राज्य
15-Jan-2026


शिक्षा का भारतीयकरण, मप्र की अभिनव पहल भोपाल (ईएमएस)। राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के अंतर्गत भारतीय ज्ञान परंपरा को उच्च शिक्षा, शोध और समाजोपयोगी गतिविधियों से जोड़ने के उद्देश्य से उच्च शिक्षा विभाग द्वारा भोपाल स्थित एमपीटी पलाश रेजीडेंसी में दो दिवसीय समीक्षा बैठक का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवहारिक, शोधपरक और समाजोपयोगी स्वरूप देने के लिए उच्च शिक्षा विभाग द्वारा विश्वविद्यालयों के लिए विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत की गई। गुरुवार को प्रारंभ हुई दो दिवसीय समीक्षा बैठक में शामिल विषय विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि अब विश्वविद्यालयों को अपने–अपने विषय के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े कार्यों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखते हुए शोध, लेखन और सामाजिक उपयोगिता से भी जोड़ना होगा। बैठक में सम्मिलित विद्वानों ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शोध में संस्कृत विद्वानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। बैठक में प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में निहित ज्ञान को आधुनिक संदर्भ में उपयोगी बनाने के लिए उनके अनुवाद और विषयानुकूल अध्ययन की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। इस प्रक्रिया में केवल संस्कृत के विद्यानों के साथ साथ संबंधित विषय का गहन ज्ञान रखने वाले विद्यानों को साथ मिलकर कार्य करना होगा। उच्च शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालयों से अपेक्षा की, कि वे अपने कार्यक्षेत्र में आने वाले महाविद्यालयों में प्रतिवर्ष कम से कम दो ऐसे कार्यक्रम आयोजित करें, जो भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित हों। साथ ही विषयानुसार महत्वपूर्ण दिवसों पर अकादमिक गतिविधियां आयोजित कर, विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत से जोड़ा जाए। विश्वविद्यालयों को यह भी निर्देशित किया गया कि विषय से संबंधित आलेख और शोध पत्रों के प्रकाशन को बढ़ावा दिया जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि संबंधित विषय समाज के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकता है और विद्यार्थियों के भविष्य में उसका व्यावहारिक महत्व क्या होगा। अनुसंधान योग्य विषयों का चयन कर शोध को करें प्रोत्साहित बैठक में यह भी तय किया गया कि भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत विश्वविद्यालय अपने–अपने विषय से संबंधित प्राचीन और आधुनिक ग्रंथों की पहचान कर उनके आधार पर स्नातक से स्नातकोत्तर स्तर तक पाठ्यक्रम विकसित करेंगे। विषय विशेषज्ञों और प्राध्यापकों का समूह गठित कर अध्ययन सामग्री तैयार की जाएगी। अनुसंधान योग्य विषयों का चयन कर शोध को प्रोत्साहित किया जाएगा। कार्ययोजना के अंतर्गत प्रत्येक विश्वविद्यालय में विषयवार कार्यशालाएं आयोजित करने, भारतीय ज्ञान प्रकोष्ठ के अंतर्गत संदर्भ पुस्तकालय विकसित करने तथा शिक्षक–छात्र सहभागिता को बढ़ाने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं के आयोजन पर भी सहमति बनी। सभी विश्वविद्यालयों को एक वार्षिक कैलेंडर तैयार कर योजनानुसार गतिविधियों के क्रियान्वयन और उनके प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए। साथ ही समाज से सीधा जुड़ाव स्थापित करने के लिए व्यवहारिक परियोजनाओं, मॉडल और नवाचारों को विकसित करने तथा शासकीय, शैक्षणिक, औद्योगिक और कॉरपोरेट संस्थानों के साथ समन्वय स्थापित कर परिणाममूलक अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। बैठक में स्नातकोत्तर स्तर पर लेखन कार्य को सुदृढ़ करने के लिए कार्यशालाओं की समय–सीमा तय करने का सुझाव भी दिया गया, ताकि आगामी शैक्षणिक सत्र से शोध और लेखन कार्य को गति मिल सके। बैठक में संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा यह प्रस्ताव रखा गया कि भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े सभी अकादमिक समूहों में संस्कृत विश्वविद्यालय की सहभागिता सुनिश्चित की जाए। विश्वविद्यालय द्वारा बसंत पंचमी से संस्कृत गौरव ग्रंथ माला प्रारंभ करने की बात कही गई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका महत्वपूर्ण गुरुवार से प्रारंभ हुई बैठक का शुभारंभ अपर मुख्य सचिव, उच्च शिक्षा विभाग अनुपम राजन द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ किया गया। अपर मुख्य सचिव राजन ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 के क्रियान्वयन में भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के माध्यम से पाठ्यक्रमों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विगत दो वर्षों में प्रदेश में लगभग 4,000 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ की गई है, जिनमें से लगभग 2,000 पदों पर नियुक्ति पूर्ण हो चुकी है। साथ ही सभी प्रमुख विषयों के लिए ई-कंटेंट तैयार किया जा रहा है और कई महाविद्यालयों में डिजिटल स्टूडियो भी स्थापित किए गए हैं। संचालक मप्र हिन्दी ग्रंथ अकादमी अशोक कड़ेल ने कहा कि भारतीय संस्कृति प्राचीन और आधुनिक ज्ञान का सशक्त समन्वय है। स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप विकसित किए जाने चाहिए। संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल हरियाणा के पूर्व कुलपति डॉ. रमेशचंद्र भारद्वाज ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित शोध में केवल संस्कृत भाषा का ज्ञान पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित विषय में संस्कृत आधारित विशेषज्ञता आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि विषयवार शोध कार्य पूर्ण होने के बाद प्रत्येक विषय के लिए समर्पित केंद्र स्थापित किए जाएं। मप्र शुल्क विनियामक आयोग भोपाल के डॉ. रविंद्र कान्हेरे ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा प्रणाली से जोड़ने से पाठ्यक्रम अधिक समग्र और मूल्य–आधारित बनेंगे। उन्होंने कहा कि इससे शोध, मूल्यांकन और अकादमिक गुणवत्ता में भी सकारात्मक परिवर्तन आएगा। मप्र निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग के अध्यक्ष प्रो. खेमसिंह डहेरिया ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा के माध्यम से नवाचार और शैक्षणिक गुणवत्ता को नई दिशा मिलेगी। बैठक में 19 विश्वविद्यालयों के कुलगुरु एवं उनके प्रतिनिधि उपस्थित रहे। आयुक्त उच्च शिक्षा प्रबल सिपाहा ने कहा कि विश्वविद्यालय अपने विद्यार्थियों से नियमित फीडबैक अवश्य लें, ताकि पाठ्यक्रम, शोध और अकादमिक गतिविधियां अधिक व्यवहारिक और छात्र–केन्द्रित बन सकें। कार्यक्रम का संचालन डॉ. मनोज कुमार सिंह ने किया । मप्र से प्रेरणा प्राप्त कर रहे दूसरे राज्य : अतुल कोठारी बैठक के समापन सत्र को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की तरह ही भारतीय ज्ञान परंपरा और उस पर आधारित पाठ्यक्रमों के निर्माण में मध्यप्रदेश एक महत्वपूर्ण और अग्रणी भूमिका निभा रहा है। आज देश के दूसरे राज्य मप्र से प्रेरणा प्राप्त कर इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। यह प्रसन्नता का विषय है कि प्रदेश के विश्वविद्यालयों में शोध, परीक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन पद्धति के क्षेत्र में सकारात्मक दिशा में कार्य हो रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक विश्वविद्यालय में एक भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ का गठन किया जाना चाहिए, जिससे इस दिशा में कार्य को संस्थागत स्वरूप मिल सके। जिस विषय पर विश्वविद्यालय कार्य कर रहे हैं, उस विषय में संबंधित विश्वविद्यालय को एक रिसर्च सेंटर के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसके लिए उस विषय से जुड़े अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहित करना, विषय–विशेषज्ञ विद्वानों की सूची तैयार करना तथा संबंधित विषय की सभी महत्वपूर्ण पुस्तकों एवं ग्रंथों का समृद्ध पुस्तकालय स्थापित करना आवश्यक है। श्री कोठारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से शोधार्थियों को जोड़ने के उद्देश्य से शीघ्र ही एक राज्य स्तरीय शोधार्थी कार्यशाला आयोजित की जाएगी, जिससे शोध, अकादमिक विमर्श और ज्ञान–परंपरा के समन्वय को और अधिक सुदृढ़ किया जा सके। आज होगी प्रधानमंत्री कॉलेजों की समीक्षा उल्लेखनीय है कि उच्च शिक्षा विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ का गठन किया गया है। इस प्रकोष्ठ के माध्यम से फरवरी 2024 में एक राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें 18 विषयों का चिन्हांकन कर प्रदेश के शासकीय एवं निजी विश्वविद्यालयों को एक–एक विषय का दायित्व सौंपा गया था। इसके अतिरिक्त 7 आधारभूत विषयों पर भी कार्ययोजना तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। इसके पश्चात प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों एवं संभागों में विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। इन कार्यशालाओं में संबंधित विश्वविद्यालयों द्वारा अपने–अपने विषयों पर चिंतन–मनन किया गया तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुरूप पाठ्यक्रम निर्माण और शोध कार्य की दिशा में योजनाएं तैयार की गईं। इन्हीं प्रयासों की समीक्षा के उद्देश्य से उच्च शिक्षा विभाग द्वारा दो दिवसीय समीक्षात्मक बैठक का आयोजन किया जा रहा है। बैठक के पहले दिन सभी विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं और नोडल अधिकारियों ने अपने–अपने आवंटित विषयों पर किए गए प्रयासों, उपलब्धियों तथा आगामी कार्ययोजना की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की। अब शुक्रवार को प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के प्रयासों एवं उपलब्धियों की समीक्षा की जाएगी। हरि प्रसाद पाल / 15 जनवरी, 2026