जब भी जीवन तुम्हारे द्वार आए, तो उसे डर के साथ नहीं, विश्वास की खुली हथेलियों से थामना। मन के कोनों में जमा धूल— थकान, निराशा और शिकायतें— दहलीज़ पर ही उतार देना। अंदर आओ तो उम्मीद की रोशनी आँखों में भरकर आना, सूरज से थोड़ा साहस, और सुबह से नई शुरुआत चुरा लाना। जो मिला है— उत्साह, उल्लास, विश्वास— उसे छुपाना नहीं, हर दिशा में बाँट देना। अहंकार को बोझ समझकर छोड़ देना, द्वेष को हवाओं में घुल जाने देना, और लालच को मिट्टी की तरह बाहर गिरा आना। क्योंकि जीवन हल्का होने पर ही उड़ान भरता है। फूलों की मुस्कान साथ रखना, तितलियों की चंचलता, भ्रमरों की गुनगुन— ये सब याद दिलाते हैं कि सुंदरता अभी ज़िंदा है। रंगों को मत बचाकर रखना, इन्हें जीवन की किताब पर खुले मन से बिखेर देना। जीना कठिन नहीं होता, उलझनें हम खुद बुनते हैं। डोर को सुलझाकर रखना, हर गाँठ पर धैर्य का हाथ रखना। उधेड़–बुन में नहीं, स्वीकृति और सरलता में जीना। याद रखना— जीवन कोई परीक्षा नहीं, यह एक उत्सव है। और जो मुस्कान बाँट लेता है, वही सच में जीना सीख लेता है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड)