लेख
15-Jan-2026
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साबरमती रिवरफ्रंट से जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने एक साथ पतंग उड़ाई, तो वह दृश्य केवल उत्तरायण के उल्लास का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत-जर्मनी संबंधों की उस उड़ान का संकेत भी था, जो संस्कृति से लेकर रणनीति और व्यापार से लेकर तकनीक तक नए आयाम छू रही है। अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव आईकेएफ-2026 का शुभारंभ एक ऐसे मंच पर हुआ, जहाँ रंगीन पतंगों के साथ-साथ कूटनीति, आर्थिक सहयोग और रक्षा साझेदारी के संदेश भी हवा में घुले हुए थे। अहमदाबाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पोल-हवेलियों की स्थापत्य झलक, पतंग संग्रहालय, संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियाँ इन सबने मिलकर यह बता दिया कि भारत अपनी सांस्कृतिक शक्ति के साथ वैश्विक मित्रताओं को कैसे सशक्त करता है। उत्तरायण गुजरात की आत्मा से जुड़ा पर्व है। यह केवल पतंगबाजी नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, लोककला, संगीत और परंपरा का संगम है। जब इसी मंच पर जर्मनी के राष्ट्राध्यक्ष अतिथि के रूप में उपस्थित हुए, तो यह संदेश स्पष्ट था कि भारत अपने मित्र देशों को केवल औपचारिक बैठकों में नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक धड़कन में भी आमंत्रित करता है। पोल और हवेली की प्रतिकृतियाँ, कारीगरों द्वारा पतंग निर्माण का जीवंत प्रदर्शन, गरबा रास, कुचिपुड़ी, भरतनाट्यम और मलखंब जैसी कलाओं की प्रस्तुतियाँ तथा भारतीय और जर्मन धुनों का समन्वय यह सब भारत की सॉफ्ट पावर का प्रभावशाली प्रदर्शन था। ऐसी सांस्कृतिक कूटनीति रिश्तों को केवल समझौतों तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि उनमें भावनात्मक मजबूती भी जोड़ती है। इसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बीच भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी सामने आया। रक्षा क्षेत्र में सहयोग को नई ऊँचाई देने वाली प्रोजेक्ट-75 की पनडुब्बी परियोजना इस साझेदारी का प्रतीक बनकर उभरी है। जर्मनी की प्रसिद्ध रक्षा कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स और भारत के मझगांव डॉकयार्ड लिमिटेड के बीच पहले से हुए समझौते के तहत छह अत्याधुनिक स्टील्थ पारंपरिक पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाना प्रस्तावित है। लगभग 8 बिलियन डॉलर, यानी करीब 72 हजार करोड़ रुपये की यह डील भारतीय नौसेना के इतिहास की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिनी जा रही है। इन पनडुब्बियों की खासियत एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन तकनीक है, जो उन्हें लंबे समय तक बिना सतह पर आए समुद्र के भीतर ऑपरेशन करने में सक्षम बनाएगी। कम शोर, अधिक स्टील्थ और लंबी अवधि तक छिपे रहने की क्षमता यही वह गुण हैं, जिनकी भारतीय नौसेना को लंबे समय से तलाश थी। इस डील का महत्व केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है। इसका सीधा लाभ ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों को मिलता है। निर्माण भारत में होने से देश के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी, कुशल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और तकनीकी ज्ञान का हस्तांतरण होगा। जर्मनी के लिए यह डील भारत जैसे बड़े और भरोसेमंद साझेदार के साथ दीर्घकालिक सहयोग का अवसर है, जबकि भारत के लिए यह समुद्री सुरक्षा और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन को मजबूत करने का साधन बनती है। बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा और समुद्री चुनौतियों के दौर में यह साझेदारी भारत की प्रतिरोधक क्षमता को नई धार देती है। भारत और जर्मनी के रिश्ते केवल रक्षा तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक और व्यापारिक सहयोग भी निरंतर विस्तार पा रहा है। आज भारत में दो हजार से अधिक जर्मन कंपनियाँ सक्रिय हैं, जो