अब इसे प्रजातांत्रिक प्रणाली का अभिशाप कहे या वरदान कि इस शासन प्रणाली के तहत् प्रदेश या देश की भलाई-बुराई के लिए कोई सत्ताधारी व्यक्तित्व दोषी नही माना जाता। अब हम उदाहरण स्वरूप देश-प्रदेश की आर्थिक स्थिति को ही लें, और बात मौजूदा हालात के रूप में हमारे अपने प्रदेश की ही करें तो आज स्थिति यह है कि मध्यप्रदेश का आगामी बजट 4.65 लाख करोड़ का प्रस्तावित है, जब कि अगले वित्तीय वर्ष के दौरान खर्च का अनुमान 4.70 लाख करोड बताया जा रहा है। अर्थात् राज्य की अनुमानित आय से पांच लाख करोड़ अधिक। अब यह बजट का अतिरिक्त पांच लाख करोड़ कहां से जुटाया जाएगा, इसकी चिंता न सरकार में विराजे सत्ताधीशों को है न अधिकारी वर्ग को और न ही किसी अन्य को, इस स्थिति से डरा हुआ आम नागरिक है, जिसे भय है कि उस पर अतिरिक्त कर लाद कर यह खानापूर्ति की जाएगी, यह किस्सा भी कोई नया नही है, आजादी के बाद से आज तक लगभग पचहत्तर वर्षों से यही होता चला आ रहा है, जनता की खून-पसीने की कमाई सत्तासीन राजनैताओं और अधिकारी वर्ग की अय्याशी में काम आ रही है और इस पर गौर करने वाला कोई नही है, मंत्री व जन प्रतिनिधि अपनी सुख-सुविधा पर हजारों-लाखों करोड लुटा रहे है और इसका आर्थिक बोझ वहन करने वाली जनता मूकदर्शक बनी हुई है। वास्तव में इस स्थिति के लिए हम सब जिम्मेदार है, जो बरसों से चले आ रहे है, इस लूट के खेल के मूक दर्शक बने हुए है, क्या इस प्रजातंत्र का कोई रक्षक शेष नही बचा? प्रजातंत्र की रक्षा में अपने आप को ‘सुबेदार’ मानने वाले मीडिया ने भी अब तक अपने दायित्व का निर्वहन किस हद तक किया? वास्तव में देखा जाए तो आज यह रक्षक भी इन लुटेरों के गिरोह में शामिल हो गया है, अब ऐसे में हमारे देश का भविष्य क्या होगा? यह कोई बड़ा से बड़ा ज्योतिष या भविष्य वक्ता भी नही जानता। ....और फिर अब तो दिन-ओ-दिन इन भक्षकों की भूख बढ़ती ही जा रही है, उसके खत्म होने की कोई उम्मीद भी नजर नही आ रही है, ऐसे में हमारा व हमारे देश का भविष्य क्या होगा? वास्तविकता और आज के समय की पुकार तो यह है कि अब जनता को ही प्रजातंत्र के रक्षक का भार वहन कर इन भक्षकों के खिलाफ सख्त कदम उठाना पड़ेगा और हालात ठीक करना पड़ेगें, वर्ना हमारे देश को अंधे कुंए में गिरने से कोई नही बचा पाएगा। आज न सत्ताधारियों की अय्याशी कम हो रही है और न जनता की आर्थिक शोषण ही? यह एक गंभीर चिंतनीय सवाल है। ईएमएस/16/01/2026