280 एजेंसिंयां ब्लैकलिस्ट करने के बाद फिर एक्शन, मिशन में लापरवाही पर 16 इंजीनियरों को मिलेगा शोकॉज नोटिस गड्ढे-नाली का दूषित पानी पी रहे लोग भोपाल(ईएमएस)। मप्र में सरकार का दावा है कि हर प्रदेशवासी को पीने का स्वच्छ पानी मुहैया कराना उसकी प्राथमिकता है। लेकिन इंदौर के भागीरथपुरा में काल बने पीने के पानी के बाद विभिन्न रिपोट्स में खुलासा हुआ है कि मप्र में जल जीवन मिशन फेल हो गया है। योजना के हैंडपंप खराब हो गए है, नल सूख गए हैं। आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे अधिक खराब है। आलम यह है कि ग्रामीण गड्ढे-नाली का दूषित पानी पीने को मजबूर हो रहे हैं। उधर, जल जीवन मिशन में घोटालों की परतें लगातार खुलती जा रही हैं। मुख्य सचिव की समीक्षा बैठक में दो माह पहले 280 एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट किए जाने और 141 सब इंजीनियरों व एक्जीक्यूटिव इंजीनियरों को नोटिस थमाने के बाद एक बार फिर 3 अधीक्षण यंत्रियों एवं 13 कार्यपालन यंत्रियों को कारण बताओ सूचना पत्र जारी करने का निर्णय लिया गया है। प्रमुख सचिव पीएचई विभाग ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि भविष्य में यदि कार्यों की प्रगति में किसी प्रकार की शिथिलता पाई गई तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। प्रमुख सचिव, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी पी नरहरि ने जल जीवन मिशन के कार्यों की समीक्षा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से की। नरहरि ने कार्यों में शिथिलता और लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के प्रति सख्ती का फैसला किया है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मीटिंग में उन्होंने 3 अधीक्षण यंत्रियों एवं 13 कार्यपालन यंत्रियों को कारण बताओ सूचना पत्र जारी करने के निर्देश दिए। साथ ही स्पष्ट किया कि मिशन के कामों की धीमी प्रगति के लिए संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय की जाएगी। उन्होंने प्रदेश के सभी जिलों के अधीक्षण यंत्री, कार्यपालन यंत्री एवं सहायक यंत्री स्तर तक के अधिकारी से जल जीवन मिशन के अंतर्गत चल रही योजनाओं की अपडेट स्थिति की जानकारी ली। मैहर से आई चौंकाने वाली रिपोर्ट अभी हाल ही में मैहर जिले के टेगना ररिया टोला का मामला सामने आया है जहां ग्रामीण इन दिनों गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। गांव के करीब 24 परिवारों को पीने के लिए स्वच्छ पानी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि लोगों को गड्ढों और नालियों में जमा दूषित पानी का उपयोग पीने और दैनिक जरूरतों के लिए करना पड़ रहा है। गांव की महिलाएं रोजाना करीब तीन किलोमीटर दूर से डिब्बों और मटकों में पानी भरकर घर लाती हैं। यह पानी साफ नहीं है, लेकिन मजबूरी में इसी का उपयोग किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वच्छ पानी की कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ गया है। गांव में जल जीवन मिशन के तहत नल कनेक्शन लगाए गए थे, लेकिन नियमित जलापूर्ति नहीं हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कई दिनों तक नलों से एक बूंद पानी नहीं आता। योजना के क्रियान्वयन में लापरवाही के कारण ग्रामीणों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। गांव में मौजूद एकमात्र हैंडपंप लंबे समय से खराब पड़ा है। इसकी मरम्मत को लेकर कई बार शिकायत की गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। यदि हैंडपंप चालू होता, तो ग्रामीणों को कम से कम पीने का पानी मिल सकता था। मामले को लेकर जिला पंचायत सतना के सीईओ शैलेंद्र सिंह ने कहा कि रामनगर जनपद पंचायत के सीईओ को तत्काल स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि नल जल योजना बंद पाई जाती है, तो जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी। यह कहानी भले ही एक गांव की है, लेकिन ऐसे हालात प्रदेश के हजारों गांवों के है। नल कनेक्शन देने में सामने आई लापरवाही बैठक में एकल नलजल प्रदाय योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू नल कनेक्शन उपलब्ध कराए जाने की प्रगति की जिलेवार समीक्षा की गई। प्रगति रिपोर्ट के आधार पर यह पाया गया कि कई जिलों में घरों तक नल कनेक्शन प्रदान किए जाने की गति तय लक्ष्यों और तय समय-सीमा के अनुरूप नहीं है, जिससे मिशन के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो रही है। प्रमुख सचिव ने सभी अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि एकल नलजल प्रदाय योजनाओं के अंतर्गत शेष बचे कार्यों को निर्धारित समयावधि में अनिवार्य रूप से पूरा करें। उन्होंने अधिकारियों से साफ तौर पर कहा कि नियमित रूप से प्रगति की निगरानी की जाएगी। प्रमुख सचिव नरहरि ने कहा कि यह योजना केवल भौतिक संरचना तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण जनजीवन की गुणवत्ता में सुधार से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि भविष्य में यदि कार्यों की प्रगति में किसी प्रकार की शिथिलता पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। प्रमुख सचिव ने कहा कि फील्ड स्तर पर समन्वय बढ़ाते हुए गुणवत्ता, समय-सीमा और पारदर्शिता के साथ कार्यों को पूरा करने में तेजी लाई जाए। एक-तिहाई से अधिक पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं मप्र के गांवों में पीने के पानी पर आई एक रिपोर्ट आपको भी हैरान कर देगी। केंद्र सरकार के जल जीवन मिशन की एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से अधिक पीने का पानी इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं है, जिससे लाखों लोग अनदेखे लेकिन जानलेवा खतरों की चपेट में हैं। फंक्शनैलिटी असेसमेंट रिपोर्ट (कार्यक्षमता मूल्यांकन रिपोर्ट) के अनुसार मध्य प्रदेश में पानी के केवल 63.3 प्रतिशत नमूने ही गुणवत्ता मानकों पर खरे उतरे, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 76 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि राज्य के ग्रामीण इलाकों में 36.7 प्रतिशत पानी के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। इनमें हानिकारक बैक्टीरिया (कीटाणु) या रासायनिक मिलावट पाई गई है। ये नमूने सितंबर-अक्टूबर 2024 के दौरान मध्य प्रदेश के 15,000 से अधिक ग्रामीण घरों से इक_ा किए गए थे। यह स्थिति उन जगहों पर और भी अधिक चिंताजनक है जो सुरक्षा और इलाज के लिए बनी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में पानी के केवल 12 प्रतिशत नमूने ही सूक्ष्मजीवविज्ञानी सुरक्षा जांच में पास हो पाए, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 83.1 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के लगभग 88 प्रतिशत अस्पतालों में मरीजों को असुरक्षित पानी दिया जा रहा है। स्कूलों में 26.7 प्रतिशत नमूने माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट में फेल हो गए, जिससे बच्चे हर दिन दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। इन जिलों की हालत सबसे खराब अनूपपुर और डिंडोरी जैसे आदिवासी बहुल जिलों में स्थिति सबसे खराब है, जहां एक भी पानी का नमूना सुरक्षित नहीं पाया गया। बालाघाट, बैतुल और छिंदवाड़ा में 50 प्रतिशत से अधिक पानी के नमूने दूषित मिले हैं। मध्य प्रदेश में केवल 31.5 प्रतिशत घरों में नल के कनेक्शन हैं, जो कि 70.9 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से बहुत कम है। जहां पाइपलाइन बिछी भी है, वहां व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है, राज्य के 99.1 प्रतिशत गांवों में पाइप से जलापूर्ति की व्यवस्था तो है, लेकिन केवल 76.6 प्रतिशत घरों में ही चालू हालत में नल लगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि हर चौथे घर में या तो नल खराब है या पानी ही नहीं आता। इससे भी बदतर बात यह है कि नल से पानी आने का मतलब सुरक्षित पानी होना नहीं है। इंदौर जिला, जिसे आधिकारिक तौर पर 100 प्रतिशत नल कनेक्शन वाला घोषित किया गया है, वहां भी केवल 33 प्रतिशत घरों को ही सुरक्षित पीने का पानी मिल रहा है। पूरे राज्य में 33 प्रतिशत पानी के नमूने गुणवत्ता जांच में फेल हो गए, जो इस बात की पुष्टि करता है कि संकट केवल पानी की पहुंच का नहीं, बल्कि जहरीली सप्लाई का है। केंद्र सरकार ने इस स्थिति को सिस्टम की ओर से पैदा की गई आपदा करार दिया है और चेतावनी दी है कि यदि पानी की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ, तो इस साल फंड (बजट) में कटौती की जा सकती है। हजारों करोड़ का बजट मप्र में जल जीवन मिशन के तहत राज्य सरकार का बजट 19,949 करोड़ रुपए है। वहीं पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार ने भी जल जीवन मिशन के अंतर्गत 26,952 करोड़ रुपऐ मध्य प्रदेश को आवंटित किए हैं। भाजपा सरकार ने स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने और ड्रेनेज लाइन सुधारने के नाम पर बैंकों से 4 से 5 हजार करोड़ रुपये का ऋण भी लिया। इसके बावजूद सच्चाई यह है कि आज प्रदेश में हर तीसरा गिलास पीने का पानी दूषित है। पूरे मप्र में 36.7 प्रतिशत पानी के सैंपल गुणवत्ता जांच में फेल पाए गए हैं, जिनमें बैक्टीरिया और रासायनिक ज़हर की मौजूदगी सामने आई है। यह स्थिति किसी तकनीकी चूक का नहीं, बल्कि प्रदेश के करोड़ों नागरिकों के जीवन के साथ सीधे खिलवाड़ का मामला है। हालात और भी भयावह हैं। सरकारी अस्पतालों में केवल 12 प्रतिशत और स्कूलों में मात्र 26.7 प्रतिशत पानी ही पीने लायक पाया गया है। यानी जहाँ मरीजों का इलाज होना चाहिए और जहां बच्चों का भविष्य गढ़ा जाना चाहिए, वहीं उन्हें ज़हर पिलाया जा रहा है। हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यदि जनता को सुरक्षित पेयजल नहीं मिल पा रहा है, तो यह पूरी व्यवस्था की विफलता है। विनोद उपाध्याय / 15 जनवरी, 2026