अब कहने लगे हैं। न्यायपालिका को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी के प्रति सजग होना होगा। भारतीय संविधान में संविधान की रक्षा और मौलिक अधिकारों का संरक्षण करने का दायित्व न्यायपालिका का है। न्यायाधीशों में न्याय की नैतिकता और न्यायप्रियता तथा न्याय उचित समय पर मिले इसका ध्यान रखना होगा। अन्यथा देश अराजकता की ओर आगे बढ़ेगा, इसमें देश और सभी का नुकसान होगा। ईएमएस / 13 जनवरी 26