ऑटोमोबाइल, इंजीनियरिंग, रसायन, ऊर्जा, आईटी, नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में काम कर रही हैं। यह संख्या जर्मनी के भारत पर भरोसे और भारत के बढ़ते बाजार सामर्थ्य का प्रमाण है। द्विपक्षीय व्यापार की बात करें तो भारत और जर्मनी के बीच वार्षिक व्यापार लगभग 26 से 30 बिलियन डॉलर के बीच आंका जाता है, और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की संभावनाएँ जताई जा रही हैं। जर्मनी से भारत मुख्य रूप से मशीनरी, औद्योगिक उपकरण, ऑटोमोबाइल और उनके पुर्जे, रसायन, इलेक्ट्रिकल उपकरण, मेडिकल टेक्नोलॉजी और उन्नत इंजीनियरिंग उत्पाद आयात करता है। ये वे क्षेत्र हैं, जहाँ जर्मनी की तकनीकी दक्षता विश्वभर में प्रसिद्ध है। दूसरी ओर भारत जर्मनी को वस्त्र, परिधान, चमड़ा उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, आईटी सेवाएँ, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स, कृषि-आधारित उत्पाद और इंजीनियरिंग गुड्स का निर्यात करता है। सेवा क्षेत्र में आईटी और डिजिटल समाधान भारत की मजबूत उपस्थिति को दर्शाते हैं, जबकि फार्मा और रसायन क्षेत्र भारत की विनिर्माण क्षमता का उदाहरण हैं। इस व्यापारिक रिश्ते का लाभ दोनों पक्षों को मिलता है। जर्मनी को भारत जैसे तेजी से बढ़ते बाजार तक पहुँच मिलती है, जहाँ युवा आबादी, बुनियादी ढांचे का विस्तार और औद्योगिक विकास की अपार संभावनाएँ हैं। भारत को जर्मनी से उन्नत तकनीक, गुणवत्ता मानक और नवाचार का लाभ मिलता है, जो घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाता है। यही कारण है कि दोनों देश केवल पारंपरिक व्यापार तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि स्टार्टअप्स, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, ग्रीन टेक्नोलॉजी और सस्टेनेबिलिटी जैसे क्षेत्रों में भी साझेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं। कच्छ-सौराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में निवेश और व्यापारिक सम्मेलनों के जरिए इस सहयोग को जमीनी स्तर तक ले जाने की कोशिश दिखाई देती है। बी-टू-बी और बी-टू-जी बैठकों में जिस तरह का उत्साह देखने को मिल रहा है, वह बताता है कि स्थानीय उद्यमी, कारीगर, स्टार्टअप्स और तकनीकी विद्यार्थी वैश्विक अवसरों से जुड़ने के लिए तैयार हैं। ऐसे आयोजनों में उद्योग, कृषि, मत्स्य पालन, पर्यटन, पर्यावरण, सस्टेनेबिलिटी और भविष्य की तकनीकों पर संवाद न केवल निवेश को आकर्षित करता है, बल्कि ज्ञान और नवाचार के आदान-प्रदान को भी गति देता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की मुलाकात के बाद यह स्पष्ट संदेश सामने आया कि भारत-जर्मनी साझेदारी बहुआयामी है। यह साझेदारी लोकतांत्रिक मूल्यों, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और शांतिपूर्ण सहयोग पर आधारित है। रक्षा क्षेत्र में विश्वास, व्यापार में परस्पर लाभ, तकनीक में साझेदारी और संस्कृति में आत्मीयता इन चार स्तंभों पर यह रिश्ता आगे बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव जैसे मंच पर इसका प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि भारत अपनी कूटनीति को केवल बंद कमरों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे जन-उत्सवों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाता है। साबरमती के आसमान में उड़ी पतंगें इस बात की गवाह बनीं कि भारत और जर्मनी के संबंध केवल कागजी समझौतों तक सीमित नहीं हैं। यह एक ऐसी मित्रता है, जो संगीत की लय, नृत्य की मुद्राओं, कारीगरों की कला और रणनीतिक समझौतों आदि सबमें समान रूप से दिखाई देती है। आने वाले वर्षों में जब यह साझेदारी और गहरी होगी, तब शायद इन पतंगों की डोरें नए व्यापारिक मार्गों, नई तकनीकी खोजों और मजबूत रणनीतिक संतुलन से जुड़ी नजर आएँगी। साबरमती से उठा यह दोस्ती का संदेश दूर-दूर तक गया है, और संकेत दे रहा है कि भारत-जर्मनी संबंधों का आकाश अभी और भी विस्तृत होने वाला है। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस/15/01/26