क्षेत्रीय
15-Jan-2026
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* सिंगरौली( ई एम एस )जिले में संचालित आजीविका मिशन अब अपने मूल उद्देश्य—गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन—से भटकता हुआ प्रतीत हो रहा है। मिशन के भीतर जो कुछ घटित हो रहा है, वह किसी एक कर्मचारी या एक आदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक निरंकुशता, न्यायालय की अवमानना और कथित राजनीतिक संरक्षण का गंभीर संकेत देता है। वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि संविदा कर्मचारियों का अटैचमेंट पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। संविदा कर्मचारी उसी स्थान पर कार्य करेगा, जहां उसकी मूल नियुक्ति हुई है या नियमानुसार स्थानांतरण किया गया हो। इसके बावजूद सिंगरौली में वर्षों से इस आदेश को खुलेआम रौंदा जा रहा है। सवाल यह नहीं है कि आदेश का उल्लंघन हुआ, सवाल यह है कि इतने वर्षों तक किसी ने जवाबदेही क्यों तय नहीं की? देवसर में सहायक विकासखंड प्रबंधक के पद पर नियुक्त संजीव सिंह को नियमों को ताक पर रखकर जिला मुख्यालय बैढ़न में अटैच कर दिया गया। यह कदम न केवल संविदा सेवा शर्तों का उल्लंघन है, बल्कि यह दर्शाता है कि कुछ अधिकारी स्वयं को हाईकोर्ट से भी ऊपर समझने लगे हैं। यदि न्यायालय के आदेशों का यही सम्मान है, तो फिर कानून व्यवस्था पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा? यह भी विचारणीय है कि 12 वर्षों से अधिक समय से कुछ अधिकारी एक ही पद पर अंगद की तरह जमे हुए हैं। क्या यह मात्र संयोग है या फिर इसके पीछे राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की मजबूत दीवार खड़ी है? जब अधिकारी बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन अवैध व्यवस्थाएं जस की तस बनी रहती हैं—तो संदेह स्वाभाविक है। हाल ही में जबलपुर हाईकोर्ट द्वारा 7 मार्च 2025 के अटैचमेंट आदेश को निरस्त किया जाना इस बात का प्रमाण है कि अटैचमेंट नीतिगत और कानूनी रूप से गलत है। इसके बावजूद यदि जिले में ऐसे आदेश जारी होते रहे, तो यह सीधे-सीधे न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में सिर्फ आदेश निरस्त करना पर्याप्त नहीं, बल्कि आदेश देने वालों पर दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य है। अब निगाहें नए जिला पंचायत सीईओ पर टिकी हैं। यह उनके लिए परीक्षा की घड़ी है—क्या वे पूर्ववर्तियों की तरह चुप्पी साधेंगे, या फिर हाईकोर्ट के आदेशों के अनुरूप सभी अवैध अटैचमेंट निरस्त कर दोषियों पर कार्रवाई करेंगे? यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र और न्यायपालिका की साख से जुड़ा प्रश्न बन जाएगा। कानून का पालन विकल्प नहीं, बाध्यता है। हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। आजीविका मिशन को भ्रष्टाचार और मनमानी से मुक्त करना ही होगा। अन्यथा, यह मिशन गरीबों की आजीविका नहीं, बल्कि कुछ अधिकारियों की सुविधाजनक कुर्सी बचाने का साधन बनकर रह जाएगा। आर एन पाण्डेय ई एम एस रिपोर्ट सिंगरौली