कर्ज में डूबे किसान, उत्सव मना रही सरकार: मध्य प्रदेश में कल्याण वर्ष की सच्चाई सब कुछ लुटा के होश में आये तो क्या किया। दिन में अगर चरा$ग जलाये तो क्या किया। ये पंक्तियाँ आज मध्य प्रदेश की कृषि स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। भाजपा सरकार ने 2026 को कृषक कल्याण वर्ष घोषित किया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भोपाल में ट्रैक्टर रैली निकालकर इसका शानदार उद्घाटन किया, लेकिन यह घोषणा 22 साल की सत्ता के बाद आई है। क्या इतने सालों में किसानों की याद नहीं आई? पिछले दो दशकों में भाजपा ने किसानों को जिस कगार पर पहुँचा दिया है, उसे ठीक करने में दशक लगेंगे। यह कल्याण वर्ष महज चुनावी जुमला लगता है, जबकि हकीकत में किसान बीज, खाद, पानी, बिजली, मंडी और एमएसपी जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सरकार के समर्थन से बिचौलिये किसानों के हक छीन रहे हैं, और किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। इस अभियान के तहत सरकार 30 लाख किसानों को सोलर वितरण करेगी। रूस्क्क के बजाए भावांतर योजना को बढ़ाने की बात कर रही हैं। प्राकृतिक खेती जैसे कामों को बढ़ावा देने की बात कर रही हैं। जबकि मूल समस्या पर कोई चर्चा नहीं। मध्य प्रदेश कृषि प्रधान राज्य है, लेकिन किसानों की हालत दयनीय है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के किसानों की औसत मासिक आय राष्ट्रीय औसत से 2,000 रुपये कम है। 2018-19 के सर्वे में यह आय 8,339 रुपये थी, और 2023-25 तक इसमें सुधार नहीं हुआ। राष्ट्रीय औसत 10,218 रुपये है, लेकिन मध्य प्रदेश में किसान गरीबी की मार झेल रहे हैं। लागत बढ़ रही है, लेकिन फसल का दाम नहीं मिलता। एमएसपी के नाम पर सरकार भावांतर भुगतान योजना चला रही है, जो किसानों से ज्यादा बिचौलियों को फायदा पहुँचा रही है। योजना की घोषणा के बाद ही बाजार में सोयाबीन की कीमतें गिर गईं। किसान संगठनों का आरोप है कि व्यापारी कीमतों में हेरफेर करते हैं, और योजना में देरी से भुगतान होता है। 2025 में योजना के तहत 3.77 लाख सोयाबीन किसानों को 810 करोड़ रुपये दिए गए, लेकिन कई किसान शिकायत करते हैं कि मॉडल मूल्य वास्तविक बिक्री मूल्य से मेल नहीं खाता। परिवहन लागत जोड़ें तो छोटे किसान घाटे में रह जाते हैं। कम आय का सीधा असर कर्ज पर पड़ता है। प्रदेश के हर किसान पर औसतन 1.84 लाख रुपये का कर्ज है। संसद में मोदी सरकार ने हालिया सत्र में बताया कि 92.49 लाख किसानों पर कुल 1.69 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है, जो हर साल 10-12 प्रतिशत बढ़ रहा है। 2023-25 के आंकड़ों से पता चलता है कि कर्ज का बोझ किसानों को तोड़ रहा है। फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) भी मजाक बन गई है। किसानों से प्रीमियम के रूप में करोड़ों वसूले जाते हैं, लेकिन क्लेम मिलते हैं नाममात्र। योजना के तहत मध्य प्रदेश में 2022-23 से 2024-25 तक 25 लाख से ज्यादा किसानों ने आवेदन किए, लेकिन क्लेम सेटलमेंट रेशियो राष्ट्रीय औसत से कम है। कंपनियाँ करोड़ों कमाती हैं, जबकि किसान 100 रुपये के क्लेम पर लड़ते हैं। 2023 में कुल क्लेम 1.72 लाख करोड़ रुपये देशभर में दिए गए, लेकिन मध्य प्रदेश में कई किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिला। देरी के कारण किसान और कर्ज में डूब जाते हैं। यह सब किसानों को मौत की ओर धकेल रहा है। एनसीआरबी की 2025 रिपोर्ट (2023 डेटा) के अनुसार, मध्य प्रदेश में 777 किसानों ने आत्महत्या की, यानी हर रोज दो से ज्यादा। 2022 में यह संख्या 641 थी। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश तीसरा सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य है। जलवायु परिवर्तन, सूखा, फसल नुकसान और कर्ज ने किसानों को मजबूर किया है। कांग्रेस सरकार ने 2019 में जय किसान फसल ऋण माफी योजना के तहत 27 लाख छोटे किसानों का कर्ज माफ किया था, कुल 11,675 करोड़ रुपये। बाकी किसानों के भी $कज़र् मा$फ होते अगर भाजपा षड्यंत्र कर जनता के साथ धोखा नहीं करती। और सत्ता में आते ही भाजपा ने यह योजना बंद कर दी। यह बात सा$फ ज़ाहिर होती है कि भाजपा किसानों से ज़्यादा व्यापारियों और बिचौलियों को तरजीह देती हैं। वहीं दूसरी तरफ किसान कर्ज के जाल में फंसते चले जा रहे हैं। सरकार की लापरवाही का एक और उदाहरण है मध्य प्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम। फसल खरीदी की जिम्मेदारी वाला यह निगम 62,944 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा है। हर रोज 14.5 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में बैंक को चुकाता है। मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने विधानसभा में स्वीकार किया कि निगम दिवालिया होने की कगार पर है। अनाज सड़ रहा है, क्योंकि केंद्र से रीइंबर्समेंट में देरी हो रही है। मुख्यमंत्री ने केंद्र से सेंट्रलाइज्ड प्रोक्योरमेंट की मांग की है, लेकिन राज्य की जिम्मेदारी से क्यों भाग रहे हैं? मुख्यमंत्री से सवाल मेरा मुख्यमंत्री से सीधा सवाल है कि क्या इस कृषक कल्याण वर्ष में इन समस्याओं का समाधान पर काम होगा? या सिर्फ इस अभियान का मुख्य उद्देश्य जनता के पैसों की कमाई से अपनी इमेज बिल्डिंग का अभियान है। अगर भाजपा और मुख्यमंत्री वाकई किसानों का भला चाहते हैं, तो चुनावी वादे के मुताबिक एमएसपी दें। खाद-बीज वितरण सुधारें, कर्ज कम करने के लिए ठोस कदम उठाएँ। भंडारण व्यवस्था बेहतर करें और इसे प्राइवेट हाथों में न दें, क्योंकि इससे बिचौलिये और मजबूत होंगे। फसल बीमा योजना में पारदर्शिता लाएँ, किसानों को समय पर और सही क्लेम दें। कांग्रेस ने साबित किया कि कर्ज माफी संभव है, लेकिन भाजपा की नीयत साफ नहीं। किसान अब जुमलों से नहीं, हकीकत से जीएंगे। अगर सरकार नहीं जागी, तो किसान का गुस्सा सड़कों पर उतरेगा। यह वर्ष कल्याण का हो या किसानों की और दुर्दशा का—समय बताएगा। (लेखक मध्य प्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष है।)