-भारत में हिंसा भड़की तो कौन होगा जिम्मेदार भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने युवाओं से “इतिहास का बदला लेने” का आह्वान किया है। यह उनका व्यक्तिगत विचार नहीं हो सकता है। यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का है। जो बीते बारह वर्षों से सत्ता के शीर्ष पर बैठकर देश की सुरक्षा, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने और क्रियान्वय का दायित्व निभा रहे हैं। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है, डोभाल ने बदला लेने की बात किसके खिलाफ कही है? उनके भाषण से ऐसा लग रहा था, 1000 वर्ष पुराने इतिहास के लोग जो मुर्दे के रूप में कब्र में दफन हैं, उनके वारिसों तथा उस धर्म के मानने वाले लोगों से बदला लेने की बात कह रहे हैं। यदि इस सोच से भारत में हिंसा भड़की, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? दरअसल डोभाल अपने भाषण में कहते हैं, बदला कोई अच्छा शब्द नहीं है, लेकिन उसका एक “ह्यूज फोर्स” हो सकता है। यहीं से समस्या शुरू होती है। इतिहास के अत्याचारों, मंदिरों के विध्वंस, अपमान और गुलामी की पीड़ा का उल्लेख करते हुए जब बदले जैसे शब्द का प्रयोग करते हैं, तो उसका अर्थ केवल प्रतीकात्मक नहीं होता। यह एक भावनात्मक सोच और राजनीतिक संकेत बन जाता है। जिसे अलग-अलग सोच के अनुसार अलग-अलग तरीके से समझा और इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है, इस बदले का लक्ष्य कौन है? इतिहास में जो अत्याचारी हुए हैं, वो वर्तमान में मौजूद नहीं हैं। न अंग्रेज हैं, न मध्यकालीन युग के आक्रांता हैं। ना पुराने राजा-महाराजा हैं। जिन्होंने आम जनता के ऊपर अत्याचार किए थे। ऐसे में बदले की भावना अनिवार्य रूप से आज के समाज में किसी न किसी समुदाय से जोड़ी जा सकती है। यही वह बिंदु है, जहां पर यह बयान बहुत खतरनाक हो जाता है। गौर करने वाली बात यह है, कि पहले जितने आक्रमण हुए हैं, वह सब सत्ता के लिए हुए हैं। आज भी जो हो रहा है, वह सत्ता में बने रहने और सत्ता पाने के लिए हो रहा है। महबूबा मुफ्ती जैसी नेताओं की प्रतिक्रिया इस आशंका को उजागर करती है, इस तरह के बयान अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत और हिंसा को वैध ठहराने के लिए बदला लेने के लिए दिए जा रहे हैं। यह भी गौर करने योग्य है। यह बयान ऐसे समय आया है जब सत्ता पक्ष लगातार हजारों साल पुराने घावों और यादों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला रहा है। सोमनाथ से लेकर विभाजन तक की याद में प्रधानमंत्री के भाषणों और डोभाल के वक्तव्य एक जैसी भाषा और भाव का होना महज संयोग नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है, जहां एक राजनेता का बयान राजनीति के खाते में डाला जा सकता है, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कथन राज्य की सोच और दिशा का संकेत है। यदि भविष्य में “इतिहास के बदले” की इस भाषा और भावना से प्रेरित होकर कहीं पर भी सामाजिक हिंसा भड़कती है, तो यह कहना मुश्किल होगा, राज्य अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है। सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते। वह सत्ता के आचरण, सत्ता की सोच और सत्ता की कार्रवाई को दिशा देते हैं। इसलिए जवाबदेही भी डोभाल की उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। भारत को महान बनाने का रास्ता बदले से संभव नहीं हो सकता है, बदले में हमेशा विनाश होता है। जिन्होंने क्रूरता की थी, या अपराध किए थे, वो आज अस्तित्व में नहीं है। उनकी पीढ़ियां भी अस्तित्व में है या नहीं यह कोई नहीं जान पाता है। भारत के आर्थिक एवं सामाजिक विकास का रास्ता संविधान, समानता से होकर गुजरता है। इतिहास से हमेशा सीख ली जा सकती है। इतिहास में जो गलतियां हुई हैं, और उन गलतियों से जो नुकसान हुआ है, उनसे बचा जा सकता है। उससे प्रेरणा ली जा सकती है। बदले की आग में देश को झोंकना देश को आगे नहीं, पीछे की ओर ले जाएगा। जो भी देश बदले की आग में जल रहे हैं, उनका हश्र डोभाल साहब आप देख लें। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे अहम पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा स्वाभाविक है। वह “बदले” का अर्थ स्पष्ट करें। क्योंकि अस्पष्ट शब्द, बहुत बड़े खतरे की ओर ले जाने वाले हैं। इस तरह के शब्दों और भावनाओं का उपयोग समय-समय पर सत्ता में बने रहने के लिए राज सत्ताओं ने किया है, जिसमें हमेशा हजारों, लाखों लोगों की बलि चढ़ी है। क्या आप सत्ता को बनाए रखने के लिए एक बार फिर बली के लिए युवाओं की तलाश कर रहे हैं? आपके कथन से यही संदेश जाता हुआ दिख रहा है। ईएमएस / 14 जनवरी 26